मंच की ऊँचाई और रिश्तों का बौनापन

साहित्यिक कुनबों में प्रवेश के बाद होने वाला स्मृतिलोप
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
साहित्य की दुनिया बड़ी विचित्र है। यहाँ कविताओं में समानता, संवेदना, प्रेम और मनुष्यता के स्वर गूँजते हैं, किंतु कवियों के आपसी व्यवहार में एक अदृश्य वर्णव्यवस्था बड़ी मुस्तैदी से काम करती है। यहाँ भी छोटे-बड़े हैं, अपने-पराए हैं और कुछ ऐसे विशिष्ट कुनबे हैं, जिनकी सदस्यता मिलते ही कवि की दृष्टि, स्मृति और व्यवहार में आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगते हैं।
कल तक जो कवि हर दूसरे व्यक्ति को भैया, दीदी, दादा और गुरुजी कहकर संबोधित करता था, वही किसी प्रतिष्ठित मंच पर दो-चार बार कविता पढ़ लेने के बाद अचानक स्मृतिलोप का शिकार हो जाता है।
उसे वह छोटा-सा सभागार याद नहीं रहता जहाँ उसने काँपते हाथों से अपनी पहली कविता पढ़ी थी। वे चेहरे धुँधले पड़ जाते हैं जिन्होंने उसकी साधारण-सी प्रस्तुति पर भी असाधारण उत्साह दिखाया था।
हाँ, एक बात उसकी स्मृति में अत्यंत सुरक्षित रहती है—कौन आयोजक कितना मानदेय देता है, किस मंच पर कितने कैमरे लगते हैं और किस प्रतिष्ठित कवि के साथ तस्वीर खिंचवाने से साहित्यिक कद में कितनी वृद्धि हो सकती है!
इस विलक्षण रोग को ‘मंचासीन स्मृतिलोप’ कहा जा सकता है।
इसका प्रभाव बड़ा चयनात्मक होता है। पुराने मित्रों के लिए समय का अभाव हो जाता है, लेकिन नए कुनबे के साथ यात्राओं, रात्रिभोजों और अभिनंदन समारोहों के लिए घड़ी में अचानक अतिरिक्त घंटे उत्पन्न होने लगते हैं।
आश्चर्य यह नहीं कि व्यक्ति व्यस्त हो गया। आश्चर्य यह है कि उसकी व्यस्तता ने भी अपने शिकार बड़ी सावधानी से चुने हैं!
साहित्यिक संसार में अब कविता की श्रेष्ठता का एक नया मानदंड विकसित हो चुका है—रचनाकार किस कुनबे का सदस्य है?
यदि कवि अपने खेमे का है, तो उसकी चार साधारण पंक्तियाँ भी कालजयी घोषित की जा सकती हैं। टिप्पणियों में ‘अद्भुत’, ‘अप्रतिम’, ‘अविस्मरणीय’ और ‘साहित्य की अमूल्य धरोहर’ जैसे विशेषण पूरी उदारता से लुटाए जाते हैं।
इसके विपरीत, किसी पुराने साथी की उत्कृष्ट रचना भी ऐसी उपेक्षा झेल सकती है, मानो साहित्य के इतिहास में उसका जन्म ही न हुआ हो।
यहाँ वाह-वाह अब कविता पढ़कर नहीं, कवि की उपयोगिता देखकर की जाती है।
कभी-कभी लगता है कि साहित्यकारों ने एक अदृश्य सहकारी समिति बना रखी है—’तुम मुझे महान कहो, मैं तुम्हें कालजयी घोषित कर दूँगा।’
इस समिति में प्रतिभा से अधिक संपर्कों का मूल्य है। जो मंच दिला सकता है, आयोजकों से परिचय करा सकता है या किसी प्रतिष्ठित मंडली में प्रवेश का रास्ता खोल सकता है, वह परम आत्मीय है। जो केवल स्नेह दे सकता है और आपकी रचना पर ईमानदार राय रख सकता है, वह धीरे-धीरे साहित्यिक परिधि से बाहर कर दिया जाता है।
दरअसल, यहाँ रिश्तों का मूल्यांकन भी उपलब्धियों की सूची देखकर होने लगा है।
एक समय जिस आत्मीयता से ‘दीदी, प्रणाम!’ कहकर फ़ोन किया जाता था, वही संबंध अब औपचारिक अभिवादन के योग्य भी नहीं समझा जाता। पुराने स्नेह की जगह नई प्रतिष्ठा ने ले ली है।
और फिर ऐसे ही कवि मंच पर खड़े होकर मित्रता, संवेदना और मानवीय संबंधों की महत्ता पर कविता सुनाते हैं।
श्रोता भावविभोर हो उठते हैं। तालियाँ बजती हैं। संचालक घोषणा करता है—’कवि महोदय की संवेदनाएँ कितनी गहरी हैं!’
