रचनासामान्य
इतनी कृपा करो नारायण

इतनी कृपा करो नारायण, पूरी हो दर्शन की आस!
जनम-जनम से भटक रहा मैं,दे दो इन चरणों में वास!!
इतनी कृपा करो नारायण…
भवसागर की लहरें ऊँची, नैया बिन पतवार,
दीनदयाल है नाम तुम्हारा, सुन लो मेरी पुकार,
तुम बिन नहीं सहारा कोई , कैसे उतरूँ पार!
इतनी कृपा करो नारायण…
माया-मोह का बंधन टूटे , छूटे सब अभिमान,
तेरे दर का बनूँ भिखारी , हो बस ये पहचान।
तेरी भक्ति की ज्योति जले तो,मिट जाए अंधियार,
इतनी कृपा करो नारायण…
बोझ पाप का भारी है प्रभु, कैसे इसे उठाऊँ,
पाऊँ शरण तेरे चरणों की,भव सागर तर जाऊं,
करुणा सागर,धाम क्षमा के,तुम हो पालनहार।।
इतनी कृपा करो नारायण..
अंत समय जब आए मेरा, नाम तुम्हारा गाऊँ,
मैं बस तेरे ही चरणों की रज बनकर रह जाऊँ,
हाथ आपका सिर पर हो तो,कर जाऊं भव पांर ।।
इतनी कृपा करो नारायण,पूरी कर दो मेरी आस!!
श्रीकांत त्रिवेदी “प्रांजल”















