मेरे राम

मर्यादा की सीमाओं को,
करे स्वीकृत, वही “राम” है।
कर्तव्यों में, पूर्ण धर्म को,
करे समादृत, वही “राम” है।
सफल हुआ गौरी पूजन तब,
नयनों ने पाया दर्शन जब।
सीता के मन की वीणा को,
कर दे झंकृत, वही राम है।
इस जीवन को सफल अर्थ दे।
किसी विवश को कर समर्थ दे।
किसी भटकते हुए क्लाँत को,
करे पुरस्कृत, वही “राम” है।
रमा हुआ है, जो कण-कण में।
जो है, जीवन के क्षण-क्षण में।
सत्यं शिवम सुंदरम को जो,
करे अलंकृत, वही “राम” है।
रघुकुल भूषण, शिष्य बने जब,
विश्वामित्र, वशिष्ठ मिले तब।
कर्तव्यों के पथ पर अविचल,
चलता अविरत, वही राम है।
जो जीवन में पूर्ण काम है।
अन्त समय में, सत्य नाम है।
जीवन में राक्षसी वृत्ति को,
करे तिरस्कृत, वही राम है।
राम शाश्वत, पुनर्नवा है।
भव रोगों की, राम दवा है।
रामनाम को जो जीवन में,
कर दे झंकृत, वही राम है।
करे अहिल्या पाषाणों को।
गहे धनुष संग जो वाणों को।
निशिचर हीन, धरा करने को,
जो है अधिकृत, वही राम है।
आदर्शों का शिखर उच्चतम,
जो है मर्यादा पुरुषोत्तम।
सुत, पति, मित्र, भ्रात सब रिश्ते,
जिससे उपकृत, वही राम है।
कौशल्या सुत, दशरथ नन्दन।
सिया प्राण, अग जग का वन्दन।
राष्ट्रधर्म के दिव्य यज्ञ में,
बने स्वयं घृत, वही राम है।
…….श्रीकांत त्रिवेदी “प्रांजल”
रचना पसंद आई? रचनाकार का उत्साह बढ़ाएँ
Reward स्वैच्छिक है और राशि सीधे रचनाकार के QR पर भेजी जाती है; वेबसाइट भुगतान सत्यापित नहीं करती।1 टिप्पणियाँ
सभी पाठकों और रचनाकारों की सार्वजनिक प्रतिक्रियाएँ
Comments बंद हैं।
















बहुत सुंदर 🙏💐