रचनासामान्य

साहिर लुधियानवी की जीवनी

📅 October 7, 2026 ⏱ 34 मिनट ◉ 16 views 💬 0 comments

साहिर लुधयानवी एक ऐसे दिलशाद शायर और रूह-आफज़ा गीतकार थे जिन्होंने अपनी नज़्मों,नगमों और ग़ज़लों से हिंदुस्तान की सुखनसंजी की उस रग़ को फिर से ज़िन्दा कर दिया जो ग़ालिब और अल्लामा इक़बाल की मौत के बाद मर सी गयी थी।मिर्ज़ा ग़ालिब और अल्लामा इक़बाल की मौत के बाद ख़ुश जमाल ग़ज़ल बेठौर हो गयी थी,नाज़पर्वरदा नज़्म यतीम हो गयी थी।उन्हें फिर से प्यार भरा प्रश्रय दिया साहिर लुधयानवी ने ।

एक लोककथा के मुताबिक चाँद हर रोज सांवली रात की सुरमई शाख पे बैठ बादलों के बदरोटी स्लेट पे चांदनी के सुनहले हर्फ़ों से ऐसे गीत गढ़ा करता था कि सुनने वाले उसके गीतों के शैदाई हो जाया करते थे । उसे ऐसे ख़ूबसूरत गीत लिखने की सिफ़त उस चमत्कारी टोपी से मिला करती थी जिसे पहन कर चाँद गीतकारी किया करता था।हवा को चाँद से जलन क्या हुई उसने एक दिन चाँद की वह टोपी उछाल दी और टोपी आ गिरी ज़मीन पर एक आदम जात के सर पर जो उस दिन से उस टोपी के चमत्कार की बदौलत चाँद जैसा दिलावेज़ गीत लिखने के हुनर का मालिक हो गया । यह एक लोककथा है पर अगर यह महज़ तस्सवुर न होता और अगर वह टोपी सचमुच ज़मीन पे किसी के सर पे गिरी होती तो यकीनन वो शख्स साहिर लुधयानवी हीं होते ।क्यूंकि उनके हीं गीतों में वो नुराना तास्सुर नज़र आता है जो सुनने वालों के दिल का कोना कोना रौशन कर दिया करता है।

पचास की दशक के आसपास रेडियो दिलबस्तगी का सबसे बड़ा ज़रिया हुआ करता था । दिन भर के काम कमठान से थके लोग रात को किसी ऐसे रईस की बैठक में जमा होते थे जिनके यहाँ रेडियो जैसी लक्ज़री मौजूद होती थी ।हुक्का ,ताश और चाय पानी के दौर के बीच सबको इंतज़ार होता रडियो में प्रसारित होने वाले गाने के उस रंगारंग कार्यक्रम का जिसमे साहिर लुधयानवी के दिलरुबाना गीत सुनाये जाते थे ।उन दिनों साहिर लुधयानवी का गीत वो सुकूनकुन अहसास हुआ करता था,जो दिलजलों की कुढ़न और घुटन पे मरहम लगाने का काम किया करता था ।

 

साहिर लुधयानवी का जन्म और बचपन :

साहिर लुधयानवी का जन्म 8 मार्च सन 1921 में पंजाब के लुधियाना शहर में एक रईस मुस्लिम परिवार में हुआ था ।घर में दौलत की बेशुमारी थी पर प्यार की बड़ी किल्लत थी और उस क़िल्लत की वजह थे साहिर के पिता फज़लदीन ।

‘दीन’ का मतलब होता है ईमान पर साहिर के पिता फज़लदीन के सिर्फ नाम में हीं दीन था। असल ज़िंदगी में ईमान से उनका दूर दूर तक का साबका नहीं था। अपनी अय्याशपरस्त ज़िंदगी में फज़लदीन ने 14 शादियाँ की और अपनी बीबियों को वे महज़ दिलबस्तगी का सामान समझते रहे । साहिर की माँ, सरदार बेग़म एक खुद्दार औरत थीं । उन्होंने अपने इस कमज़र्फ पति की ज़्यादतियों को बर्दाश्त नहीं किया और वह अपने पति की हर ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ आवाज़े-एहतिजाज उठाती रहीं | नतीज़न साहिर के पिता, फज़लदीन और माँ ,सरदार बेग़म में अक्सरहां लड़ाईयां होने लगीं।साहिर लुधयानवी जिन्हें उस छोटी सी उम्र में माँ के पुचकार और बाप के दुलार की दरकार थी ,को नसीब होती थी माँ बाप की रोज़ रोज़ की चिल्लपों,लड़ाई झगड़े।साहिर के माँ-बाप की वो आपसी लड़ाइयां दिनोंदिन बढ़ती गयी और नौबत तलाक तक की आ गयी।

साहिर के पिता साहिर को अपने साथ रखना चाहते थे पर मुक़दमे में वो साहिर की कस्टडी हार गए और साहिर अपनी माँ सरदार बेगम के साथ रहने लगे । इस हार ने साहिर के पिता को इस कदर बौखला दिया कि उन्होंने अपनी पत्नी से बदला लेने के लिए साहिर की जान लेने तक की धमकी दे डाली।उस दिन से सरदार बेगम डर के मुसलसल साए के तले अपने बेटे साहिर की अपने बूते परवरिश करने लगी।रईस पति से नाता तोड़कर सरदार बेगम बिलकुल बेदौलत  हो गयी थी । पति की बदनीयत और ख़ुद की सुरसा सी विकराल मूंह बायीं ज़रूरतें अब साहिर की माँ सरदार बेग़म को शबोरोज़ धमकाने लगीं।अगर इस औरत में जीवट न होता तो कबका ये दोनों माँ बेटे या तो गरीबी या फ़ज़लदीन की बदनीयती की भेंट चढ़ गए होते ।

साहिर के बचपन का नाम अब्दुल हायी था।लुधियाना की एक बस्ती करीमपुरा की वो लाल पत्थर की हवेली जहाँ साहिर का जन्म हुआ था ,जिसके परकोटों के अन्दर  साहिर के बचपन के शुरूआती कुछ साल बीते थे ,जहाँ उनके पिता थे ,पिता की दी अलामतें थीं ,खिलौने थे -वो काठ का घोड़ा ,वो मिटटी का हाथीं ,वो सरकंडे का झूला सब साहिर को ख़ूब याद आता था। सुहानी यादों के ये ख़ूबसूरत बुलबुले हवा में थोड़ी हीं देर तैरते थे कि तभी पिता की कर्कश आवाज़ ,माँ की सिसकन और उनकी रोज़ की आपसी तक़रार की एक आंच उठती थी और उन बुलबुलों को फोड़ देती थीं।और तब साहिर के चेहरे पे मरी मछली की सफ़ेद आँख सी उदासी पसर जाया करती थी । साहिर की ये उदासियाँ कब पन्नों पे कवितायेँ बन कर छलक पड़ीं, कब उनके दर्द ने शब्दों से दोस्ती गांठ ली ,कब उनकी कलम से दर्द में पगे अशआर टपकने लगे ,साहिर को इन बातों का ज़रा भी इल्म न हुआ। ये तो सुनने वालों ने अपने तालियों की गूंज से साहिर को बताया कि वे एक उम्दा शायर बन गए हैं ।

 

साहिर लुधयानवी के स्कूल -कॉलेज का दौर : 

