रचनासामान्य

इस्लाह ए मुशायरा

📅 September 27, 2026 ⏱ 1 मिनट ◉ 18 views 💬 1 comments

****** इस्लाह-ए-मुआशरा ******
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जहाँ में प्यार की ख़ुशबू बिखरती जाए,
हर एक दिल से नफ़रत निकलती जाए।

न हो मज़हब की दीवारें दिल के दरमियाँ,
इंसाँ से बस मोहब्बत ही सँवरती जाए।

गरीबों की भी आँखों में चमक पैदा हो,
हर एक बस्ती में खुशहाली उतरती जाए।

न बेटी को समझो बोझ, न बेटे को ताज,
हर एक औलाद बराबर निखरती जाए।

दहेज़,ज़ुल्म और नफ़रत का हो ख़ातिमा,
नई तहज़ीब की शम्अ जलती जाए।

जो इल्म बाँटता है, वही रौशन है यहाँ,
हर एक हाथ में किताबें ही ठहरती जाएँ।

‘मनसीरत’ यही पैग़ाम रहे उम्र भर,
इंसानियत हर दिल में सँवरती जाए।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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1 टिप्पणियाँ

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  1. Swadha Ravindra

    वाह वाह

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