गीतसामान्य

हमको अब वरदान न देना !

📅 October 9, 2026 ⏱ 1 मिनट ◉ 14 views 💬 0 comments

मान सहित स्वीकार पराजय,

अपमानित यशगान न देना !

हमको अब वरदान न देना !

 

देव ! तुम्हारे देवालय में हमने कितने दीप जलाए ,

कर कर के मनुहार भाग्य के रूठे सभी नक्षत्र मनाए,

किंतु कभी इन उपवासों का कोई फलित परिणाम न पाया,

जीवन की अविराम थकन को, दो पल का आराम न आया,

 

अब पीड़ा उत्सव लगती है,

अब इसको अवसान न देना !

 

मधुमय मौसम जिस उपवन के सारे बीत गए एकाकी,

उन कलियों में खिल जाने की कोई चाह नहीं है बाकी,

जिनकी ये ही नियति उन्हें पतझड़ के सारे दिन जीने हैं,

कंठ जिन्हें अभ्यास कि उनको घूंट विषैले ही पीने हैं,

 

अब उनको ये चाह नहीं है

अब उनको सम्मान न देना !

 

भाग्य तुम्हे आभार कि तुमने नहीं राह में फूल बिछाए ,

जग से जितना सिमटे, उतना हम अपने अंतर में आए,

जिसने विरह नहीं जानी,उसने कुछ भी अभिसार न जाना,

जिसको दुख ने छुआ नहीं,उसने जीवन का सार न जाना,

 

दुख जिनके जीवन का तप है,

सुख देकर व्यवधान न देना ।

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