साहिर लुधयानवी ने लुधियाना के खालसा हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की और आगे की पढाई के लिए उन्होंने सतीश चन्द्र धवन नाम के लुधियाना के एक सरकारी कॉलेज में दाख़िला ले लिया । इश्क ,मुहब्बत ,वफ़ा ज़फ़ा ये कॉलेज के लड़के लड़कियों की ज़िन्दगी के हक़ीकी रंग होते हैं और ये रंग ख़ूब टपकता था साहिर के अशारों से । तभी तो कॉलेज के लड़के लड़कियां साहिर के दीवाने हो गए थे। तब मुहब्बत ख़त-ओ-किताबत के मार्फ़त बयां की जाती थीं ।रूमानियत को दिलकश शब्दों में लपेट कर इत्र लगी चिट्ठियों के ज़रिये महबूब तक पहुँचाया जाता था ।कॉलेज के लड़के लड़कियां अपने दिल के रूमानी ख़्वाईशात को ओकाबी पर देने के लिए साहिर को घेरे रहते थे।किसी का दिल टूटा हो तो उसके दर्द की पैमाई साहिर के अशारों में होती थी। किसी को अपनी मुहब्बत का इज़हार करना हो इसके लिए साहिर का शेर हीं उन्हें मुकम्मल  ज़ुबां मुहैया कराता था ।

आशिक के दिल में इश्क़ का वो उफ़ान हो या न हो पर उनकी तरफ से उनकी प्रेमिकाओं के लिए साहिर का लिखा शेर दिल को कागज़ पे उकेर के रख देता था ।शेर के एक एक हर्फ़ में दिल की सौ सौ धडकनें स्पंदन करती थीं। माशुकाएं आशिक की सूरत-सीरत पे भले न मरती हों पर उन अशआर पे वे दीवानावार हो मर जाया करतीं थीं जिन्हें लिखा होता था साहिर ने पर जिनपर सरनामा होता था आशिक़ों का।कई आशिक़ों की बिगड़ी बनाई थी साहिर ने और इसलिए आशिक़ों के चहेते थे साहिर ।साहिर की लड़कियों में भी काफी धूम थी ।एक सिखनी इशारकौर  तो साहिर पे कुछ ख़ास हीं फ़िदा थीं।इन्हीं मोहतरमा के साथ एक दिन साहिर प्रिंसिपल के लॉन में बैठे इश्क़ फरमा रहे थे कि प्रिंसिपल की नज़र इनपे पड़ गयी और साहिर को कॉलेज से निकाल दिया गया। साहिर के कॉलेज से निकाले जाने का ख़ूब विरोध हुआ …हड़ताल हुई, नारेबाजी हुई पर अक्खड़ मिज़ाज प्रिंसिपल ने साहिर का रस्टीगेशन ख़ारिज नहीं किया ।

 

साहिर लुधयानवी की लाहौर रवानगी और वहां का जीवन :

 

पढ़ाई बीच में रुक जाने से दुखी साहिर सन 1943 में लुधियाना से लाहौर आ गए और वहीँ रह कर शेरो शायरी करने लगे । बचपन के तल्ख़ तजुर्बे और कॉलेज से अकारण निकाले जाने का दुःख यह सब भड़ास निकली इनकी ‘तल्खियाँ ‘ नाम की नज़्मों के एक संग्रह में जो सन 1945  में पाकिस्तान के एक किताबखाना द्वारा छापा गया |

साहिर की इस क़िताब ने साहिर की भड़ास को कितनी निकाली यह तो नहीं पता पर हाँ इस क़िताब ने लाहौर के ग़ज़ल-ख़्वाँओं और शायरनवाज़ों के बीच साहिर को एक अदद पहचान ज़रूर दे दी ।इसी पहचान की बदौलत उन्हें लाहौर में ‘अदबे लतीफ़’ ,’शाहकार’ ,’प्रिथलरी’ और ‘सवेरा’ जैसी उर्दू पत्रिकाओं के संपादन का मौका मिला।साहिर की निगेहबानी में ये पत्रिकाएं काफी मशहूर हुईं। साहिर का भी ख़ूब नाम हुआ पर कुछ शोहरतें आफ़त के घोड़े पे बैठ के आईं।’सवेरा’ नाम की पत्रिका में कम्युनिस्ट नज़रिया परोसने के लिए पाकिस्तान सरकार द्वारा साहिर के नाम का गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया गया ।

अंग्रेज़ों के औपनिवेशिक शिकंजे से पकिस्तान वजूदन तो निकल आया था पर ज़हनी तौर पे अब भी अंग्रेजों के अधीन हीं था।तभी तो वो तमाम आईडियोलौजीज़,वो सारी सोंच जो अंग्रेजों को नागवार गुज़रती थीं ,पाकिस्तान की सरज़मीं पे उनको लिखने बोलने की मनाही थी । साहिर ने ‘सवेरा’ नाम की पत्रिका में वो प्रतिबंधित सोच परोस कर अपने लिए मुसीबत मोल ले ली थी ।

 

साहिर की हिन्दुस्तान वापसी और अमृता प्रीतम से राबिता :

 

साहिर एक तकलीफ़ से दामन छुड़ा कर हिंदुस्तान से लाहौर गए थे और अब फिर एक तकलीफ़ से बचने के लिए सन 1949 में साहिर लाहौर छोड़ वापस हिन्दुस्तान चले आये।हिंदुस्तान के दिल दिल्ली को उन्होंने अपना ठिकाना बनाया और यहीं उन्होंने एक ख़ूबसूरत कलमनिगारा के साथ दिलबरी  भी कर ली ।उस कलमनिगारा का नाम था अमृता प्रीतम जो साहिर की तरह हीं  हालिया हीं पाकिस्तान से हिन्दुस्तान आ बसी थीं ।

अमृता प्रीतम की 16 साल की नादानिस्तगी भरी उम्र में हीं प्रीतम सिंह नाम के एक रईस व्यापारी से शादी हो गयी थी। पति की तिज़ारती मसरूफ़ियत और अमृता की कच्ची उम्र के जिद्दी जज़्बात और ज़रूरतों में निभी नहीं और शायद इसलिए अमृता पर-अफशां परिंदे की तरह शादी के पिंजरे से बहार निकलने के लिए छटपटाती रहीं । वक़्त के इसी दौर में अपनी नज़्मों में आज़ादी का नीला आसमान ले कर आये साहिर और अमृता साहिर पर मर मिटीं ।

अमृता शादीशुदा थीं,बावजूद इसके वो साहिर को टूट के प्यार करती थीं ।उन्होंने अपने और साहिर के इश्क़ की बात न हीं कभी दुनिया वालों से और न हीं कभी अपने ससुराल  वालों से छुपायी।  बल्कि अपनी जीवनी ‘रसीदी टिकट ‘ में उन्होंने बेसाख्ता हो साहिर की जानिब अपनी दीवानगी की बात क़बूल ली।

बड़ा अलहदा था साहिर और अमृता का प्यार।साहिर और अमृता जब कभी मिला करते थे तो साहिर  अमृता से कोई रुमानअंगेज़ बाते नहीं करते थे बल्कि  खामोशतबा माहौल के कुंवारेपन को बगैर छेड़े चुपचाप सिगरेट पीते हुए धुएं के छल्ले उड़ाते रहते थे। यह ख़ामोशी भरी अजीबोगरीब मिल्लत जब ख़त्म होती और साहिर अपने पिए सिगरेट के टुकड़े और अमृता और अमृता की अधूरी ख्वाइशों को तन्हा छोड़  वापस  चले जाते तो साहिर की दीवानी अमृता साहिर के छोड़े सिगरेट के टुकड़ों को लबों से लगाया करती थी और दिलनवाज़ अहसासों के कश फूंका करती थी|

