विधाओं पर लेख

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विभिन्न साहित्यिक विधाओं की जानकारी, नियम, संरचना और उदाहरणों पर लेखकों द्वारा प्रकाशित लेख।

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बेवफ़ा की याद में

******* बेवफ़ा की याद में ******
*****”*******************

बेवफ़ा की याद में फूट – फूट कर रोए,
आँसुओं की धार में कूट – कूट ग़म धोए।

रात भर तन्हाइयों ने चैन लेने न दिया,
चाँद को ताकते रहे हम जागते ही सोए।

दिल दिया था प्यार से,बदले में क्या मिला,
ज़ख़्म इतने मिल गए,ख़्वाब सारे खोए।

उसकी यादें आज भी सीने में चुभती हैं,
हम हँसे दुनिया के आगे,पर रात भर रोए।

वो गया तो साथ अपने खुशियाँ ले गया,
हम यहाँ वीरानियों में भी उम्र भर के रोए।

इश्क़ की राह में हमने क्या कुछ नहीं सहा,
उसके सारे ज़ुल्म को प्यार समझकर धोए।

अब न कोई आस है, न कोई शिकवा रहा,
मनस़ीरत हम तो किस्मत के भरोसे सोए।
***************************
सुखविन्द्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

बेवफ़ा की याद में

 

******* बेवफ़ा की याद में ******
*****”*******************

बेवफ़ा की याद में फूट – फूट कर रोए,
आँसुओं की धार में कूट – कूट ग़म धोए।

रात भर तन्हाइयों ने चैन लेने न दिया,
चाँद को ताकते रहे हम जागते ही सोए।

दिल दिया था प्यार से,बदले में क्या मिला,
ज़ख़्म इतने मिल गए,ख़्वाब सारे खोए।

उसकी यादें आज भी सीने में चुभती हैं,
हम हँसे दुनिया के आगे,पर रात भर रोए।

वो गया तो साथ अपने खुशियाँ ले गया,
हम यहाँ वीरानियों में भी उम्र भर के रोए।

इश्क़ की राह में हमने क्या कुछ नहीं सहा,
उसके सारे ज़ुल्म को प्यार समझकर धोए।

अब न कोई आस है, न कोई शिकवा रहा,
मनस़ीरत हम तो किस्मत के भरोसे सोए।
***************************
सुखविन्द्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

बेवफ़ा की याद में

 

******* बेवफ़ा की याद में ******
*****”*******************

बेवफ़ा की याद में फूट – फूट कर रोए,
आँसुओं की धार में कूट – कूट ग़म धोए।

रात भर तन्हाइयों ने चैन लेने न दिया,
चाँद को ताकते रहे हम जागते ही सोए।

दिल दिया था प्यार से,बदले में क्या मिला,
ज़ख़्म इतने मिल गए,ख़्वाब सारे खोए।

उसकी यादें आज भी सीने में चुभती हैं,
हम हँसे दुनिया के आगे,पर रात भर रोए।

वो गया तो साथ अपने खुशियाँ ले गया,
हम यहाँ वीरानियों में भी उम्र भर के रोए।

इश्क़ की राह में हमने क्या कुछ नहीं सहा,
उसके सारे ज़ुल्म को प्यार समझकर धोए।

अब न कोई आस है, न कोई शिकवा रहा,
मनस़ीरत हम तो किस्मत के भरोसे सोए।
***************************
सुखविन्द्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

