कौन चुपके से हवा में घोलता है प्यार

मौन की चादर पड़ी है,
रात के अंतिम प्रहर पर,
कोई जादूगर सा आया,
आसमानों से उतर कर,
सो गया जब नींद के आँचल में ये संसार,
कौन चुपके से हवा में घोलता है प्यार !
ओढ़नी इक स्याह ओढ़े है गगन पर
कौन, जो उसमें सितारे टाँकता है ?
दीप किसको तक रहे हैं? कौन है जो,
आसमाँ की खिड़कियों से झाँकता है,
पंखुड़ी, फूलों की आँखे ढक रही हैं,
चाँदनी चंदा से अपने,
कर रही अभिसार !
कौन, जिसके इंगितों पर झिलमिलाते ,
जगमगाकर जल उठे हैं सब सितारे,
कोई जादू की छड़ी से छू रहा है,
खिलखिलाकर खिल उठे हैं फूल सारे,
या कि पाकर के कहीं एकांत के क्षण,
कर रही है धरती किसी से
प्यार से मनुहार !
हो रहे हैं प्राण सम्मोहित धरा के,
कोई मायाजाल डाले जा रहा है,
वो अँधेरो का कोई है देवता जो ,
दे सुबह को सब उजाले जा रहा है ,
कह रहा है, ‘दिन शिखर है जिस सृजन का’,
याद रखना, ‘ रात उस
निर्माण का आधार’ !
✍️Swarika Kirti





















