गीतसामान्य
हाथ में अमृत कलश है,कंठ में है प्यास !

सिर्फ इतना सा रहा जीवन का ये विन्यास,
हाथ में अमृत कलश है,
कंठ में है प्यास !
है उजालों के शहर में जगमगाता घर हमारा ,
भाग्य यूँ उजला कि जैसे भाग्य में हो सूर्य सारा,
हम हथेली पर लिए हैं , आसमानों के सितारे,
किंतु हम ही जानते हैं, हम कहाँ,कितना हैं हारे,
आँसुओं को,
मुस्कुराने का रहा अभ्यास !
जब लगा ऐसा कि हमने पा लिया सब कुछ कहीं पर ,
तब न जाने क्या बिखर कर छूट जाता है वहीं पर,
और जीवन क्या ? कि जैसे इस अनिश्चित सी कहानी,
ये कथा युग की, नहीं किसने सुनी, किसने न जानी ?
एक पल साम्राज्य
अगले पल विषम वनवास !
जो मिला, खो भी गया,तो भी भला संताप क्या है ?
व्यर्थ रोना बैठकर, इससे अधिक अब पाप क्या है?
उलझनें जीवन की, हमको जब भी चाहें आजमाएँ,
हो जिन्हें अभिमान, सपने बेझिझक वो टूट जाएँ,
किंतु टूटेगा नहीं ,
मन का अटल विश्वास !





















