रचनासामान्य

नशा नशीली निगाहों का

📅 September 28, 2026 ⏱ 1 मिनट ◉ 14 views 💬 1 comments

**** नशा नशीली निगाहों का ****
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नशा नशीली निगाहों का जीने न दें,
चैन की घूँट भी जी भरकर पीने न दें।

दर्द इतना है कि आँसू भी न थमने पाएँ,
ज़ख़्म दिल के हमें खुलकर न सीने न दें।

इश्क़ में हार भी जाएँ तो गिला क्या उनसे,
वो हमारी कोई उम्मीद न छीने न दें।

उनकी यादों का नशा ऐसा चढ़ा है दिल पर,
हमको दुनिया में किसी और को जीने न दें।

रात तन्हा हो तो फिर चाँद से बातें होंगी,
ख़्वाब आँखों से मेरी वो भी न छीने न दें।

उनकी तस्वीर को सीने से लगाए रखना,
वक़्त गुज़रे मगर इस याद को फीके न दें।

‘मनसीरत’ इश्क़ की दुनिया में यही चाहत है,
दिल को मरने न दें, अरमान को जीने न दें।
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सुखविन्द्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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1 टिप्पणियाँ

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  1. Swadha Ravindra

    वाह वाह

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