******* बेवफ़ा की याद में ****** *****”******************* बेवफ़ा की याद में फूट – फूट कर रोए, आँसुओं की धार में कूट – कूट ग़म धोए। रात भर तन्हाइयों ने चैन लेने न दिया, चाँद को ताकते रहे हम जागते ही सोए। दिल दिया था प्यार से,बदले में क्या मिला, ज़ख़्म इतने मिल गए,ख़्वाब सारे खोए। उसकी यादें आज भी सीने में चुभती हैं, हम हँसे दुनिया के आगे,पर रात भर रोए। वो गया तो साथ अपने खुशियाँ ले गया, हम यहाँ वीरानियों में भी उम्र भर के रोए। इश्क़ की राह में हमने क्या कुछ नहीं सहा, उसके सारे ज़ुल्म को प्यार समझकर धोए। अब न कोई आस है, न कोई शिकवा रहा, मनस़ीरत हम तो किस्मत के भरोसे सोए। *************************** सुखविन्द्र सिंह मनसीरत खेड़ी राओ वाली (कैथल)

******* बेवफ़ा की याद में ******
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बेवफ़ा की याद में फूट – फूट कर रोए,
आँसुओं की धार में कूट – कूट ग़म धोए।

रात भर तन्हाइयों ने चैन लेने न दिया,
चाँद को ताकते रहे हम जागते ही सोए।

दिल दिया था प्यार से,बदले में क्या मिला,
ज़ख़्म इतने मिल गए,ख़्वाब सारे खोए।

उसकी यादें आज भी सीने में चुभती हैं,
हम हँसे दुनिया के आगे,पर रात भर रोए।

वो गया तो साथ अपने खुशियाँ ले गया,
हम यहाँ वीरानियों में भी उम्र भर के रोए।

इश्क़ की राह में हमने क्या कुछ नहीं सहा,
उसके सारे ज़ुल्म को प्यार समझकर धोए।

अब न कोई आस है, न कोई शिकवा रहा,
मनस़ीरत हम तो किस्मत के भरोसे सोए।
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सुखविन्द्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

******* बेवफ़ा की याद में ****** *****”******************* बेवफ़ा की याद में फूट – फूट कर रोए, आँसुओं की धार में कूट – कूट ग़म धोए। रात भर तन्हाइयों ने चैन लेने न दिया, चाँद को ताकते रहे हम जागते ही सोए। दिल दिया था प्यार से,बदले में क्या मिला, ज़ख़्म इतने मिल गए,ख़्वाब सारे खोए। उसकी यादें आज भी सीने में चुभती हैं, हम हँसे दुनिया के आगे,पर रात भर रोए। वो गया तो साथ अपने खुशियाँ ले गया, हम यहाँ वीरानियों में भी उम्र भर के रोए। इश्क़ की राह में हमने क्या कुछ नहीं सहा, उसके सारे ज़ुल्म को प्यार समझकर धोए। अब न कोई आस है, न कोई शिकवा रहा, मनस़ीरत हम तो किस्मत के भरोसे सोए। *************************** सुखविन्द्र सिंह मनसीरत खेड़ी राओ वाली (कैथल)

******* बेवफ़ा की याद में ******
*****”*******************

बेवफ़ा की याद में फूट – फूट कर रोए,
आँसुओं की धार में कूट – कूट ग़म धोए।

रात भर तन्हाइयों ने चैन लेने न दिया,
चाँद को ताकते रहे हम जागते ही सोए।

दिल दिया था प्यार से,बदले में क्या मिला,
ज़ख़्म इतने मिल गए,ख़्वाब सारे खोए।

उसकी यादें आज भी सीने में चुभती हैं,
हम हँसे दुनिया के आगे,पर रात भर रोए।

वो गया तो साथ अपने खुशियाँ ले गया,
हम यहाँ वीरानियों में भी उम्र भर के रोए।

इश्क़ की राह में हमने क्या कुछ नहीं सहा,
उसके सारे ज़ुल्म को प्यार समझकर धोए।

अब न कोई आस है, न कोई शिकवा रहा,
मनस़ीरत हम तो किस्मत के भरोसे सोए।
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सुखविन्द्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

प्रण हुआ पूरा कि वापस आ रहे हैं राम

#गीत 🙏

हो गए हैं वर्ष चौदह पूर्ण , उत्सव का समय है,
दृष्टि राहों पर बिछी है, सृष्टि सारी राममय है,

आज शुभ संदेश आया है अवध के नाम ,
प्रण हुआ पूरा,
कि वापस आ रहे हैं राम !