मन में प्रश्न उठता है—ये संवेदनाएँ इतनी गहरी तो नहीं कि इनमें पुराने संबंध डूबकर फिर कभी ऊपर ही न आए हों?
यहाँ एक बात स्पष्ट है। किसी कवि को अच्छा मंच मिले, मानदेय मिले, लोकप्रियता और प्रतिष्ठा प्राप्त हो, इसमें आपत्ति कैसी? प्रतिभा और परिश्रम का सम्मान होना ही चाहिए।
समस्या ऊँचाई प्राप्त करने में नहीं, ऊँचाई पर पहुँचकर दूसरों को छोटा समझने में है।
कुछ लोग सफलता प्राप्त करके अपने साथियों का हाथ थामते हैं और कुछ अपने पैरों के नीचे से सीढ़ियाँ ही हटवा देते हैं, ताकि कोई दूसरा उन तक न पहुँच सके।
विडंबना देखिए कि जो कवि अपनी रचनाओं में सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध सबसे मुखर दिखाई देते हैं, वही अपने साहित्यिक व्यवहार में एक नई अस्पृश्यता को जन्म दे देते हैं।
यहाँ छुआछूत शरीर की नहीं, प्रतिष्ठा की है।
किसी को इसलिए नहीं छोड़ा जाता कि वह बुरा मनुष्य है, बल्कि इसलिए कि वह अभी तक पर्याप्त प्रसिद्ध नहीं हुआ।
यह साहित्यिक समाज का वह विचित्र वर्गभेद है, जहाँ संबंधों की निकटता हृदय से नहीं, हैसियत से तय होती है।
दुख इस बात का नहीं कि किसी ने फ़ोन करना छोड़ दिया या किसी रचना पर टिप्पणी नहीं की। प्रश्न इससे कहीं बड़ा है—जिन संबंधों को कभी आत्मीयता का नाम दिया गया था, वे सफलता की पहली सीढ़ी चढ़ते ही अनुपयोगी कैसे हो गए?
क्या वे वास्तव में संबंध थे, या साहित्यिक यात्रा के अस्थायी पड़ाव?
क्या ‘दीदी’ और ‘भैया’ जैसे संबोधन स्नेह से उपजे थे, या वे उस समय संभावित लाभ का विनम्र व्याकरण भर थे?
इन प्रश्नों का उत्तर शायद संबंधित कवियों के पास भी नहीं होगा। फिलहाल वे अत्यंत व्यस्त हैं। उन्हें अगले कवि सम्मेलन में मनुष्य की संवेदनहीनता और टूटते रिश्तों पर अपनी नई कविता पढ़नी है।
निश्चय ही वहाँ भी खूब तालियाँ बजेंगी!
वस्तुतः बड़ा कवि होना और बड़ा मनुष्य होना दो अलग-अलग उपलब्धियाँ हैं। पहली का प्रमाण मंच, मानदेय और प्रसिद्धि दे सकते हैं, लेकिन दूसरी की पहचान व्यवहार से ही होती है।
समय बड़ा निर्मम समीक्षक है। वह केवल रचनाओं का नहीं, रचनाकार के चरित्र का भी मूल्यांकन करता है।
संभव है आज आपके नाम के आगे ‘सुप्रसिद्ध’, ‘यशस्वी’ और ‘अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त’ जैसे अनेक विशेषण जुड़ गए हों, लेकिन यदि इन सबके बीच आपके व्यक्तित्व से आत्मीयता का विशेषण हट गया है, तो मंच भले विशाल हो गया हो, मन छोटा ही रह गया है।
मंच की ऊँचाई कवि को दृश्यता दे सकती है, व्यक्तित्व को गरिमा नहीं।
और अंत में एक बात—
प्रसिद्धि पाकर पुराने मित्रों को भूल जाने वालों को यह याद रखना चाहिए कि संसार में मूर्तियाँ भी बहुत ऊँचे स्थान पर रखी जाती हैं। लोग उन्हें प्रणाम अवश्य करते हैं, लेकिन उनके पास बैठकर अपना दुख-सुख नहीं बाँटते।
स्वधा रवीन्द्र उत्कर्षिता

















