रचनासामान्य
फलक पे आफताब आया
फलक पे आफताब आयासुखविन्द्र सिंह मनसीरत
* फलक पे आफताब आया+
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सहर हुई, निखार आया,
फ़लक पे आफ़्ताब आया।
शफ़क़ ने रंग बिखराए,
चमन में फिर बहार आया।
नसीम-ए-सुब्ह जब गुज़री,
लबों पर इक ख़ुमार आया।
सियाह शब सिमटती गई,
जहाँ में फिर उजाला आया।
किरण उतरी जो धरती पर,
हर इक ज़र्रा नूर पाया।
ख़मोशी टूटती गई,
परिंदों का भी नग़्मा आया।
झुका जब सर इबादत में,
दिल-ए-मुज़्तर को क़रार आया।
मन सीरत ने सहर देखी,
तो दिल में इश्क़-ए-यार आया।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)
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वाह !