‘आ रहे हैं राम !’ कोई स्वप्न है या कल्पना है ?
पूछकर माँ रो पड़ी क्या सत्य है जो भी सुना है ?
द्वार अपलक देखती सब आहटों को सुन रही है,
बावली सी उंगलियों पर वर्ष फिर-फिर गिन रही है,

प्रार्थनाओं को मिला उनका सुखद परिणाम ,
प्रण हुआ पूरा,
कि वापस आ रहे हैं राम !

एक मन जो ग्लानि के संताप से गलता रहा है,
द्वंद कैकेयी के अंतर में यही चलता रहा है,
जो मिला वरदान वो अभिशाप बनकर रह गया था,
हाय जीवन मात्र पश्चाताप बनकर रह गया था,

अब मिटे पीड़ा ,मिटे ये प्राण का संग्राम !
प्रण हुआ पूरा,
कि वापस आ रहे हैं राम !

दो नयन ऐसे वचन में थे बँधे रो भी न पाए,
पार सीमा के सदा ही मौन हो जातीं व्यथाएँ ,
धैर्य ने जिसके चरण छूकर नया उपमान पाया,
उर्मिला के त्याग ने है आज शुभ वरदान पाया,

पूर्ण हो अब ये प्रतीक्षा अनवरत, अविराम !
प्रण हुआ पूरा,
कि वापस आ रहे हैं राम !

©️ Swarika Kirti 🙏

इस बार कछुआ नहीं, खरगोश जीत गया

इस बार कछुआ नहीं, खरगोश जीत गया (बाल कहानी)

