मेरी आराधना

……..मेरी आराधना……..
मेरी आराधना का. है अलग ही ढंग,
चरणों में रख दिये हैं,जीवन के सब अंग।
मुझको गणपति चाहिए, माँ गौरी के संग
रिद्धि-सिद्धि आएं सदा ,कुशल,क्षेम के संग ।।
………….मेरी आराधना का है, अलग ही ढंग॥
शिव भी मुझको चाहिए, माँ गौरी के साथ,
कृपा-सुधा बरसाइए, रहे शीश पर हाथ।
तन तप से निर्मल रहे,मन में भक्ति तरंग,
मुझको भोले चाहिए , पार्वती के संग॥
…………..मेरी आराधना का है अलग ही ढंग॥
नारायण आएँ सदा, लक्ष्मी जी के साथ,
दीनबन्धु थामे रहें, जीवन भर मेरा हाथ।
धन से संग संग दीजिए,हे नारायण सत्संग,
मुझको तो हरि चाहिए, महालक्ष्मी संग॥
…………..मेरी आराधना का है अलग ही ढंग॥
सीता जी के संग में, हों मेरे रघुनाथ,
मर्यादा निभती रहे , जीवन में हे नाथ ।
सत्य, दया, करुणा सहित बजती रहे मृदंग,
मुझे राम जी चाहिए, सदा जानकी संग॥
…………..मेरी आराधना का है अलग ही ढंग॥
राधा-मोहन संग-संग, इस मन में बस जांय ,
प्रेम-भक्ति के दीप नित, अंतर में जल जांय ।
मिट जाए सारा अहम्, उमड़े प्रेम-तरंग,
मुझे मिलें श्रीकृष्ण भी, श्रीराधा के संग॥
…………..मेरी आराधना का है अलग ही ढंग॥
सियाराम की कृपा हो , अंजनिसुत के संग,
सेवा ही बन जाए प्रभु, जीवन का हर अंग।
तन-मन-धन सब वार दूँ, मन में उठे तरंग,
पवनपुत्र आएँ सदा, सियाराम के संग॥
…………..मेरी आराधना का है अलग ही ढंग॥
जगदम्बा आएँ लिए, सब माताएँ साथ,
ममता की छाया रखें, धरें शीश पर हाथ।
निर्बलता,भय,अहम सब, हो जाएँ अब भंग,
मुझको दुर्गा चाहिए, सभी शक्तियों संग॥
…………..मेरी आराधना का है अलग ही ढंग॥
शक्ति, ज्ञान, विज्ञान में, रहे भक्ति का संग,
चरण-शरण में ही रहे , जीवन का हर अंग।
मुख पर केवल नाम हो, मन में रहे उमंग ।
रहे आखिरी सांस तक, इन चरणों का संग
………मेरी आराधना का , यही अनूठा ढंग॥
……खिलें कृपा से आपकी,जीवन में सब रंग।।
— श्रीकांत त्रिवेदी “प्रांजल”
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मेरी आराधना का. है अलग ही ढंग,
चरणों में रख दिये हैं,जीवन के सब अंग। कितनी सुन्दर पंक्तियाँ