ग़ज़लसामान्य
गुलशन मुस्करा सा गया

***** गुलशन मुस्करा सा गया ****
*************************
सबा आई तो गुलशन मुस्कुरा-सा गया,
चमन में कोई नग़्मा गुनगुना-सा गया।
शफ़क़ रंग लेकर फ़लक पर सजी,
क्षितिज का नज़ारा निखरता गया।
हवा छू के पत्तों को जब गुनगुनाई,
हर इक शाख़ पर गीत ठहरता गया।
महकती हुई रात , चाँदनी की चादर,
सितारों का आँगन सँवरता गया।
नदी की रवानी में संगीत था,
किनारा भी ख़्वाबों में बहता गया।
परिंदों ने छेड़ी सहर की तरन्नुम,
उजाला फ़िज़ाओं में भरता गया।
‘मन सीरत’ ने देखा तो कुदरत के रंग,
हर इक ज़र्रा ख़ुद में ख़ुदा-सा लगा।
*************************
सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)
रचना पसंद आई? रचनाकार का उत्साह बढ़ाएँ
Reward स्वैच्छिक है और राशि सीधे रचनाकार के QR पर भेजी जाती है; वेबसाइट भुगतान सत्यापित नहीं करती।1 टिप्पणियाँ
सभी पाठकों और रचनाकारों की सार्वजनिक प्रतिक्रियाएँ
Comments बंद हैं।















wah