जंगल के राजा शेर की गुफा से जंगल के मंत्री हाथी का निवास दस मील की दूरी पर था। मंत्री हाथी ने जंगल के संविधान के लिए जंगल-ग्रंथ तैयार किया। अनुमोदन के लिए राजा शेर तक पंहुचाना था। हाथी ने जंगल-ग्रंथ की तीन प्रतियां बनाईं और खरगोश, कछुआ और चूहे को एक-एक प्रति देते हुए कहा- ‘तुम तीनों में से जो सबसे पहले इस जंगल-ग्रंथ को राजा शेर तक पंहुचाएगा, राजा शेर उसे जंगल का अधिकारी बनायेंगे।’
कछुआ, खरगोश और चूहा, तीनों जंगल-ग्रंथ को ले कर शेर की गुफा की ओर चल पड़े। जंगल के रास्ते में कुछ दूर जा कर खरगोश एक पत्थर पर बैठा तो कछुआ खुश हो गया कि पिछली बार की तरह इस बार भी अब यह सो जाएगा और मैं जीत जाऊंगा। उधर पीछे चूहा जंगल-ग्रंथ के भार से परेशान हो रहा था। सामने उसे भालू की गुफा दिखाई दी तो वह उसमें घुस गया। वहां चूहे को कम्प्यूटर दिखा तो उसने माऊस क्लिक किया और जंगल-ग्रंथ की पीडीएफ बना कर राजा शेर की ईमेल पर उसे मेल कर दिया। उसके बाद वह जंगल-ग्रंथ को कुतर कर खाली हाथ प्रसन्नता पूर्वक राजा की गुफा की ओर चल पड़ा।
रास्ते में उसने पत्थर पर बैठे खरगोश को जंगल-ग्रंथ के पन्ने पलटते देखा तो वह हंसते हुए आगे बढ़ गया। किन्तु कछुआ बहुत आगे निकल गया था। हाथ और पूंछ हिलाता हुआ चूहा भी राजा शेर को ईमेल से जंगल ग्रंथ भेजने की बात बताने के लिए सरपट दौड़ लगा रहा था।
कछुआ सात मील और चूहा पांच मील की दूरी तय कर चुके थे और खरगोश का कहीं अता-पता नहीं था। जंगल में बारीश शुरू हो गई थी। आंधी से पेड़ भी उखड़ने लगे थे। किन्तु बाधाओं को पार करते हुए कछुआ सबसे पहले राजा शेर तक पंहुच गया और हाथी का संदेश सुनाते हुए पीठ पर से जंगल-ग्रंथ उतार कर शेर को दे दिया। ग्रंथ देख कर शेर की आंखें लाल हो गईं। क्योंकि बारीश से सारा ग्रंथ गीला हो गया था और उसमें लिखी हुई सारी बातें धुल गई थीं। सारे पन्ने गीले और कोरे थे.
क्रोधित हो कर राजा शेर ने कहा- ‘दूर हट मेरी नजरों से।’ डर के मारे कछुआ भाग कर झाड़ी में छिप गया।
कुछ मिनट बाद दौड़ता हुआ चूहा पंहुचा और उसने भी हाथी का संदेश सुनाते हुए शेर को ईमेल देखने का आग्रह किया।
राजा शेर बोला-‘देख नहीं रहे हो! आंधी से खम्बे उखड़ गए और बिजली भी चली गई। इन्टरनेट भी नहीं है।’ शेर ने पूछा ‘ग्रंथ कहां है?’
चूहा बोला, ‘वह तो कुतर दिया है।’
तब शेर ने उसे भी कहा कि ‘हट जा मेरी नजरों से।’
डर के मारे चूहा भी भाग कर झाड़ी में छिप गया। उनके पंहुचने के दो घंटे बाद खरगोश भी राजा शेर की गुफा में पंहुचा और हाथी का सन्देश सुनाते हुए बोला, ‘महाराज! क्षमा करें, बारीश में सारा ग्रंथ धुल गया। पन्ने गीले और कोरे हो गए। किन्तु महाराज, रास्ते में पत्थर पर बैठ कर मैंने पहले ही पूरी पुस्तक याद कर ली थी। कृपया पहले मुझसे जंगल-ग्रंथ को मौखिक सुन लें, फिर मैं यहीं पर लिख कर ग्रन्थ रूप में भी आपको दे दूंगा।’
शेर ने खरगोश से पूरा ग्रन्थ सुना और खुश हो कर उसे जंगल का अधिकारी नियुक्त कर दिया। झाड़ी से निकल कर कछुआ और चूहे ने खरगोश को बधाई देते हुए कहा कि ‘बधाई मित्र!’ आज हमने सीख लिया है कि तकनीक और मौसम धोखा दे सकते हैं, मगर याद किया हुआ हमेशा साथ रहता है।’

तमस पर जीवन के जय की, कोशिशें जारी रहेंगी

तमस पर जीवन के जय की, कोशिशें जारी रहेंगी

घावों पर संजीवनी की,बारिशें जारी रहेंगी।।
तमस पर जीवन के जय की, कोशिशें जारी रहेंगी।

यदि हुआ नुकसान फिर भी, हौसला तुम कम न करना।
विषभरे,अतिसूक्ष्म दुश्मन हैं, मगर फिर भी न डरना।
मुश्किलें यदि हैं बढ़ीं खुद पर, भरोसा कम न करना
चुनौती यह ज़िन्दगी की, जिजीविषा कुंद न करना।
ध्वंस में भी फिर सृजन की, ख्वाहिशें जारी रहेंगी।
तमस पर जीवन के जय की, कोशिशें जारी रहेंगी।1

तुम में अस्थी दधीचि की, वज्र बन कर असुर मारे।
तुम धनुर्धर पार्थ-सा बन,बींध डालो शत्रु सारे।
भगीरथ के तप की सलिला, बह रही उर में तुम्हारे।
सती-सावित्री की जिद-सा खींच लाओ प्राण प्यारे।
तुम्हारे रास्तों में गुलशन नर्गिसें जारी रहेंगी।
तमस पर जीवन के जय की, कोशिशें जारी रहेंगी।2

