जयति जय सरस्वती

जयति जय सरस्वती,विश्व-विमल-भारती,
वीणिका-विनोदिनी, भाव को सँवारती।
मंजुल मराल श्वेत, आसन मृणाल मंजु ,
वल्लकी सुमन्द स्वर,साज को सँवारती।
जयति जय सरस्वती,विश्व-विमल-भारती,
वीणिका-विनोदिनी, भाव को सँवारती।
ज्ञानमयी भारती, दिव्य ज्योति धारती,
मोह-तम-निकन्दिनी, चेतना प्रसारती।
शुभ्र वसन धारिणी, कुन्द-किरण-हासिनी,
वेद-ऋचा माधुरी , लोक में प्रसारती।।
जयति जय सरस्वती,विश्व-विमल-भारती,
वीणिका-विनोदिनी, भाव को सँवारती।
ज्ञान-दीप-दायिनी, मोह-तम-विनाशिनी ,
शब्द-शक्ति-साधिनी,बुद्धि को निखारती।
वेदिका-विलासिनी,काव्य जग प्रकाशिनी,
सत्य-सुधा-सींचकर, चेतना सँवारती॥
जयति जय सरस्वती,विश्व-विमल-भारती,
वीणिका-विनोदिनी, भाव को सँवारती।
शुभ्र-वसन-धारिणी,दिव्य-गुण-विहारिणी,
भक्त-हृदय-मन्दिर में प्रेम को प्रसारती।
मातु वरदायिनी, सिद्धि-सुख-प्रदायिनी,
करुणा-कटाक्ष से, भाग्य को सँवारती॥
जयति जय सरस्वती,विश्व-विमल-भारती,
वीणिका-विनोदिनी, भाव को सँवारती।
……..श्रीकांत त्रिवेदी “प्राञ्जल”
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