रचनासामान्य
द्वादस ज्योतिर्लिंग

द्वादश ज्योतिर्लिंग
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काशी ही मधुवन हो जाए,
विश्वनाथ धड़कन हो जाए
नयनों में उज्जैन बसे तो,*
सन्यासी ये मन हो जाए!
सोमनाथ का करें स्मरण,*
मल्लिकार्जुन तन हो जाए!
ममलेश्वर का ध्यान करें,
वैद्यनाथ आंगन हो जाए!
भीमाशंकर के दर्शन हों,
*नागेश्वर तपवन हो जाए!
त्रयंबकेश्वर हों नयनों में,
घुश्मेश्वर अंजन बन जाए!
रामेश्वर में राम मिलें तो,*
रज केदारधाम बन जाएं!!
श्रीकांत त्रिवेदी “प्रांजल”
श्रीकांत त्रिवेदी “प्रांजल “
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