रचनासामान्य

* माह-ओ-महबूबा

📅 September 30, 2026 ⏱ 1 मिनट ◉ 12 views 💬 0 comments

** माह-ओ-महबूबा **

****************

 

चाँदनी शरमा गई,

जब वो छत पर आ गई।

 

माह-ए-ताबाँ झुक गया,

जब से नज़र टकरा गई।

 

रुख़ पे उसके नूर था,

शब भी जैसे पा गई।

 

ज़ुल्फ़ जब बिखरी ज़रा,

शाम भी घबरा गई।

 

लब पे आई इक हँसी,

कायनात महका गई।

 

हुस्न उसका देख कर,

माहताबी मात खा गई।

 

ज़िक्र है जब से किया,

रूह तक महका गई।

 

माह-ओ-अंजुम चढ़ा,

वो तो दिल में आ गई।

 

मन सीरत क्या लिखे,

वो ग़ज़ल बन जा गई।

******”*******

सुखविंद्र सिंह मनसीरत

खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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