प्रलय को भी पार कर के, सृष्टि पनपी है तुम्हारी।
आंधियों, तूफानों और भूकम्प से हरगिज न हारी।
है तुम्हारे लिए मंगल-चांद का अभियान जारी
पेड़ पौधे वनस्पतियां, तुम्हारी है प्रकृति सारी
बहारें लाने की खातिर, पावसें जारी रहेंगी।
तमस पर जीवन के जय की, कोशिशें जारी रहेंगी।3

हिंसकों से लड़े हो तुम, सिंह, विषधर से न हारे
समुद्रों को मथा तुमने, चीर कर पर्वत संवारे।
तुम से है ये दुनियादारी, अनेकों के तुम सहारे
तुम न हरगिज़ हो अकेले, साथ हम सब हैं तुम्हारे,
मुक्त मन से मिलन की वे मजलिसें जारी रहेंगी।
तमस पर जीवन के जय की, कोशिशें जारी रहेंगी।4

घावों पर संजीवनी की,बारिशें जारी रहेंगी।
तमस पर जीवन के जय की, कोशिशें जारी रहेंगी।।

कानखजूरे

कानखजूरे
(कहानी)

आज मैंने ज़मीन के कोने से झांकते हुए कई कानखजूरे देखे तो मुझे बचपन में अपनी दादी के सान्निध्य की कुछ बातें याद आ गयी। दादी बोलती थी कि ‘लापरवाह मत रहो, वरना कानखजूरा कान में घुस जाएगा।’एक बार मैंने दादी से पूछा था कि ‘दादी! कान में कानखजूरा घुसने से क्या होता है?’ दादी बोली थी कि ‘बड़ा भारी अनर्थ। कानखजूरा दिमाग में घुस जाता है तो वहां वह हजारों अण्डे देता है। अण्डे से कानखजूरे के बच्चे निकलते हैं। फिर आदमी के दिमाग़ में कानखजूरे ही कानखजूरे। तब आदमी का दिमाग़ खराब हो जाता है।जो नहीं करना चाहिए, वह करने लगता है। दूसरों को मारने लगता है। यहां तक कि आत्महत्या भी कर लेता है।’

‘ओहो!’ लम्बी सांस लेकर डरते हुए मैंने पूछा था कि ‘दादी! कानखजूरा कहां रहता है?’ दादी बोली थी ‘जहां हम रहते हैं। वह हमारे उठने-बैठने वाले स्थान के आसपास ही रहता है।’ मेरा भय बढ़ता जा रहा था, तब मैंने पूछा कि ‘कानखजूरा कैसे होता है?’ तब दादी ने बताया था कि ‘वह छोटा-बड़ा, भूरा, सांवला आदि कई तरह का होता है। उसके सौ पैर होते हैं। किसी-किसी के डेढ़ सौ पैर भी होते हैं।’ मैंने आश्चर्य से पूछा था कि ‘ इतने पैर? दादी इतने पैर से वह क्या करता है? चलने के लिए तो दो ही काफी हैं।’ दादी ने कहा कि ‘वह हमारी तरह नहीं चलता है, वह तो सरपट रेंगता रहता है, कभी यहां, कभी वहां। घुसने के लिए जगह ढूंढता रहता है।’