 

साहिर और मुहब्बत की चंद और पेंगे :

 

अमृता प्रीतम जितनी ख़ूबसूरत अफ़सानानिगार थीं  उतना हीं ज़ेबाइश  उनका चेहरा भी था । पर साहिर न अमृता के चेहरे में उलझे और न हीं उनके ख़ूबसूरत शब्दों में और कुछ महीने बाद हीं वे दिल्ली छोड़कर  मुंबई आ गए । साहिर के मुंबई चले जाने के बाद भी अमृता प्रीतम और साहिर लुधायनवी के बीच एक धूप छाँव वाला रिश्ता बना रहा । धूप छांव वाला रिश्ता इसलिए क्यूंकि अमृता इस रिश्ते को लेकर जितनी संजीदा थी ,साहिर उतना संजीदा न थे और न हीं शादी के बंधन में बंधने का उनका कोई इरादा था ।ख़ैर भावनाओं के दरिया में उबते डूबते इस रिश्ते का अंत तब हो गया जब साहिर की ज़िंदगी में सुधा मल्होत्रा नाम की एक गायिका आ गयी ।सुधा और साहिर का प्यार भी सुधा के रईस बाप के विरोध के आगे ज़ल्दी हीं दम तोड़ गया।बकौल सुधा के पिता ,साहिर उनकी बेटी के प्यार के लायक नहीं थे,क्यूंकि वे ग़रीब और ग़ैर-मज़हबी थे | जरा गौर कीजिये साहिर के लिखे गाने के इस बोल पे :

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा                                                                     

इंसान की औलाद है इन्सान बनेगा 

साहिर के गीत के इस बोल में मज़हबपरस्ती के लिए यूं हीं विरोध नज़र नहीं आता। इसी मज़हबपरस्ती ने साहिर से उनकी माशूका को छीना था।

साहिर की 59 साल की मुख़्तसर ज़िंदगी में यूं तो कई हंसी और दिलनशीं बालाएं आयीं पर कोई भी साहिर के दिल के जाविया में ठहर न सकीं ।साहिर का इश्क़ कभी कामयाब नहीं हुआ । साहिर के इश्क़ की नाकामयाबी का कारण लड़की के बाप की नामंजूरी , साहिर की तंगहाली ,उनका गैर मज़हबी होना था पर कई लोग ऐसे हैं जो साहिर के बचपन के जहन्नुमी तजुर्बे को साहिर के इश्क़ की नाकामयाबी की वजह मानते हैं।उनके मुताबिक प्यार के सपनो को नींद की बैलगाड़ी में लाद कर साहिर चले तो थे बचपन से बड़प्पन की जानिब पर एक राहज़न ने बीच रस्ते में उनके सपनो को लूट लिया  और वो लूटेरा था साहिर का अपना बाप फज़लदीन।फज़लदीन ने नन्हे साहिर के सामने साहिर की माँ के साथ खूब बदसलूकियां कीं । पति पत्नी का वो रिश्ता जिसमे प्यार और आपसी सम्मान के अलावा ज़र्रे के लिए भी जगह नहीं होना चाहिए था ,साहिर के माँ बाप के बीच वहां प्यार की जगह दुनिया की तमाम  तल्खियाँ ,तमाम अज़ीयतें भरी थीं ।साहिर के बचपन की जिन आँखों ने इस मंज़र को ज़ब्त कर लिया था,उन बेलौस आँखों में अब प्यार कैसे आ सकता था। इश्क़ अब साहिल को एक छलावा एक ख़ुद फ़रेबी लगता था और इसलिए दिल की अवाराखानी के लिए साहिर द्वारा किया अनमना इश्क़ कभी लम्बी उमर नहीं जी पाया।

लोगों की कही ये बातें सच्ची लगती है जब हम साहिर के नज़्मों के संग्रह ‘तल्खियाँ ‘ के इस शेर को देखते हैं जहाँ साहिर अपनी तल्खियों  की वजह का ज़िक्र करते हुए कहते हैं :

दुनियां ने तजरुबात ओ हवादिस की  शक्ल  में                                            

जो कुछ मुझे दिया है , वो  लौटा  रहा  हूँ  मैं

चाहे साहिर का इश्क़ अपनी स्वभाविक मौत मरा हो या साहिर की बेकदरी से मरा हो पर सच तो यह है कि इश्क़ की हर मौत साहिर को भी मारती थी ।तभी तो अपने इश्क़ की हर शहादत पर साहिर का दिल लहू उलीचते हुए कहता था:

 

बिछड़ गया हर साथी दे कर पल दो पल का साथ                              

किसको फुर्सत है जो थामे दीवानों का हाथ                                   

हमको अपना साया तक अक्सर बेज़ार मिला                                    

हमने तो जब कलियाँ मांगी ,काटों का हार मिला 

 

साहिर और माया नगरी,मुंबई :  

साहिर को मुबई आने का एक रूहानी सा संकेत मिला था । उन्हें लगता था कि मायानगरी उन्हें अपनी आगोश में भरने के लिए बुला रही है और जब साहिर सन 1949 में मुंबई आए तो सचमुच मुंबई की माया नगरी ने साहिर को अपने पहलू में भर लिया ।साहिर ख़ुशकिस्मत थे कि मुंबई ने उनका कड़ा इम्तहान नहीं लिया वरना तो मुंबई हर रोज़ अपने निर्मम पथरीले सीने पे अनगिनत लोगों के ख्वाबों के शीशमहल तोड़ती रहती थी । 

साहिर को मुंबई पहुंचते हीं गीतकारी का काम मिल गया ।सन 1949 इसवी में ‘आज़ादी की राह पर ‘ नाम की फिल्म के साथ साहिर ने अपने गीतों का आगाज़ किया पर बदकिस्मती से उनका आगाज़ उतना दमदार न रहा और इसलिए साहिर फिल्मकारों के दिल पे अपनी दमदार हाजरी दर्ज न कर पाए।अगले २ सालों तक साहिर के गीत अपने लिए मुकम्मल मौका तलाशते रहे।

