“साहित्य केवल लेखन-प्रणाली ही का नाम है—वाचालता का नहीं।” — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
“जब तक हिंदी का साहित्य और हिंदीभाषी हैं, तब तक सूर और तुलसी का जोड़ा अमर है।” — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
“हिंदी साहित्य में शृंगार का रसराजत्व यदि किसी ने पूर्ण रूप से दिखाया, तो सूर ने।” — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
“ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएँगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कवि-कर्म कठिन होता जाएगा।” — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
“कविता ताली बजाने की नहीं, सुनकर अपने भीतर डूब जाने की वस्तु है।” — रामधारी सिंह दिनकर
“कविता आदमी का सुधार नहीं करती; वह उसे चौंकाना जानती है, धक्के देना जानती है, उसकी चेतना की मुँदी आँखों को खोलना जानती है।” — रामधारी सिंह दिनकर
“साहित्य की आधुनिक समस्या यह है कि लेखक शैली तो चरित्र की अपनाना चाहते हैं, किन्तु उद्दामता उन्हें व्यक्तित्व की चाहिए।” — रामधारी सिंह दिनकर
“सत्य काव्य का साध्य और सौंदर्य साधन है।” — महादेवी वर्मा
“उसके अमूल्य होने का रहस्य यही है कि वह मनुष्य के हृदय से प्रवाहित हुई है।” — महादेवी वर्मा
“साहित्य तुम्हारी तुम्हीं से पहचान और गहरी करता है।” — अज्ञेय
“प्रत्येक साहित्य मूलतः और सारतः, आत्मचरित्रात्मक है; भले ही बाहर-बाहर से वह चाहे जितना वस्तुवादी क्यों न दिखाई दे।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“रचना-प्रक्रिया, वस्तुतः, एक खोज और एक ग्रहण का नाम है।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“ज्ञान-पक्ष संवेदना से हटकर काव्योपयोगी नहीं रहेगा।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“जगत-जीवन के संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना में समाई हुई मार्मिक आलोचना-दृष्टि के बिना कवि-कर्म अधूरा है।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“नई कविता का पूरा विन्यास गद्यभाषा के अधिक निकट है।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“नई कविता एक मानसिक संवेदनात्मक प्रतिक्रिया है, जो जीवन-परिवेश में उपस्थित बातों के प्रति की गई है।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“साहित्यिक आदान-प्रदान की दुनिया में कोई भी प्रभाव आकस्मिक नहीं होता।” — केदारनाथ सिंह
“कविता अपनी प्रकृति से ही हर स्थिति का सामना करती है। वह उसे तोड़ती-फोड़ती है, जिससे नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं।” — केदारनाथ सिंह
“कविता यथार्थ के बिना जीवित नहीं रह सकती और दूसरी ओर यथार्थवाद के अलावा वह एक ख़ास तरह की विचार-परंपरा से भी जुड़ी होती है।” — केदारनाथ सिंह
“समाज और यथार्थ, और वह सब कुछ जो जीवन और जगत में है, कविता में आना चाहिए, लेकिन कविता की शर्तों को भूले बिना।” — केदारनाथ सिंह
“साहित्य की यह ताक़त कि वह हर चीज़ को खाद में बदल ले, बड़ी ताक़त है।” — केदारनाथ सिंह
“उपभोक्ता-संस्कृति में कविता बेकार की चीज़ समझी जाने लगी है। मनोरंजन के अन्य साधन मनुष्य की स्वाद-वृत्ति को बहुत आसानी से संतुष्ट कर सकते हैं।” — केदारनाथ सिंह
“एक उत्कृष्ट कविता व्यापक अर्थों में पूरा साहित्य भी हो सकती है और बहुत ही संकुचित अर्थों में छोटी-सी तुकबंदी मात्र भी।” — कुँवर नारायण
