मेरी हार मनाने वालों

मेरी हार मनाने वालो, तुमको अग्रिम आमंत्रण है ,
मेरे विजय उत्सवों में ,
होगा पहला सत्कार तुम्हारा !
तुम अमृत के स्वर्ण कलश में,छल से विष लेकर के आए,
काँटों को परिधान फूल के पहना पहना कर ले लाए,
मैं इससे अनभिज्ञ नहीं हूँ, समझ रही हूँ खेल तुम्हारे,
जाओ ! मुझसे मत उलझो, ये युद्ध बड़े बेमेल तुम्हारे ,
भली-भाँति है ज्ञात मुझे अब,
ये दोहरा व्यवहार तुम्हारा !
भाग्यवान बस तुम्हीं नहीं,मुझको भी कुछ वरदान मिले हैं,
आचरणों से जिन्हें कमाया, मेरे भी वो पुण्य फले हैं
परिवर्तित हो चुका समय,अब चाल न होगी चौसर वाली,
द्यूत सभाओ, सावधान! असहाय न इस युग की पांचाली ,
तुम क्या उसका न्याय करोगे,
अन्यायी दरबार तुम्हारा !
जिन आँखो में अश्रु देखने की रखते हो तुम अभिलाषा,
उन पलकों में दृढ़ विश्वासों, की रहती है अविचल आशा,
मैं स्वप्नों के खंडहरों पर, गीत सर्जना के गाऊँगी
और अनागत उत्कर्षों में, बात यही फिर दोहराऊँगी,
तुम बिन जीत अधूरी रहती,
अतः बहुत आभार तुम्हारा !
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कितना सुंदर गीत है भाई, कहाँ से आते हैं इतने ज़बरदस्त भाव तुम्हारे मन में। हम तो आश्चर्य में हैं बिटिया रानी।