गीतसामान्य

माँ

📅 October 9, 2026 ⏱ 1 मिनट ◉ 19 views 💬 0 comments

जिसमें ख़ुद को भूल चुकी हो,

क्या इतनी ही ये दुनिया थी?

माँ मुझको एक बात बताओ,

माँ होने से पहले क्या थी ?

 

 

नानी इक दिन बता रही थी बचपन वाली बात तुम्हारी,

वो क़िस्से,वो कहानियाँ सब, वो सपनों के चाँद सितारे,

कितना कुछ छूटा है तुमसे, एक तुम्हारे माँ होने में ,

तुमने हमको सौंप दिए हैं अपने हिस्से के उजियारे,

 

तेरे सब वरदान मिटे तब,

मेरे हिस्से एक दुआ थी !

 

पर माँ मैं ये सोच रही हूँ, अगर नहीं तुम सी हो पाई?

कितनी कमतर रह जाऊँगी ममता की तय परिभाषा में?

क्या मातृत्व मेरा अपराधी हो जाएगा इतने भर से,

यदि अपने कुछ स्वप्न बचा लूँ, मैं अपनी ही अभिलाषा में?

 

‘ये देवी सा मान’ , अनुग्रह ,

या सुनियोजित कोई सज़ा थी?

 

हम कब माँओं से बोलेंगे ? माँ ! हमसे ये भूल हुई है,

तेरे त्यागों को पूजा पर, पीड़ाओं का ध्यान न आया,

ममता के कोमल कंधों पर, बोझ बहुत है आदर्शों का,

उसको ईश्वर कहकर, उससे, उसके होने को बिसराया ,

 

जो औरों को महकाती थी,

उसके हक़ भी वही हवा थी ।

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