सुनो शिवा

सुनो शिवा
तुम जान रही हो अपने शिव का हाल
कहाँ हैं कैसे हैं वे ???
जब तक साथ तुम्हारे थे शिव
कृष्ण सरीखे मुस्काते थे
बाघम्बर को त्याग दिया था
पीतांबर में सुख पाते थे
डमरू छिपा आए थे भोले
बंसी की धुन बजा रहे थे
साथ तुम्हारे थे तो निधिवन
को निधि बन कर सजा रहे थे
तुमसे विरह
और रो रो कर हुए बहुत बेहाल
सुनो शिवा,
तुम जान रही हो अपने शिव का हाल।
गंगा तट पर बैठ अकेले
जल में तुम्हें निहार रहे थे,
विरह वेदना से व्याकुल थे
जो जग पालनहार रहे थे
नंदी द्वार खड़ा था कब से,
सूनी राह बुहार रहा था,
डमरू भी चुपचाप पड़ा था,
मन बस तुम्हें पुकार रहा था।
बिना तुम्हारे
जीवन जीना उनका हुआ मुहाल
सुनो शिवा,
तुम जान रही हो अपने शिव का हाल।
भस्म रमाकर बैठे भोले,
मन को समझा नहीं पा रहे,
रुद्राक्षों की माला फेरें,
नाम तुम्हारा नित्य गा रहे ।
त्रिशूलों से क्या करना था,
जब नयनों में पीर समाई,
तेरी याद जगाकर मन में,
रात उन्होंने पुनः बिताई।
रो रो करके नयन तीसरा
अब न दिखे विकराल ।
सुनो शिवा,
तुम जान रही हो अपने शिव का हाल।
जान रही हूँ सखी मेरे बिन
शिव का शिव होना मुश्किल है
उनका लक्ष्य संग है मेरा
और वो ही मेरी मंज़िल है
कह दो उनसे लौट आएँ अब
मैं न रहूँगी दूर,
उनके बिन यह मन जैसे हो
मांग बिना सिन्दूर
शिव से कह दो—शिवा खड़ी है,
लिए प्रेम की ढाल।
सुनो सखी
मैं जान रही हूँ अपने शिव का हाल।
सुनो शिवा,
तुम जान रही हो अपने शिव का हाल।





















