गीतसामान्य

हाथ में अमृत कलश है,कंठ में है प्यास !

📅 October 9, 2026 ⏱ 1 मिनट ◉ 12 views 💬 0 comments

 

सिर्फ इतना सा रहा जीवन का ये विन्यास,

हाथ में अमृत कलश है,

कंठ में है प्यास !

है उजालों के शहर में जगमगाता घर हमारा ,

भाग्य यूँ उजला कि जैसे भाग्य में हो सूर्य सारा,

हम हथेली पर लिए हैं , आसमानों के सितारे,

किंतु हम ही जानते हैं, हम कहाँ,कितना हैं हारे,

 

आँसुओं को,

मुस्कुराने का रहा अभ्यास !

 

जब लगा ऐसा कि हमने पा लिया सब कुछ कहीं पर ,

तब न जाने क्या बिखर कर छूट जाता है वहीं पर,

और जीवन क्या ? कि जैसे इस अनिश्चित सी कहानी,

ये कथा युग की, नहीं किसने सुनी, किसने न जानी ?

 

एक पल साम्राज्य

अगले पल विषम वनवास !

 

जो मिला, खो भी गया,तो भी भला संताप क्या है ?

व्यर्थ रोना बैठकर, इससे अधिक अब पाप क्या है?

उलझनें जीवन की, हमको जब भी चाहें आजमाएँ,

हो जिन्हें अभिमान, सपने बेझिझक वो टूट जाएँ,

 

किंतु टूटेगा नहीं ,

मन का अटल विश्वास !

 

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