ग़ज़लसामान्य
जिसको लोगों ने ज़हर दे दिया,कह कर सुकरात

मेरी आंखों में रहेगा वह उजालों की तरह
देखते हैं जिसे सब लोग सवालों की तरह।
मैंने जिस झील में डाले थे पाँव, थक कर के
वो भी निकली थी ज़िन्दगी के बवालों की तरह
जिसको लोगों ने ज़हर दे दिया,कह कर सुकरात
उसकी हर बात लगी मुझको मिसालों की तरह।
मैं उसके बाद किसी और की कभी न हुई
जो मिला ठंड में जलते से पुवालों की तरह।
भाई बन कर जो मिला होता तो हड़का देता
पर मिला मुझको ग़लत शख्स भी सालों की तरह।
जिसको हम प्रेम का धागा समझ के लाए थे
वो लगा मन के सभी कोनों में जालों की तरह।
अब स्वधा उससे कहेगी न कभी दिल की बात
जो उसके होठों पे लग जाता है तालों की तरह।




















