ग़ज़लसामान्य

सुबह सुहानी

📅 October 1, 2026 ⏱ 1 मिनट ◉ 15 views 💬 1 comments

***सुबह सुहानी***
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सुबह सुहानी आई है,
नूर-ए-रूहानी आई है।

बाद-ए-सबा के झोंकों में,
ख़ुशबू मस्तानी आई है।

गुलशन के हर इक गोशे में,
रौनक़ पुरानी आई है।

बुलबुल की मीठी नग़्मों में,
धुन कोई सुहानी आई है।

ओस की बूँदें फूलों पर,
जैसे जवानी आई है।

दिल में ज़िक्र-ए-यार हुआ,
याद भी पुरानी आई है।

सजदे में जब झुका ये दिल,
रूह में आसानी आई है।

‘मनसीरत’ की ग़ज़लों में,
आज रवानी आई है।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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1 टिप्पणियाँ

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  1. Swadha Ravindra

    वाह वाह वाह

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