गीतसामान्य
सीता कहाँ हो?

सीता कहाँ हो ह्रृदय है को न धीर।
ढूंढ रहे तुमको रघुकुल के वीर।
देखे ठिकाने सारे, तुम हो कहीं ना
कुंजन न कलियन में अरु ना गलिन मा
आओ प्रिये तुमको ढूँढें सुधीर।
सीता कहाँ हो ह्रृदय है को न धीर।
जैसे बिना माली बगिया है रोए
वैसे लखन भैया लगते हैं खोए
देखो हृदय में लगा आके तीर
सीता कहाँ हो ह्रृदय है को न धीर।
चुभता तमस और चुभती है रात
मौन है पसरा सब है उदास
मरुथल की हिरनी घिरी धारे पीर।
सीता कहाँ हो ह्रृदय है को न धीर।
मन की मछरिया है सूनी उदास
बगिया है रीती रीती नहीं है प्रकाश
नीरज नयन है बिकल अरु अधीर
सीता कहाँ हो ह्रृदय है को न धीर।
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