मुंबई की माया नगरी एक घने वर्षा वन की तरह थी जहाँ ख्वाईशमंदों की अनगिनत अमरलताएँ किसी न किसी दरख़्त के सहारे शोहरत के सूरज तक पहुँचने के लिए एक दूसरे से होड़ कर रही थीं । साहिर तो इस जंगल में खो हीं गए होते अगर फ़िल्मी दुनिया से ताल्लुक रखने वाले उनके लुधियाना के एक दोस्त मोहन सहगल ने उन्हें सही राह न सुझाई होती ।साहिर के इस दोस्त ने साहिर को संगीतकार एस डी बर्मन से मिलने की सलाह दी।साहिल ने अपने इस खैरख्वाह की सलाह पे फ़ौरन अमल किया और आँखों में कुछ करने का ख्वाब लिए ये जा पहुंचे बर्मन दा के घर ।बर्मन दा उन दिनों एक जानी मानी हस्ती थे । उनके घर में साहिर जैसे सपने देखने वालों का ताँता लगा रहता था और अपने संगीती सरगर्मियों में मसरूफ़ बर्मन दा ऐसे लोगों को दूर से हीं भगा दिया करते थे पर साहिर में कुछ बात थी जिसने बर्मन दा को उन्हें मौका देने के लिए मजबूर कर दिया। बर्मन दा उन दिनों फिल्म ‘नौजवान’ के संगीत पे काम कर रहे थे ।साहिर को उसी फिल्म से मुत्तलिक एक धुन सुनाकर बर्मन दा ने उनसे कुछ दिनों बाद गीत तैयार करके लाने को कहा पर साहिर ने आनन फानन में गीत वहीँ के वहीँ तैयार करके बर्मन दा को सुना दिया । उनका तैयार किया हुआ बोल ‘ठंडी हवाएं,लहरा के आयें ‘ न सिर्फ पूरी तरह से बर्मन दा की धुन के मीटर की परिधी में था बल्कि इस कदर ख़ूबसूरत था कि एस डी बर्मन जैसे संगीत के सिद्धहस्त भी हैरान रह गए ।उस दिन बर्मन साहब ने साहिर की कलम की जादूगरी को पहला सलाम किया और जब सन 1951 में ‘नौजवान’ फिल्म प्रदर्शित हुई तो सारा हिन्दुस्तान साहिर नाम के इस नए गीतकार की कलमकारी के आगे नतमस्तक हो गया ।

इस फिल्म के बाद तो एस डी बर्मन और साहिर लुधयानवी एक दुसरे के पूरक बन गए और अपने संगीत और गीत के सरमस्त कॉकटेल से लोगों में खुमारियां पैदा करते रहे,उन्हें अपना दीवाना बनाते रहे ।बर्मन दा को ‘नौजवान’ के बाद नवकेतन बैनर की एक फिल्म ‘बाज़ी’ का काम मिला था जिसे गुरुदत्त निर्देशित कर रहे थे। बर्मन दा अपने साथ अपने चहेते गीतकार साहिर को ले आए और उन्हें भी बतौर गीतकार इस फिल्म से जोड़ दिया ।साहिर ने बर्मन दा के विश्वास की लाज रखी और फिल्म बाज़ी को ऐसे दिलकश गीतों से गढ़ दिया कि यह फ़िल्म भी साहिर के जानिबे-मंज़िल की मसाफ़त में एक और मील का पत्थर साबित हुई|

 

साहिर लुधयानवी की उपलब्धियां :

 

अगले 31 साल तक साहिर लुधयानवी फ़िल्मों में अपने गीतों की चाशनी काढ़ते रहे और सुनने वालों की रूहों को तर करते रहे। उन्होंने करीबन १०१ फिल्मों के लिए ७०० से भी ज़्यादा गीत लिखे और उनका लिखा हर गीत तरानों के फ़लक पे सितारों की मानिंद चमकता रहा और आवाज़ की दुनिया के गोशे गोशे को अपने नूर से नहलाता रहा । साहिर के गीत उस ज़माने के सभी आलातरीन गायकों के गले की शोभा बने ।करीबन ३० संगीतकारों ने साहिर के रूहकश गीतों पे अपनी धुनों का मुलम्मा लपेटा ऐसे जैसे किसी रसीली मिठाई पे चांदी का बर्क लपेटा जाता है।

साहिर लुधायनवी ने रवि ,रोशन ,एस डी बर्मन ,खैय्याम जैसे नामचीन संगीतकारों के साथ काम किया और उनकी ख़ूबसूरत धुनों के साथ अपने बेनज़ीर शब्दों की लयबंदी कर कई यादगार शाहकार रचे । एस डी बर्मन के साथ उनकी युगलबंदी ख़ूब सराही गयी पर बाद में यह युगलबंदी किसी वजह से टूट गयी।कहा जाता है कि बर्मन ने साहिर के साथ अपनी युगलबंदी इसलिए तोड़ दी क्यूंकि साहिर का गीत उनके संगीत पे भारी पड़ने लगा था।लोग उनके संगीत से ज़्यादा साहिर के गीत को पसंद करने लगे थे।फ़िल्मकार बी आर चोपड़ा की फ़िल्मों का तो साहिर एक शदीद हिस्सा बन गए थे । बाद में बी आर चोपड़ा और यश चोपड़ा का जब अलगाव हुआ तो साहिर ने यश चोपड़ा की फिल्मों के लिए भी कई गीत लिखे ।साहिर के गीतों ने सफलता के  कई सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। साहिर की इस सफलता से रिकॉर्डिंग कंपनी एच एम वी इस कदर ख़ुश हुई कि उन्होंने साहिर को सोने का रिकॉर्ड भेंट कर डाला ।

साहिर अपनी मुफ़लिसी से परेशां हो मुंबई आये थे अपनी किस्मत चमकाने पर मुंबई आकर तो उन्होंने अपने दिलकुशा नगमों से मुंबई की किस्मत चमका दी।

मुंबई की फ़िल्मी दुनिया ने भी साहिर के योगदान को खिताबों और पुरस्कारों से ख़ूब सराहा । सन 1964 में फिल्म ‘ताजमहल’ के लिए और सन 1977 में फिल्म ‘कभी कभी ‘ के गीत के लिए साहिर लुधयानवी को फिल्म फेयर अवार्ड से नवाज़ा गया । सन 1971 में गीत,ग़ज़लों की दुनिया में बेमिसाल योगदान देने के लिए साहिर लुधयानवी को हिंदुस्तान के सर्वोच्च पुरस्कार पदम् श्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

साहिर के ज़माने में हिंदी गीतों की कशीदाकारी एक ऐसा काम हुआ करती थी जिसमे नाम तो मिलता था पर ठीक दाम नहीं मिलता था। यही वजह है कि उस ज़माने के कई गीतकार मुफलिसी के साए में जीते रहे पर साहिर लुधयानवी ने आकर यह रवायत बदल दी और अपने लिए नाम और दाम दोनों ख़ूब बटोरे। साहिर फिल्मो के लिए एक ऐसा प्रीमियम ब्रांड बन गए थे ,जिनका नाम फिल्मों के गाने की सफलता सुनिश्चित करता था और इसलिए उन्हें अपने गीतों के लिए मुंहमांगी कीमतें मिला करती थीं । साहिर के बचपन की मोहताजी को ज़वानी ने ख़ूब हर्ज़ाना दिया । अब साहिर पे दौलत बरसने लगी । अँधेरी का पॉश इलाका जल्दी हीं साहिर का रिहायशी सरनामा बन गया ।

फ़िल्मी दुनियां में साहिर के जब पांव जमे ,उनका जब कद और रुतबा बढ़ा तो साहिर ने अपने रुतबे का इस्तेमाल कर कुछ ऐसे निज़ाम बदल दिए जो गीतकारों के शोषण को बढ़ावा दे रहे थे । उन्होंने अपने हक़ और हुकूक की पहली लड़ाई की शुरुआत की रेडियो से ।

वो ज़माना गायकों के वर्चस्व का ज़माना था। गायक हीं रेडियो में सुनाये जाने वाले गीत का परिचय पत्र होता था । रडियो पे शाया होने वाले गानों के कार्यक्रम में गायक का नाम लिया जाता था ,संगीतकार का नाम लिया जाता था पर गीतकार के नाम की कोई चर्चा नहीं होती थी । यह सरासर नाइंसाफी थी ,यह देखते हुए कि गीत के बोल किसी भी गाने की रूह होते हैं । गाने में पिन्हाँ कहानियां ,दुःख दर्द ,रंजो-ग़म ,हंसी ख़ुशी सब बोल के हीं ज़रिये हीं तो बयां होते हैं और उन्हीं गीतों को लिखने वालों को हाशिये पे रख देना कहाँ का इन्साफ था ?  साहिर लुधयानवी ने इस ज़्यादती के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा कर पुरानी परिपाटी को बदल दिया और तब से रेडियो में हर गीत के साथ गीतकार का भी नाम बाअदब लिया जाने लगा ।

