ग़ज़लसामान्य
जान ए हया
जान ए हयासुखविन्द्र सिंह मनसीरत
******* जान – ए – हया *******
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जान – ए – हया इतनी बेकरार क्यों हैं,
दर्दमंद होकर भी गीले रुख़सार क्यों हैं।
तेरे बिन दिल को चैन आता नहीं है,
हम तेरे हिज्र में अश्कबार क्यों हैं।
ज़ख़्म-ए-दिल को छुपाए फिरते हैं हम,
लोग पूछें तो हम शर्मसार क्यों हैं।
रात कटती नहीं, दिन गुज़रता नहीं,
इश्क़ में हम यूँ बेइख़्तियार क्यों हैं।
तूने छोड़ा तो दुनिया भी छूट गई,
तेरी यादों के ही ग़मगुसार क्यों हैं।
मौत आए तो शायद सुकूँ मिल जाए,
ज़िंदगी से मगर बेकरार क्यों हैं।
‘मनसीरत’ ये कैसी मोहब्बत हुई,
हम वफ़ादार होकर भी ख़्वार क्यों हैं।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)















