कवितासामान्य
याद

याद
याद आए ना,
आने देना,
रोकना मत।
भीतर हिलाये, झकझोरे, तड़पाए
होने देना सब,
रोकना मत।
रोक सकोगे, ऐसा सोचना भी मत,
थक जाओगे
गर विपरीत दिशा में ऊर्जा लगाओगे,
लगाना मत।
याद के साथ बहना,
बहते रहना,
चेतना को चेतन रखना बस,
धीरे धीरे ऊपर उठ जाये जब चेतना,
तब नीचे
बहते गिरते, रोते, कुरळाते, बेचैन होते देखना खुद को,
रोते रोते, खुद पर हंसने लगोगे एक दिन।
बेचैनी
त्वरित हल मांगती है,
समझाना खुद को
कि बेचैनी का हल नहीं होता,
बेचैनी की साधना होती है।
वीरेंदर भाटिया
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कितनी सुन्दर रचना।
बेचैनी की साधना।