रात रूहानी शाम सुहानी

****”*** रात रूहानी, शाम सुहानी **********
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रात रूहानी , शाम सुहानी, दिल में कैसी रवानी है,
चाँद भी ठहरा, नूर भी बिखरा, फ़िज़ा बड़ी मस्तानी है।
ज़िक्र तेरा है लब पर आया,महफ़िल महकी-महकी सी,
तेरी यादों की ख़ुशबू जैसे , कोई पाक निशानी है।
साक़ी की आँखों से छलका,जाम-ए-उल्फ़त रात ढले,
होश कहाँ फिर बाक़ी रहता, इश्क़ बड़ी दीवानी है।
तेरे हुस्न का ज़िक्र जो छेड़ा, सितारे झुकने लगते हैं,
चाँद की पेशानी पर भी अब, तेरी ही निगहबानी है।
ख़ामोशी में बात हुई तो, दिल ने दिल को पढ़ डाला,
इश्क़ की ये कैसी ताबीर है , कैसी राज़दानी है।
दर्द – ए – जुदाई भी मीठा है, याद तेरी जब साथ रहे,
ग़म भी फिर ग़म रहता कब है, ये कैसी मेहरबानी है।
‘मनसीरत’ इस रात की रंगत,उम्र तलक महफ़ूज़ रहे,
रात रूहानी , शाम सुहानी, याद मगर अनजानी है।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)














