रचनासामान्य
नशा नशीली निगाहों का

**** नशा नशीली निगाहों का ****
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नशा नशीली निगाहों का जीने न दें,
चैन की घूँट भी जी भरकर पीने न दें।
दर्द इतना है कि आँसू भी न थमने पाएँ,
ज़ख़्म दिल के हमें खुलकर न सीने न दें।
इश्क़ में हार भी जाएँ तो गिला क्या उनसे,
वो हमारी कोई उम्मीद न छीने न दें।
उनकी यादों का नशा ऐसा चढ़ा है दिल पर,
हमको दुनिया में किसी और को जीने न दें।
रात तन्हा हो तो फिर चाँद से बातें होंगी,
ख़्वाब आँखों से मेरी वो भी न छीने न दें।
उनकी तस्वीर को सीने से लगाए रखना,
वक़्त गुज़रे मगर इस याद को फीके न दें।
‘मनसीरत’ इश्क़ की दुनिया में यही चाहत है,
दिल को मरने न दें, अरमान को जीने न दें।
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सुखविन्द्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)
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