हाल तक गीतकार के हर काम पे म्यूज़िक कंपनियों का सर्वाधिकार होता था ।मोबाइल ट्यून के तौर पे ,होटलों और रिसॉर्ट्स में गीतों के इस्तेमाल से होने वाली आमदनी का पाई पाई म्यूज़िक कंपनियों की झोली में जाया करता था । वो तो कई नामी गिरामी गीतकारों और फ़िल्मकारों ने इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के ख़िलाफ़ एकजुट होकर अपनी आवाज़ बुलंद की और संवैधानिक सुधार करवा रॉयल्टी पाने वालों की फ़ेहरिस्त में गीतकारों का नाम शुमार करवाया वरना आज से कुछ समय पहले तक गीतकारों द्वारा  रॉयल्टी पाना एक खामे-ख्याली से ज़्यादा कुछ नहीं था ।पर साहिर लुधायनवी ने म्यूज़िक कंपनी के इस मनमाने एकाधिकार को बहुत पहले चुनौती दे ध्वस्त  कर दिया था ।कोई और गीतकार म्यूज़िक कंपनियों से भले रॉयल्टी न लेता हो पर साहिर अपने लिखे हर गीत की रॉयल्टी वसूला करते थे ।यह उनकी कलम का जौहर और उनकी शख्सियत की अज़्मत थी कि वो ऐसा कर पाए । हिन्दुस्तान ने इस शख्स की महानता को पहचाना भी और सराहा भी हिंदुस्तान के राष्ट्रपति महामहीम प्रणव मुखर्जी ने इस शायर की महानता का सम्मान करते हुए 8 मार्च सन 2013 को साहिर लुधयानवी के नाम की डाक टिकट जारी कर दी । यह सम्मान ,सम्मान नहीं रूहानी तरकीब थी । साहिर  ने वर्षों पहले अपने लुधियाना के कॉलेज में अपने दोस्तों की तरफ़ से उनकी माशूकाओं के लिए जो पुरआशार  चिट्ठियां लिखीं थीं ,यह सम्मान साहिर के उन्ही दोस्तों की दुआओं का सिला था शायद |

 

कुछ खूबियाँ तो कुछ खामियां भी :

 

साहिर की अज़्मत , उनकी महानता कई बार ग़ुरूर बन कर भी उफ़न पड़ती थी । वे ख़ुद को लता मंगेशकर जैसी कंठ कोकिला से भी महान मानते थे । तभी तो अगर किसी फ़िल्म में उनके गीत को लता स्वरबद्ध कर रही होतीं तो वे फ़िल्मकार से अपनी फीस के तौर पे लता जी को दी जाने वाली रकम से एक रुपया ज़्यादा रकम की मांग करते ।  यह साहिर जैसे कवि के लिए अशोभनीय था पर  शायद कलाकार के दर्द से कुलबुलाते वजूद में पलती प्रतिभा के साथ अक्खड़पन एक साइड इफ़ेक्ट की तरह मौजूद होता हीं होता है।साहिर में भी कलाकारों में पाए जाने वाला यह कुदरती ऐब मौजूद था।

साहिर की उनकी ज़बर-जोरी वाली तबियत की वज़ह से कई संगीतकारों और गायकों से अनबन भी हुई । एस डी बर्मन के साथ उनकी स्वप्निल जोड़ी उनकी इसी तुनक मिज़ाजी की भेंट चढ़ गयी । अना के इसी आपसी टकराव की वजह से साहिर लुधयानवी ने  लता जी के साथ भी काफी समय तक काम नहीं किया । कहा तो यहाँ  तक जाता है कि लता जी को प्रतिद्वंदता देने के लिए हीं उन्होंने सुधा मल्होत्रा नाम की गायिका को खड़ा कर दिया जिनसे उनका प्रेमगत सारोकार भी बना।साहिर पे इस गायिका के गैर-जायज़ सिफारिश का इल्ज़ाम लगाते हुए कहा जाता है कि सुधा मल्होत्रा के प्यार में गिरफ़्त हुए साहिर ने इस गायिका को अपने रसूख का इस्तेमाल कर न केवल ‘बरसात कि एक रात में’ काम दिलवाया बल्कि सुधा मल्होत्रा को बतौर गायिका स्थापित करने के लिए वे ख़ूब कवायदें भी करते रहे |  ये दीगर है कि उनकी कवायदें सुधा मल्होत्रा के करियर को कोई उफ़ान न दे सकीं।

साहिर अपने मनमानेपन के लिए भी काफी बदनाम थे। आम तौर पे संगीतकारों की तैयार की गई धुन पर एक गीतकार गीत तैयार करता है पर साहिर अपनी कद्दावर शख्सियत,अपनी लोकप्रियता का इस्तेमाल कर फ़िल्मकारों को मजबूर करने लगे थे कि उनके लिखे गीतों के आधार पर धुन बनाई जाए।उन्होंने अपनी कलम की दबंगई का इस्तेमाल कर रवायतों की उल्टी गंगा बहा दी थी।

साहिर बड़े अप्रत्याशित स्वभाव के थे। अपनी मर्ज़ी से बात करना अपनी मर्ज़ी से चुप रहना,कभी दोस्तों पे खुद को वार देना ,कभी उन्हीं दोस्तों की लानत मलामत कर देना ,एक अजीब सी अनियमितता थी उनके स्वभाव में।गुस्सा तो उनके नाक पे हरदम बैठा रहता था ।एक शायर-नवाज़ डॉक्टर रफीक़ ज़कारिया की दी पार्टी में एक व्यपारी मोटा चुदास्मा पे साहिर लुधयानवी सिर्फ इसलिए राशन पानी लेकर टूट पड़े क्यूंकि शायरों की उस महफ़िल में उस व्यापारी ने सुखनवरी तहज़ीब नहीं दिखाई थी ।

साहिर भी अपने इस पल में तोला, पल में माशा वाले मिज़ाज से अच्छी तरह वाकिफ़ थे और उन्हें यह भी पता था कि अगर ज़िन्दगी उन्हें कड़वाहट का हालाहल नहीं पिलाती तो उनका मिज़ाज उतना ज़हरआलूदा न होता। साहिर अपने एक गीत में कहते भी हैं कि अगर उन्हें उनकी माशूका का प्यार नसीब होता,उनकी माशूका की ज़ुल्फ़ों की छांव नसीब होती तो शायद वे यूं न बिगड़ते । उनके इस गीत पर ज़रा मुलाहिज़ा फरमाइए :

कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है !                                                         

