ग़ज़लसामान्य

दर्द ए दिल

📅 September 27, 2026 ⏱ 1 मिनट ◉ 13 views 💬 0 comments

****** दर्द – ए – दिल *****
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दर्द -ए- दिल बहुत तड़पाता है,
बेचैन मन दिन-रात घबराता है।

याद उसकी जब भी आती है,
दिल को रह-रह के फिर रुलाता है।

ज़ख़्म-ए-उल्फ़त छुपाएँ भी कैसे,
दर्द आँखों से छलक जाता है।

रात तन्हा गुज़र नहीं पाती,
चाँद भी दर्द-ए-दिल सुनाता है।

हमने चाहा जिसे ख़ुदा की तरह,
वो ही क्यों हमसे दूर जाता है।

उसकी यादों से बच नहीं सकते,
इश्क़ हर बार फिर सताता है।

‘मनसीरत’ ये कैसी चाहत है,
दर्द देकर भी मुस्कुराता है।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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