“कविता की सार्थकता शायद इसमें है कि वह हमें एक-दूसरे से भिन्न, एक-दूसरे की तरह का नहीं—काव्यानुभव दे सकें।” — कुँवर नारायण
“संतुलित बुद्धि और उदार संवेदनशीलता से साहित्य अपने चारों तरफ़ देखता है—केवल राजनीति की ही तरफ़ नहीं, न किसी एक ही जगह खड़े होकर।” — कुँवर नारायण
“समर्थ कविता शब्दों के गहरे समाधिस्थ मौन को तोड़ती है।” — कुँवर नारायण
“कविता में ‘मैं’ की व्याख्या केवल आत्मकेंद्रण या व्यक्तिवाद के अर्थ में करना, उसके बृहत्तर आशयों और संभावनाओं—दोनों को संकुचित करना है।” — कुँवर नारायण
“नई साहित्य-चेतना की पुराने से सबसे महत्वपूर्ण भिन्नता इसी में रही है कि उसने अपने को हर तरह से प्रभाव के प्रति खुला रखा।” — कुँवर नारायण
“यह भयानक है, जब लेखक लिखना बंद कर देता है। उसके पास दुनिया को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं रहता, सिवा अपने चेहरे के!” — निर्मल वर्मा
“साहित्य हमें पानी नहीं देता, वह सिर्फ़ हमें अपनी प्यास का बोध कराता है।” — निर्मल वर्मा
“कलाकार दुनिया को छोड़ता है, ताकि उसे अपने कृतित्व में पा सके।” — निर्मल वर्मा
“सारी कलाएँ एक-दूसरे में समोई हुई हैं, हर कला-कृति दूसरी कलाकृति के अंदर से झाँकती है।” — शमशेर बहादुर सिंह
“भाषा की जान होता है मुहावरा।” — शमशेर बहादुर सिंह
“कविता को उस तरह नहीं रिवाइज़ किया जा सकता, जैसे किसी निबंध या स्पीच को।” — शमशेर बहादुर सिंह
“लिखना चाहे जितने विशिष्ट ढंग से, लेकिन जीना एक अति सामान्य मनुष्य की तरह।” — धर्मवीर भारती
“बुद्धि से कहाँ मिलती है प्रेरणा, वह तो प्राणों से मिलती है।” — भवानी प्रसाद मिश्र
“प्रेमचंद का समूचा साहित्य भारतीय किसान की महागाथा है, राष्ट्रीय पूँजीवाद की गौरवगाथा नहीं है।” — नामवर सिंह
“आलोचना औज़ारों का बक्सा नहीं, जिसे पाकर कोई आलोचक न बन जाए। अक़्ल हो तो एक पेचकश ही काफ़ी है।” — नामवर सिंह
“हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो…” — प्रेमचंद
“साहित्य की बहुत-सी परिभाषाएँ की गई हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा ‘जीवन की आलोचना’ है।” — प्रेमचंद
“साहित्य अपने काल का प्रतिबिम्ब होता है। जो भाव और विचार लोगों के हृदयों को स्पंदित करते हैं, वही साहित्य पर भी अपनी छाया डालते हैं।” — प्रेमचंद
“साहित्य जीवन का प्रतिबिंब है, इसीलिए हमें सबसे पहले जीवन की चिंता होनी चाहिए।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“कवि को पंडित, आचार्य या संपादक होने की आवश्यकता नहीं है।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ।” — हजारीप्रसाद द्विवेदी
“रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज सत्य।” — हजारीप्रसाद द्विवेदी
“मनुष्य ही बड़ी चीज़ है, भाषा उसी की सेवा के लिए है। साहित्य-सृष्टि का भी यही अर्थ है।” — हजारीप्रसाद द्विवेदी
“अवधूतों के मुँह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएँ निकली हैं।” — हजारीप्रसाद द्विवेदी
“आलोचक का काम है प्राचीन कृतियों को प्रासंगिक बनाए।” — नामवर सिंह
“कविता सृष्टि-सौंदर्य का अनुभव कराती है, और मनुष्य को सुंदर वस्तुओं में अनुरक्त करती है।” — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
“हर प्रकाशित पंक्ति साहित्य नहीं होती… हर युग में अधिकांश साहित्य ‘पेरिफ़ेरी’ का साहित्य होता है जो सिर्फ़ छपता चला जाता है।” — विष्णु खरे