बालमन की उत्सुकतावश मैंने पूछा था ‘दादी! वह कान भी ढूंढता है?’ दादी बोली ‘हां, जो लापरवाह रहते हैं, झट से उनके कान में घुस जाता है।’ पर मेरे मन की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी, मैंने दादी से फिर पूछा था ‘पर दादी! मैं तो लापरवाह नहीं रहूंगा। मगर मेरा भाई या दोस्त लापरवाह हो गया और उसके कान में कानखजूरा घुस गया और उसका दिमाग़ खराब हो गया तो वह मुझे भी मार देगा।’ दादी बोली थी कि ‘हां ऐसा तो है। पर तुम्हें पहचानना होगा कि किस-किस के कान में कानखजूरा घुस गया। उन लोगों से भी तुम्हें बचना होगा।’ मेरी जिज्ञासा शान्त नहीं हुई तो मैंने पूछा ‘पर दादी! कैसे पता चलेगा कि किस-किस के कान में कानखजूरा घुस गया है?’ दादी बोली थी कि ‘जिसके कान में घुसता है, उसकी आंखों और हाव-भाव से पता चल जाता है।’
दादी की बातें सुनकर मेरी जिज्ञासाएं और अधिक बढ़ गयी थी। फिर एक दिन मेरी जिद पर दादी ने ढूंढ-ढांढ कर मुझे कानखजूरा भी दिखाया। सचमुच, कई कई पैरों वाला, सरपट रेंगने वाला। देखने में छोटा, किन्तु अन्वेषी प्रवृत्ति का। वह खोज में था कि कहां घुसे! एक दिन मैंने दादी से कानखजूरे से प्रभावित व्यक्तियों को भी दिखाने के लिए कहा तो दादी ने कुछ नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति दिखा दिए थे और चुपके से कान में कहा था कि ‘इनसे बच कर रहना।’ उनको देख कर मैंने मान लिया था कि ये कानखजूरे से ही प्रभावित हैं।
जब मैं मात्र सात साल का था तो दादी दिवंगत हो गयी थी। दादी के जाने के बाद कानखजूरों से बचने के अभियान में मैं अकेला रह गया था। उस समय मैंने मन में ठान लिया था कि मैं कभी लापरवाह नहीं रहूंगा और अपने लोगों को भी लापरवाह होने से बचाऊंगा। तब से कहीं भी जब कभी कानखजूरा दिखाई देता था तो मुझे अपनी दादी की बातें याद आ जाती और मैं अपने मन में ठान लेता था कि लापरवाह नहीं रहना है।
जीवन में कई मौकों पर भिन्न-भिन्न किस्म के कानखजूरे मिलते रहे, पर मैंने उन्हें अपने कान में घुसने नहीं दिया। कानखजूरों से प्रभावित लोग भी मिले। उन्होंने मुझे मारने की कोशिशें भी की, किन्तु दादी की सीख ने मुझे लापरवाह होने से बचा लिया। आज मैं दादी के प्रति कृतज्ञ हूं कि उन्होंने समय पर मुझे खानखजूरों की पहचान करवा दी थी।

कानखजूरे

कानखजूरे
(कहानी)

आज मैंने ज़मीन के कोने से झांकते हुए कई कानखजूरे देखे तो मुझे बचपन में अपनी दादी के सान्निध्य की कुछ बातें याद आ गयी। दादी बोलती थी कि ‘लापरवाह मत रहो, वरना कानखजूरा कान में घुस जाएगा।’एक बार मैंने दादी से पूछा था कि ‘दादी! कान में कानखजूरा घुसने से क्या होता है?’ दादी बोली थी कि ‘बड़ा भारी अनर्थ। कानखजूरा दिमाग में घुस जाता है तो वहां वह हजारों अण्डे देता है। अण्डे से कानखजूरे के बच्चे निकलते हैं। फिर आदमी के दिमाग़ में कानखजूरे ही कानखजूरे। तब आदमी का दिमाग़ खराब हो जाता है।जो नहीं करना चाहिए, वह करने लगता है। दूसरों को मारने लगता है। यहां तक कि आत्महत्या भी कर लेता है।’