की ज़िंदगी तिरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाओं में                                                             

गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी                                                                         

ये तीरगी जो मिरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है                                                                            

तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी

साहिर लुधयानवी शराब ख़ूब पिया करते थे।किसी शराब के पैरोकार ने कहा है कि शराब वो गैर वैज्ञानिक उपकरण है जो ग़मज़दों की रगों में पहुँच के उनके अन्दर मौजूद ग़मों की पैमाइश कर लेता है ।अगर यह सच है तो साहिर तो शराब के समंदर में लोटा करते थे ,ज़रूर ग़मों का विशाल पहाड़ रहा होगा उनके सीने पे ।उनके उन ग़मों से तो दुनियां रूबरू है जो पानी पे पड़े तेल की तरह सतह पे तैर रहे हैं पर उनके कुछ ग़म ऐसे भी हैं जो मन की तलछटी में छुप कर बैठे हैं, जिसकी शनासी आम लोगों द्वारा नहीं की जा सकती ।साहिर ने अपनी कुछ नज़्मों में अपने ऐसे कुछ ग़मों का ज़िक्र भी किया है ।ज़रा गौर फरमाइए साहिर की ऐसी एक नज़्म पर :

 

तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म है मुझे                                     

नजात जिनसे मैं एक लम्हा पा नहीं सकता                                           

ये ऊँचे ऊँचे मकानों की डयोढियों के तले                                          

हर एक गाम पे भूखे भिखारियों की सदा                                               

ये कारख़ानों में लोहे का शोरो-गुल जिसमें                                          

है दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग्मा                                           

गली गली में ये बिकते हुए जवां चेहरे                                                   

हसीन आँखों में अफ़्सुर्दगी -सी छाई हुई                                                    

ये शोलावार फज़ाएँ ,ये मेरे देश के लोग                                                  

खरीदी जाती है उठती जवानियाँ जिनकी |

 

भूख से किलसते भिखारियों की नाला-ए-फ़रियाद ,मशीनीकरण के दैत्य के पांव के नीचे कुचलते मजदूरों की चीख, ज़ाया होती जवानियों का दर्द ये सब साहिर के सीने में हीं तो पनाह लेते थे ।साहिर ने एक ऐसा मर्ज़े-ग़म पाल रखा  था जिसकी दवा,साहिर की नज़र में ,बदकिस्मती से बस शराब थी और इसलिए साहिर ख़ूब शराबनोशी किया करते थे ।

 

साहिर का रंगे-सुखन:

साहिर ने पिता की हवेली में न केवल अपने खिलौने ,अपना ख़ुशनुमा बचपन छोड़ दिया बल्कि बड़े होकर ‘अब्दुल हायी’ का अपना वो नाम भी छोड़ दिया जो उन्हें उस लाल हवेली में मिला था और जो उन्हें बचपन के  बदवक़्त  की याद दिलाता था । साहिर ने अब्दुल हायी नाम का  पुराना पैरहन उतार साहिर नाम का नया लिबास पहन लिया । साहिर से मुराद होता है ‘जादूगर’ और साहिर तो सचमुच कलम के जादूगर थे।एक जादूगर हाथ लहराकर गुलाब का एक फूल पैदा करता है ,साहिर तो कलम लहरा कर शब्दों का गुलबाग पैदा कर दिया करते थे ।

साहिर द्वारा ‘साहिर’ शब्द अपनाने की कहानी बड़ी दिलचस्प है । एक दिन साहिर अपने तत्कालीन नाम अब्दुल हायी के तौर पे एक रेडियो प्रोग्राम में अलामा इक़बाल का लिखा एक शेर पढ़ रहे थे ।शेर के बोल कुछ इस तरह थे :

 

इस चमन में होंगे पैदा बुलबुल-ए-शिराज़  भी ,                                               

सैंकड़ों साहिर भी होंगे साहिब-ए-एइजाज़ भी  

 

इस शेर में मौजूद ‘साहिर’ शब्द ने साहिर पे जादू कर दिया और तब से साहिर ने ‘साहिर ‘नाम अपना लिया और बाद में लुधियाना के उनके जन्मगत सारोकार ने उनके नाम के साथ ‘लुधयानवी’ भी जोड़ दिया और इस तरह अब्दुल हायी बन गए साहिर लुधयानवी। जल्दी हीं साहिर ने अपनी कलम के जौहर से अपने नाम की धूम मचा दी ।सब इस शायर से मिलने के लिए ,उनका फ़ने- सुखन देखने के लिए मचलने लगे ।लुधियाना का वह सरकारी कॉलेज जहाँ साहिर कभी पढ़ते थे और जहाँ से साहिर को एक लड़की के साथ इश्क़दारी  करने के लिए निकाल दिया गया था , सालों बाद सन 1956 में उस कॉलेज ने भी साहिर का स्वागत करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया। साहिर को किस्मत ने हिसाब चुकता करने का पूरा मौका दिया था पर साहिर की दरिया दिली देखिये कि न सिर्फ साहिर वहां गए बल्कि जब उन्हें इस बात का इल्म हुआ कि उनकी प्रोफेशनल फीस के लिए लड़कों ने बड़ी मुश्किलों से पैसा जमा किया है तो उन्होंने वो पैसे लौटा दिया और उस कॉलेज के लड़कों के युनियन फण्ड को एक अच्छी खासी रकम बतौर अनुदान दे दी ।

ऐसा नहीं है कि साहिर अपना अपमान भूल गए थे ।उन्हें सब कुछ याद था और उन्होंने कॉलेज वालों को भी अपने साथ घटे उस अपमानजनक वाक़या की याद दिलाई पर अदब और तहज़ीब के दायरे में रहकर ।जब साहिर दूसरी दफ़ा सन 1970 में उस कॉलेज के गोल्डन जुबली समारोह में  शरीक होने गए तो मज़ाक मज़ाक में अपने इस शेर के ज़रिये उन्होंने अपने अतीत के उन दुखदायी  पलों को बयां कर डाला :

 

लेकिन हम इन फिज़ाओं के पाले हुए तो हैं                                                                        

गर या नहीं तो यहाँ से निकाले हुए तो हैं 

 

साहिर का कभी तालीमगाह रहा लुधियाना का वह कॉलेज अपने किये पे शर्मिंदा भी था और साहिर के ख़ूबसूरत अंदाज़े बयां से ख़ुशपोश भी ।

साहिर को उन पूँजीपतियों से खासा चिढ़ थी जो पैसे कमाने की धुन में इंसानियत को दरकिनार कर देते थे । जो समाज के दबे कुचले लोगों की तरफ आँखें मूंदे रहते थे ।जिन किसानो की उपजाई अनाजों की रोटी इन सेठों के पेट में उतरती थी , जिन गरीब कामगारों की मेहनत इन सेठों की तिजौरियां भरती थी , उन्हीं ग़रीबों को उन धनिकों का जूता उपेक्षाओं की ठोकरें मारा करता था । ऐसे नाशुक्रे अमीरों से साहिर बेइंतहा नफ़रत करते थे । साहिर की कविताओं और गीतों में ऐसे सरमायादारों के ख़िलाफ़ उनका रोष ख़ूब दिखता है ।

मेरे सरकश तरानों की हक़ीक़त है तो इतनी है                            

कि जब मैं देखता हूँ भूख के मारे किसानों को                              

ग़रीबों ,मुफलिसों को,बेकसों को ,बेसहारों को                               

सिसकती नाज़नीनों को ,तड़पते नौजवानों को                                 

हुकूमत के तशद्दुद को ,अमारत के तकब्बुर को                                  

किसी के चिथड़ों को और शहंशाही ख़ज़ानों को                                 

तो दिल ताबे-निशाते-बज्में-इशरत ला नहीं सकता                           

मैं चाहूँ भी तो ख्वाब-आवर तराने गा नहीं सकता

दुनिया को ताजमहल शाहजहाँ का बेमिसाल शाहकार लगता हो,मोहब्बत का इमारती मुजस्समा लगता हो पर साहिर को ताजमहल ज़ुल्मों की निशानी,सनकपन की एक बेमुरव्वत रूदाद लगा करती थी।वो सुलतान जो अपनी खुदगर्ज़ी के लिए,अपने प्यार का परचम फहराने के लिए कारिंदों का खून पसीना बहवा कर और फिर उन्हीं कारिंदों को गुमनामी के अंतहीन अन्धकार में धकेल कर खुद अमर हो गया हो ,उस सुल्तान की बनायी मज़ार, बक़ौल साहिर , मुहब्बत की निशानी हो हीं नहीं सकती –

ताज तेरे लिए इक मज़हरे-उल्फ़त हीं सही                                                         

तुमको इस वादी-ए-रंगीं में अक़ीदत हीं सही                                                           

मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे                                                             

बज़्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र,क्या मानी ?                                                            

सब्त जिस राह पे हो सतवते-शाही के निशां                                                                 

उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी ?

