ग़ज़लसामान्य
ऐ ग़ज़ल! आ
ऐ ग़ज़ल! आमनीष कुमार शुक्ल 'मन'
ऐ ग़ज़ल! आ मेरे बर्ताव में शामिल हो जा।
तू ही महताब-ए-शमा रंग-ए-महफ़िल हो जा।
एक मिसरे में मेरा बन के ज़हन तू उतरे,
एक मिसरे में मेरे तू ही मेरा दिल हो जा।
एक मिसरा मैं कहूँ सब के मुसव्विर के लिए,
एक मिसरे के लिए तू मुतहम्मिल हो जा।
एक मिसरा हो बयाँ दर्द-ए-मज़लूम-ए-जहाँ,
एक मिसरे से अयाँ मुर्शिद-ए-कामिल हो जा।
एक मिसरा यूँ निभे नूर-ए-ऩज़र की जानिब,
एक मिसरे का सबब ‘मन’ का ही हासिल हो जा।
(मुसव्विर= रचनाकार
मुतहम्मिल= सहिष्णु, सहनशील
मुर्शिद-ए-कामिल= सही मार्गदर्शक)
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वाह वाह वाह बहुत ही सुन्दर गज़ल हुयी है