“साहित्य केवल लेखन-प्रणाली ही का नाम है—वाचालता का नहीं।” — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
“जब तक हिंदी का साहित्य और हिंदीभाषी हैं, तब तक सूर और तुलसी का जोड़ा अमर है।” — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
“हिंदी साहित्य में शृंगार का रसराजत्व यदि किसी ने पूर्ण रूप से दिखाया, तो सूर ने।” — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
“ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएँगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कवि-कर्म कठिन होता जाएगा।” — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
“कविता ताली बजाने की नहीं, सुनकर अपने भीतर डूब जाने की वस्तु है।” — रामधारी सिंह दिनकर
“कविता आदमी का सुधार नहीं करती; वह उसे चौंकाना जानती है, धक्के देना जानती है, उसकी चेतना की मुँदी आँखों को खोलना जानती है।” — रामधारी सिंह दिनकर
“साहित्य की आधुनिक समस्या यह है कि लेखक शैली तो चरित्र की अपनाना चाहते हैं, किन्तु उद्दामता उन्हें व्यक्तित्व की चाहिए।” — रामधारी सिंह दिनकर
“सत्य काव्य का साध्य और सौंदर्य साधन है।” — महादेवी वर्मा
“उसके अमूल्य होने का रहस्य यही है कि वह मनुष्य के हृदय से प्रवाहित हुई है।” — महादेवी वर्मा
“साहित्य तुम्हारी तुम्हीं से पहचान और गहरी करता है।” — अज्ञेय
“प्रत्येक साहित्य मूलतः और सारतः, आत्मचरित्रात्मक है; भले ही बाहर-बाहर से वह चाहे जितना वस्तुवादी क्यों न दिखाई दे।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“रचना-प्रक्रिया, वस्तुतः, एक खोज और एक ग्रहण का नाम है।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“ज्ञान-पक्ष संवेदना से हटकर काव्योपयोगी नहीं रहेगा।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“जगत-जीवन के संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना में समाई हुई मार्मिक आलोचना-दृष्टि के बिना कवि-कर्म अधूरा है।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“नई कविता का पूरा विन्यास गद्यभाषा के अधिक निकट है।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“नई कविता एक मानसिक संवेदनात्मक प्रतिक्रिया है, जो जीवन-परिवेश में उपस्थित बातों के प्रति की गई है।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“साहित्यिक आदान-प्रदान की दुनिया में कोई भी प्रभाव आकस्मिक नहीं होता।” — केदारनाथ सिंह
“कविता अपनी प्रकृति से ही हर स्थिति का सामना करती है। वह उसे तोड़ती-फोड़ती है, जिससे नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं।” — केदारनाथ सिंह
“कविता यथार्थ के बिना जीवित नहीं रह सकती और दूसरी ओर यथार्थवाद के अलावा वह एक ख़ास तरह की विचार-परंपरा से भी जुड़ी होती है।” — केदारनाथ सिंह
“समाज और यथार्थ, और वह सब कुछ जो जीवन और जगत में है, कविता में आना चाहिए, लेकिन कविता की शर्तों को भूले बिना।” — केदारनाथ सिंह
“साहित्य की यह ताक़त कि वह हर चीज़ को खाद में बदल ले, बड़ी ताक़त है।” — केदारनाथ सिंह
“उपभोक्ता-संस्कृति में कविता बेकार की चीज़ समझी जाने लगी है। मनोरंजन के अन्य साधन मनुष्य की स्वाद-वृत्ति को बहुत आसानी से संतुष्ट कर सकते हैं।” — केदारनाथ सिंह
“एक उत्कृष्ट कविता व्यापक अर्थों में पूरा साहित्य भी हो सकती है और बहुत ही संकुचित अर्थों में छोटी-सी तुकबंदी मात्र भी।” — कुँवर नारायण