साहिर ने अपनी माँ समेत उन 14 औरतों को अपने पिता के सितम का शिकार होते देखा था जो उसके पिता की बीवियां थीं । साहिर ने दिल्ली और मुंबई की बदनाम बालाखानाओं में कई बेबस औरतों को दो सूखी रोटियों के लिए ख़ुद को अय्याश और मतलबपरस्त मर्दों के हवाले करते देखा था । साहिर ने देखा था कि कैसे बदनाम कूचे में किसी की माँ ,किसी की बहन की आबरूरेज़ी हुआ करती थी ,उनकी भूख के बदले उनकी अस्मत का सौदा हुआ करता था ।साहिर ने देखा था कि कैसे हवस के भूखे मर्द जो दिन के उजाले में शफ़क़त और शराफत का सफेदपोश लिबास पहन शरीफ होने के स्वांग रचते थे ,रात के अँधेरे में चकले के अलगनी में अपनी शराफत का चोगा टांग औरतों को लूटने खसोटने वाला जानवर हो जाया करते थे |

साहिर को औरतों की बेबसी बहुत खलती थी।बड़ा गुस्सा आता था उन्हें मर्दों की सितमगरी पर। साहिर के गुस्से की आग फिल्म ‘प्यासा’ के इस आतिशफिशां गीत में ख़ूब भभकी थी : 

 

जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ है … कहाँ है … कहाँ है ???

ये कूचे ये नीलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां जिन्दगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ ख़ुदी के?

जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ है … कहाँ है … कहाँ है ???

ये पुरपेंच गलियां, ये बेख़ाब बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार

जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ है … कहाँ है … कहाँ है ???

तअफ्फ़ुन से पुर नीमरोशन ये गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द किलयां
ये बिकती हुई खोकली रंग रिलयां

जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ है … कहाँ है … कहाँ है ???

वो उजाले दरीचों में पायल की छन-छन
तनफ़्फ़ुस की उलझन पे तबले की धन-धन
ये बेरूह कमरों में खांसी की धन-धन

जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ है … कहाँ है … कहाँ है ???

ये गूंजे हुए क़ह-क़हे रास्तों पर
ये चारों तरफ़ भीड़ सी खिड़िकयों पर
ये आवाज़ें खींचते हुए आंचलों पर

जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ है … कहाँ है … कहाँ है ???

ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख़ फ़िक़रे
ये ढलके बदन और ये मदक़ूक़ चेहरे

जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ है … कहाँ है … कहाँ है ???

ये भूकी निगाहें हसीनों की जानिब
ये बढ़ते हुए हाथ सीनों की जानिब
लपकते हुए पांव ज़ीनों की जानिब

जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ है … कहाँ है … कहाँ है ???

यहां पीर भी आ चुके हैं जवां भी
तनूमन्द बेटे भी, अब्बा मियां भी
ये बीवी भी है और बहन भी है, मां भी

जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ है … कहाँ है … कहाँ है ???

मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हमजिन्स राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत ज़ुलैख़ा की बेटी

जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ है … कहाँ है … कहाँ है ???

ज़रा मुल्क के राहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मन्ज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे उन को लाओ

जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ है … कहाँ है … कहाँ है ???

 

कहते हैं साहिर का लिखा गीत ‘जिन्हें नाज है हिन्द पे ‘ प्यासा फिल्म बनने से पहले लिखा गया था ।गुरुदत्त ने जब पहली बार इस गीत को सुना तो वे इस गीत की मार्मिकता से बेहद प्रभावित हुए,इस कदर प्रभावित कि इस बेहतरीन गीत को अपने फिल्म ‘प्यासा ‘में जगह देने के लिए उन्होंने अपनी फ़िल्म के कई दृश्यों में काट छांट तक कर दी ।साहिर के लिखे गीत होते हीं इतने ख़ूबसूरत थे कि उनके लिए कोई भी कीमत अदा की जा सकती थी।

माना जाता है कि गुरुदत्त की यादगार फिल्म ‘प्यासा’ का नायक जो फिल्म में नज़्मनिगारी करता  हुआ दिखता है ,साहिर की हीं असल ज़िंदगी का चित्रण है । साहिर की हीं तरह फिल्म प्यासा का भी नायक दुनिया की बेदादी और बेरहमी से दुखी है। साहिर की तरह वह भी अपनी कविता के ज़रिये अपनी आहें,अपना दर्द बयां करता है।

लोगों के दर्द आँखों से बह कर गालों पे दुलककर ज़ाया हो जाते हैं पर साहिर का दर्द दिल से उठकर नगमों की शक्ल ले लेता था, ऐसे पुरसोज़ नगमों की शक्ल,ऐसे दर्द आलूदा गीत का रूप जो सुनने वालों की रूह तक को दरका दिया करते थे।

ये  महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया,                                                                

ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया,                                                                          

ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया,                                                                                 

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है .

हर इक जिस्म घायल, हर इक रूह प्यासी                                                              

निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी                                                                      

ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी                                                                     

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है .

यहाँ इक खिलौना है इसां की हस्ती                                                                       

ये बस्ती हैं मुर्दा परस्तों  की बस्ती                                                                               

यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती                                                                      

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है . 

जवानी भटकती हैं बदकार बन कर                                                                     

जवान जिस्म सजते है बाज़ार बन कर                                                                  

यहाँ प्यार होता है व्योपार  बन कर                                                                   

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है .

ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है                                                                          

वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है                                                                            

जहाँ प्यार की कद्र कुछ नहीं है                                                                                     

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है .

साहिर को दर्द के आलम में हंसने,हंसाने का हुनर भी ख़ूब आता था । दर्द भरे गीत अगर उनकी ज़िन्दगी के लम्बे पतझड़ के मौसम की पैदाइश थे तो खुशनूदी भरे नगमे उस मुख़्तसर बसंत की पैदाइश थे जो उन्हें कभी कभी नसीब होता था ।उनके हंसी शरारतों से भरे ज़रा इस गीत पे गौर फ़रमाइए :

ए मेरी जोहरा -जबीं ,                                                        तुझे मालुम  नहीं                                                             तू अभी तक है हसीं                                                          और मैं जवान                                                             तुझपे कुर्बान मेरी जान मेरी जान                                          

ए मेरी जोहरा -जबीं ,

ये शोखियाँ ये बांकपन ,                                               जो तुझ में है कही  नहीं                                                दिलो  को  जीतने  का  फन ,                                                  जो  तुझ  में  है  कही  नहीं                                                 मैं  तेरी मैं तेरी  आँखों  में पा गया दो जहां                                

ए मेरी जोहरा -जबीं ,

जब जिस मौसम ने जो दिया,आंसूओं के मोती या हंसी के मुंगे ,साहिर सब सहेज कर रखते थे और उन मोती और मुंगों से अपने गीतों का मनका बुनते रहते थे।गुलाब की पंखुड़ियों से नाज़ुक शब्द ,स्वाति नक्षत्र के ओस सी शीतलता बिखेरती विचार-बूंदें ,हारमोनियम के मधुरमय संगुफन की तरह गीतों की लयबद्धता -क्या रंगे-सुखन था साहिर लुधयानवी का !

