गीतसामान्य

प्रेम को मैं लिख रही हूँ,प्रेम को मैं गा रही हूँ

📅 October 9, 2026 ⏱ 1 मिनट ◉ 16 views 💬 0 comments

#गीत ✍️ ✍️
मैं, सृजन की साधिका ! संकल्प स्वर दोहरा रही हूँ।
प्रेम को मैं लिख रही हूं, प्रेम को मै गा रही हूँ।

कोसते कब तक रहें हम स्वार्थ की इस कालिमा को?
फिर नियति की देहरी पर दीप क्यों न हम जलाएं ?
इस विषम बदलाव पर आवेशमय अस्तित्व है जब ,
क्या नहीं कर्तव्य है , हम प्रेम को फिर गुनगुनाएं?

चाहती हूं मन-मरुस्थल पर पुनः जीवन उदय हो,
आस से मैं, भाव के कुछ बीज बस बिखरा रही हूं।

प्रेम की पावन धुरी से यदि कहीं फिसली अगर तो,
सोचती हूं क्या नया अवलंब लेंगी सभ्यताएं?
गीत मधुरिम नेह के फिर, कौन कैसे रच सकेगा,
शून्य होंगे भाव सारे मृत हुई यदि कल्पनाएं ?

सूर, तुलसी और मीरा की दिखाई राह पर मैं,
शब्द की आराधिका, अनुगामिनी बन जा रही हूं।

जानती हूं इस धरा पर जंग है हम चांद छू लें,
किंतु ये उपलब्धियां क्या ताप मन का हर सकेंगी?
उंगलियों पर हम नक्षत्रों को घुमाना चाहते हैं,
अंध तृष्णाएं सृजन के लक्ष्य पूरे कर सकेंगी?

ईश ! हों सुदृढ़ सदा, ये स्नेह के निर्दोष धागे,
भाव से कर यत्न, गांठे द्वेष की सुलझा रही हूं।
Swarika Kirti

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