“कविता की सार्थकता शायद इसमें है कि वह हमें एक-दूसरे से भिन्न, एक-दूसरे की तरह का नहीं—काव्यानुभव दे सकें।” — कुँवर नारायण
“संतुलित बुद्धि और उदार संवेदनशीलता से साहित्य अपने चारों तरफ़ देखता है—केवल राजनीति की ही तरफ़ नहीं, न किसी एक ही जगह खड़े होकर।” — कुँवर नारायण
“समर्थ कविता शब्दों के गहरे समाधिस्थ मौन को तोड़ती है।” — कुँवर नारायण
“कविता में ‘मैं’ की व्याख्या केवल आत्मकेंद्रण या व्यक्तिवाद के अर्थ में करना, उसके बृहत्तर आशयों और संभावनाओं—दोनों को संकुचित करना है।” — कुँवर नारायण
“नई साहित्य-चेतना की पुराने से सबसे महत्वपूर्ण भिन्नता इसी में रही है कि उसने अपने को हर तरह से प्रभाव के प्रति खुला रखा।” — कुँवर नारायण
“यह भयानक है, जब लेखक लिखना बंद कर देता है। उसके पास दुनिया को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं रहता, सिवा अपने चेहरे के!” — निर्मल वर्मा
“साहित्य हमें पानी नहीं देता, वह सिर्फ़ हमें अपनी प्यास का बोध कराता है।” — निर्मल वर्मा
“कलाकार दुनिया को छोड़ता है, ताकि उसे अपने कृतित्व में पा सके।” — निर्मल वर्मा
“सारी कलाएँ एक-दूसरे में समोई हुई हैं, हर कला-कृति दूसरी कलाकृति के अंदर से झाँकती है।” — शमशेर बहादुर सिंह
“भाषा की जान होता है मुहावरा।” — शमशेर बहादुर सिंह
“कविता को उस तरह नहीं रिवाइज़ किया जा सकता, जैसे किसी निबंध या स्पीच को।” — शमशेर बहादुर सिंह
“लिखना चाहे जितने विशिष्ट ढंग से, लेकिन जीना एक अति सामान्य मनुष्य की तरह।” — धर्मवीर भारती
“बुद्धि से कहाँ मिलती है प्रेरणा, वह तो प्राणों से मिलती है।” — भवानी प्रसाद मिश्र
“प्रेमचंद का समूचा साहित्य भारतीय किसान की महागाथा है, राष्ट्रीय पूँजीवाद की गौरवगाथा नहीं है।” — नामवर सिंह
“आलोचना औज़ारों का बक्सा नहीं, जिसे पाकर कोई आलोचक न बन जाए। अक़्ल हो तो एक पेचकश ही काफ़ी है।” — नामवर सिंह
“हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो…” — प्रेमचंद
“साहित्य की बहुत-सी परिभाषाएँ की गई हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा ‘जीवन की आलोचना’ है।” — प्रेमचंद
“साहित्य अपने काल का प्रतिबिम्ब होता है। जो भाव और विचार लोगों के हृदयों को स्पंदित करते हैं, वही साहित्य पर भी अपनी छाया डालते हैं।” — प्रेमचंद
“साहित्य जीवन का प्रतिबिंब है, इसीलिए हमें सबसे पहले जीवन की चिंता होनी चाहिए।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“कवि को पंडित, आचार्य या संपादक होने की आवश्यकता नहीं है।” — गजानन माधव मुक्तिबोध
“मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ।” — हजारीप्रसाद द्विवेदी
“रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज सत्य।” — हजारीप्रसाद द्विवेदी
“मनुष्य ही बड़ी चीज़ है, भाषा उसी की सेवा के लिए है। साहित्य-सृष्टि का भी यही अर्थ है।” — हजारीप्रसाद द्विवेदी
“अवधूतों के मुँह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएँ निकली हैं।” — हजारीप्रसाद द्विवेदी
“आलोचक का काम है प्राचीन कृतियों को प्रासंगिक बनाए।” — नामवर सिंह
“कविता सृष्टि-सौंदर्य का अनुभव कराती है, और मनुष्य को सुंदर वस्तुओं में अनुरक्त करती है।” — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
“हर प्रकाशित पंक्ति साहित्य नहीं होती… हर युग में अधिकांश साहित्य ‘पेरिफ़ेरी’ का साहित्य होता है जो सिर्फ़ छपता चला जाता है।” — विष्णु खरे