 

साहिर लुधयानवी की मौत :

साहिर अपनी माँ सरदार बेग़म से बेहद प्यार करते थे । और करते भी क्यूँ न ,इस माँ की वजह से हीं साहिर का निज़ामे तफ़्फ़नुस चलता रहा था ।उनकी सांसो की डोर को गरीबी की आरी या बेदिल बाप के ज़ुल्मों की तलवार ने कब का काट दिया होता अगर साहिर की ज़िन्दगी में  उनकी मां न होतीं ।सन 1976 में साहिर की ये मुहाफ़िज़ मां जब अल्लाह को प्यारी हो गयीं तो साहिर की ज़िन्दगी पूरी तरह से बेमायने और बेनूर हो गयी ।ऐसा लगता है जैसे साहिर की माँ साहिर की ज़िन्दगी के चराग की हमस थी,वो क्या ख़त्म हुई साहिर की ज़िन्दगी की ज्योत भी भुग्भुगाने लगी और आखिरकार अपनी माँ की मौत के 4 साल के छोटे अंतराल में हीं 25 अक्टूबर सन 1980 में साहिर का भी इंतकाल हो गया ।अपने आलामताब गीतों से दुनिया को रौशन करने वाली ज्योत सदा के लिए बुझ गयी।

साहिर मर तो गए पर मर कर भी अपने मुरीदों ,अपने चाहने वालों के दिल में ज़िन्दा रहे ।साहिर की दिलदादा अमृता प्रीतम साहिर की मौत के बाद जब कभी सिगरेट के कश लेती हुई धुएं के छल्ले हवा में उछालतीं ,उनके लबों पे मन्नत के ये अल्फाज़ ज़रूर सवार हो जाते ‘ ‘काश मेरे सिगरेट के धुएं हवा के गलीचे में बैठ उस जहाँ में पहुँच जाएँ जहाँ मेरे साहिर रहते हैं’|

अगर अमृता प्रीतम की नियाज़ें साहिर को धुओं के छल्ले में ढूंढती थी तो साहिर के कई मुरीद ऐसे हैं जो साहिर के बनाये शब्दों के क़ायनात में आज भी साहिर का वजूद तलाशते हैं । उनके गीतों के ज़रिये उनसे आज भी रुशनासी करते हैं ।

साहिर के गीत कभी रईसज़ादों के ज़िद्दी इश्क़ की ज़ुबां बने तो कभी गरीब आशिकों के टूटे दिल से निकली आह को भी उन्हीं के गीतों ने आश्रय दिया ।अमीरों के मचलते ख्वाब ,गरीबों के सिसकते सपने ,औरतों की बेबसियाँ सभी को साहिर के गीतों की एक मुकम्मल पनाह मिली ।साहिर को नफ़ासत के चिलमन के पीछे बैठी हयादार औरतें भी चाहती थीं और कोठे पे बैठी मजबूर जिस्मफरोश औरतें भी दुआएं देती थीं। फूटपाथ को बिछौना और आसमान को छत समझ के सड़क पे ज़िन्दगीबसरी करने वाले भी साहिर के दीवाने थे और सुख के रेशमी गलीचों से कभी पांव नीचे न रखने वाले अमीर भी साहिर के नाम के कसीदे पढ़ते थे।

साहिर को ज़माना एक ऐसे कवि के रूप में याद रखेगा जिसने कविताओं को डायरी के पन्नो और मुशायरों से बहार निकाल सिनेमा का रूपहला पर्दा नसीब करा दिया और साथ हीं नसीब करा दिया उन लोगों की सराहनाएं और तालियाँ जो किताबों के पन्नों और मुशायरों के भारीभरकम माहौल में कविताओं से आशनाई करने में हिचकते थे ।

फिल्म अगर एक नवयौवना लड़की थी तो साहिर का गीत उस नवयौवना के उस सोलह श्रृंगार की तरह था जो उसके रूप में चार चाँद लगा देता था । लोग अपनी धड़कने रोक साहिर लुधायनवी का गीत सुना करते थे। साहिर के गीतों में खोया वक़्त भी अपनी चाल भूल जाता था पर साहिर को अपने इस हुनर का इल्म कहाँ था ।वे तो ख़ुद को एक अदना सा शायर मानते हुए कहा करते थे:

“मै पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी है                                                          पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी है                                                                मुझसे पहले कितने शायर आए और आकर चले गए,                                                                 कुछ आहें भरकर लौट गए, कुछ नग़मे गाकर चले गए                                                                   वो भी एक पल का किस्सा थे, मै भी एक पल का किस्सा हूँ                                                                      कल तुमसे जुदा हो जाऊँगा, जो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ”

यह साहिर लुधयानवी साहब की शायस्तगी है कि उन्होंने अपने आप को पल दो पल की हस्ती माना है पर अगर उनके प्रशंसकों से पूछा जाय तो वे यही कहेंगे कि साहिर लुधयानवी की हस्ती कभी मिट हीं नहीं सकती। अपने जाविदाँ गीतों से उन्होंने ख़ुद को अमर कर लिया है |

साहिर के फ़िल्मी नगमों के कुछ नायब मोती :

आना है तो आ (नया दौर , सन 1957)

जाने क्या तूने कही (प्यासा, सन 1957)

जाने वो कैसे (प्यासा , सन 1957)

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है (प्यासा , सन 1957)

साथी हाथ बढ़ाना (नया दौर, सन 1957) 

तू हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा (धूल के फूल, सन 1959)

ये इश्क़ इश्क़ है (बरसात की रात , सन 1960)

ना तो कारवाँ की तलाश है (बरसात की रात , सन 1960)

अल्ला तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम (हम दोनों , सन 1961)

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया ( हम दोनों , सन 1961) 

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों (गुमराह , सन 1963) 

मन रे तू काहे ना धीर धरे? (चित्रलेखा , सन 1964) 

संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे (चित्रलेखा , सन 1964)

तोर मन दर्पण कहलाये (काज़ल , सन 1965)

ए मेरी जोहरा ज़बीं (वक़्त , सन 1965) 

तुम अगर साथ देने का वादा करो (हमराज़ , सन 1967) 

ईश्वर अल्ला तेरे नाम (नया रास्ता, सन 1970)

मेरे दिल में आज क्या है तू कहे तो मैं बता दूं (दाग़ , सन 1973) 

      मै पल दो पल का शायर हूँ (कभी कभी, सन 1976)

कभी कभी (कभी कभी, सन 1976)

 

साहिर की प्रकाशित किताबें:

     तल्खियाँ (सन 1945)

    आओ कि कोई खवाब बुनें (सन 1971)

    गाता जाए बंजारा(सन 1974)

 

-पवन कुमार

 

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