‘ओहो!’ लम्बी सांस लेकर डरते हुए मैंने पूछा था कि ‘दादी! कानखजूरा कहां रहता है?’ दादी बोली थी ‘जहां हम रहते हैं। वह हमारे उठने-बैठने वाले स्थान के आसपास ही रहता है।’ मेरा भय बढ़ता जा रहा था, तब मैंने पूछा कि ‘कानखजूरा कैसे होता है?’ तब दादी ने बताया था कि ‘वह छोटा-बड़ा, भूरा, सांवला आदि कई तरह का होता है। उसके सौ पैर होते हैं। किसी-किसी के डेढ़ सौ पैर भी होते हैं।’ मैंने आश्चर्य से पूछा था कि ‘ इतने पैर? दादी इतने पैर से वह क्या करता है? चलने के लिए तो दो ही काफी हैं।’ दादी ने कहा कि ‘वह हमारी तरह नहीं चलता है, वह तो सरपट रेंगता रहता है, कभी यहां, कभी वहां। घुसने के लिए जगह ढूंढता रहता है।’

बालमन की उत्सुकतावश मैंने पूछा था ‘दादी! वह कान भी ढूंढता है?’ दादी बोली ‘हां, जो लापरवाह रहते हैं, झट से उनके कान में घुस जाता है।’ पर मेरे मन की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी, मैंने दादी से फिर पूछा था ‘पर दादी! मैं तो लापरवाह नहीं रहूंगा। मगर मेरा भाई या दोस्त लापरवाह हो गया और उसके कान में कानखजूरा घुस गया और उसका दिमाग़ खराब हो गया तो वह मुझे भी मार देगा।’ दादी बोली थी कि ‘हां ऐसा तो है। पर तुम्हें पहचानना होगा कि किस-किस के कान में कानखजूरा घुस गया। उन लोगों से भी तुम्हें बचना होगा।’ मेरी जिज्ञासा शान्त नहीं हुई तो मैंने पूछा ‘पर दादी! कैसे पता चलेगा कि किस-किस के कान में कानखजूरा घुस गया है?’ दादी बोली थी कि ‘जिसके कान में घुसता है, उसकी आंखों और हाव-भाव से पता चल जाता है।’
दादी की बातें सुनकर मेरी जिज्ञासाएं और अधिक बढ़ गयी थी। फिर एक दिन मेरी जिद पर दादी ने ढूंढ-ढांढ कर मुझे कानखजूरा भी दिखाया। सचमुच, कई कई पैरों वाला, सरपट रेंगने वाला। देखने में छोटा, किन्तु अन्वेषी प्रवृत्ति का। वह खोज में था कि कहां घुसे! एक दिन मैंने दादी से कानखजूरे से प्रभावित व्यक्तियों को भी दिखाने के लिए कहा तो दादी ने कुछ नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति दिखा दिए थे और चुपके से कान में कहा था कि ‘इनसे बच कर रहना।’ उनको देख कर मैंने मान लिया था कि ये कानखजूरे से ही प्रभावित हैं।
जब मैं मात्र सात साल का था तो दादी दिवंगत हो गयी थी। दादी के जाने के बाद कानखजूरों से बचने के अभियान में मैं अकेला रह गया था। उस समय मैंने मन में ठान लिया था कि मैं कभी लापरवाह नहीं रहूंगा और अपने लोगों को भी लापरवाह होने से बचाऊंगा। तब से कहीं भी जब कभी कानखजूरा दिखाई देता था तो मुझे अपनी दादी की बातें याद आ जाती और मैं अपने मन में ठान लेता था कि लापरवाह नहीं रहना है।
जीवन में कई मौकों पर भिन्न-भिन्न किस्म के कानखजूरे मिलते रहे, पर मैंने उन्हें अपने कान में घुसने नहीं दिया। कानखजूरों से प्रभावित लोग भी मिले। उन्होंने मुझे मारने की कोशिशें भी की, किन्तु दादी की सीख ने मुझे लापरवाह होने से बचा लिया। आज मैं दादी के प्रति कृतज्ञ हूं कि उन्होंने समय पर मुझे खानखजूरों की पहचान करवा दी थी।