ग़ज़लसामान्य

ग़ज़ल

📅 October 9, 2026 ⏱ 1 मिनट ◉ 18 views 💬 0 comments

#ग़ज़ल

 

एक ही नाम पे इक उम्र बिताने वाले,

वो भी क्या लोग थे रिश्तों को निभाने वाले !

 

लोग दिल खोल के जब बात किया करते थे,

वो रवायत-ए-वफ़ा, दौर पुराने वाले !

 

ये जो वीरान सा लगता है मुहब्बत का शहर,

ये गुलिस्ताँ था, बताते हैं बताने वाले !

 

इनसे धोखा जो मिला है, तो हैरत कैसी ?

और क्या देंगे भला हमको ज़माने वाले !

 

ग़म हमारा है, हमीं को है निभाना इससे,

आते जाते हैं बस अफ़सोस जताने वाले !

 

एक वो जिसने नुमाइश की मेरे ज़ख़्मों की,

एक हम, उसके सभी ऐब छुपाने वाले !

 

संगेमरमर के महल हमको सिखाएँ न वफ़ा,

हम समंदर पे अटल सेतु बनाने वाले !

 

हमने ताबीज़ दुआओं के पहन रक्खे हैं,

ख़ुद ही मिट जाते हैं, वो हमको मिटाने वाले !

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