ग़ज़लसामान्य
ग़ज़ल

#ग़ज़ल
एक ही नाम पे इक उम्र बिताने वाले,
वो भी क्या लोग थे रिश्तों को निभाने वाले !
लोग दिल खोल के जब बात किया करते थे,
वो रवायत-ए-वफ़ा, दौर पुराने वाले !
ये जो वीरान सा लगता है मुहब्बत का शहर,
ये गुलिस्ताँ था, बताते हैं बताने वाले !
इनसे धोखा जो मिला है, तो हैरत कैसी ?
और क्या देंगे भला हमको ज़माने वाले !
ग़म हमारा है, हमीं को है निभाना इससे,
आते जाते हैं बस अफ़सोस जताने वाले !
एक वो जिसने नुमाइश की मेरे ज़ख़्मों की,
एक हम, उसके सभी ऐब छुपाने वाले !
संगेमरमर के महल हमको सिखाएँ न वफ़ा,
हम समंदर पे अटल सेतु बनाने वाले !
हमने ताबीज़ दुआओं के पहन रक्खे हैं,
ख़ुद ही मिट जाते हैं, वो हमको मिटाने वाले !





















