मंच पर चरणस्पर्श, पीठ पीछे चरित्र-चर्चा!

साहित्य की दुनिया भी बड़ी अद्भुत है। यहाँ कविताओं से अधिक विविधता रिश्तों में दिखाई देती है। कोई दादा है, कोई भैया, कोई बड़ी दीदी, कोई माँ समान, तो कोई पितातुल्य! इतने रिश्ते तो किसी संयुक्त परिवार की वंशावली में भी नहीं मिलेंगे, जितने एक कवि-सम्मेलन के मंच पर सुनाई दे जाते हैं।
बस अंतर इतना है कि परिवार में रिश्ते निभाने पड़ते हैं, जबकि साहित्य के कुछ मंचीय रिश्तों में केवल संबोधन से काम चल जाता है।
कल्पना कीजिए, एक कवि-सम्मेलन चल रहा है।
एक कवयित्री अत्यंत भावुक स्वर में कहती हैं, “ये हमारे आदरणीय दादा हैं। पिता के समान हैं। इनका आशीर्वाद मेरे लिए अमूल्य है।”
दादा मुस्कुराते हैं। श्रोता तालियाँ बजाते हैं। कैमरे इस पवित्र क्षण को कैद कर लेते हैं। वातावरण इतना संस्कारमय हो उठता है कि लगता है कविता नहीं, रिश्तों की गंगोत्री मंच पर उतर आई है।
अब दृश्य बदलिए।
कार्यक्रम समाप्त हो चुका है। वही कवयित्री अपनी साहित्यिक सखी के साथ चाय की मेज़ पर बैठी हैं।
“अरे! तुम इन दादा को जानती ही कितना हो? इनकी तो बड़ी लंबी कहानी है। मैं सब जानती हूँ, लेकिन किसी से कहती नहीं!”
और फिर लगभग पैंतालीस मिनट तक किसी से न कहने की अपनी प्रतिज्ञा का अत्यंत निष्ठापूर्वक निर्वाह होता है।
जिस दादा के लिए मंच पर श्रद्धा के पुष्प अर्पित किए गए थे, चाय की मेज़ पर उन्हीं के निजी जीवन की काल्पनिक पांडुलिपि खोली जा रही है।
अद्भुत साहित्यिक संस्कार हैं! सामने संबंधों पर चंदन लगाइए और पीठ पीछे उन्हीं पर संदेह की कालिख पोत दीजिए।
अब पुरुष कवियों की एक काल्पनिक बैठक का आनंद भी लीजिए।
मंच पर कवि महोदय किसी वरिष्ठ कवयित्री के चरण छूकर कहते हैं, “ये मेरी बड़ी दीदी हैं। मेरे लिए माँ का स्थान रखती हैं।”
दीदी स्नेह से सिर पर हाथ फेर देती हैं। आयोजक तस्वीर खिंचवाते हैं। सोशल मीडिया पर कैप्शन लग जाता है—’साहित्यिक रिश्तों की पावन परंपरा’।
कार्यक्रम के बाद चार कवि एक मेज़ पर बैठते हैं।
पहले महोदय कहते हैं, “अरे भाई! तुम इन दीदी को जानते कहाँ हो? इनके बारे में तो न जाने कितनी बातें सुनी हैं!”
दूसरे तुरंत गंभीर हो जाते हैं, “देखिए, हमें किसी महिला के व्यक्तिगत जीवन पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।”
इसके बाद वे स्वयं ही उन सुनी-सुनाई बातों का ऐसा विस्तार करने लगते हैं कि शेष कवियों को बीच में बोलने का अवसर तक नहीं मिलता।
तीसरे कवि अपनी नैतिक श्रेष्ठता का परिचय देते हैं, “भाई, मैं तो प्रत्येक स्त्री को माँ-बहन की दृष्टि से देखता हूँ।”
चौथे मुस्कुराकर कहते हैं, “इसीलिए शायद उनकी निजी ज़िंदगी पर चर्चा करना तुम्हें पारिवारिक कर्तव्य लगता है!”
वाह! क्या विलक्षण संबंध-दर्शन है!
यहाँ किसी व्यक्ति का साहित्य पढ़ना आवश्यक नहीं, उसके निजी जीवन पर राय रखना आवश्यक है। रचना से परिचय हो न हो, रचनाकार के बारे में कोई न कोई कहानी अवश्य होनी चाहिए।
और कहानी का स्रोत?
“अरे! सब जानते हैं!”
यह ‘सब जानते हैं’ भी बड़ा चमत्कारी वाक्य है। इसके सहारे अनुमान को जानकारी, अफ़वाह को इतिहास और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह को सामाजिक चिंता का रूप देने का प्रयास किया जाता है।
इस अद्भुत मौखिक विधा को मैं नाम देना चाहूँगी—‘पीठपौराणिक साहित्य’।
इसमें न कथानक का सत्यापन आवश्यक है, न पात्र की सहमति। कहानी किसी और की, कल्पना अपनी, मसाला सामूहिक और निष्कर्ष सर्वसम्मति से पारित!
इस साहित्य का सबसे लोकप्रिय उद्घाटन-वाक्य होता है—“देखिए, यह बात किसी से कहिएगा मत!”
और यही वह वाक्य है जिसके बाद बात के गोपनीय रहने की सारी संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं।
लेकिन इस हास्यास्पद दृश्य के भीतर एक गंभीर विरोधाभास छिपा है।
जो लोग कविता में मानवीय संवेदनाओं के रक्षक बनते हैं, वे निजी बातचीत में कभी-कभी संवेदनशीलता की बुनियादी मर्यादा भी भूल जाते हैं।
जिनकी कविताओं में स्त्री का सम्मान सर्वोपरि है, वे किसी स्त्री के निजी जीवन को चर्चा का विषय बनाने में संकोच नहीं करते। और जो अपनी रचनाओं में पिता, गुरु तथा बुज़ुर्गों की गरिमा का गुणगान करते हैं, वे कभी उन्हीं संबोधनों से अलंकृत व्यक्ति की अनुपस्थिति में उसके बारे में अप्रमाणित टिप्पणियों का आनंद लेने लगते हैं।
यह कैसी संवेदना है, जो कविता में तो छलकती है, लेकिन व्यवहार में सूख जाती है?
यह कैसा साहित्यिक चिंतन है, जिसमें रचना की गहराई से अधिक रुचि रचनाकार के व्यक्तिगत जीवन की पड़ताल में दिखाई देती है?
यहाँ स्पष्ट है कि किसी के आचरण पर तथ्यपूर्ण और न्यायसंगत प्रश्न उठाना अलग बात है। असहमति, आलोचना और उत्तरदायित्व साहित्यिक जीवन के आवश्यक अंग हैं। लेकिन बिना प्रमाण किसी के निजी जीवन को मनोरंजन की सामग्री बना देना न आलोचना है, न सामाजिक सुधार।
और फिर किसी व्यक्ति का अतीत, उसके निजी संबंध या जीवन की कठिनाइयाँ अपने-आप में उसके चरित्र के विरुद्ध प्रमाण कब से हो गईं?
साहित्य तो मनुष्य को समझने की कला सिखाता है। फिर कुछ साहित्यिक बैठकों में मनुष्य को समझने से अधिक उसका मूल्यांकन करने की इतनी जल्दी क्यों रहती है?
मुझे लगता है, ऐसे मंचीय रिश्तों के लिए बाकायदा एक नियमावली बननी चाहिए—
“सभी दादा, भैया, दीदी, मातातुल्य एवं पितातुल्य संबोधन केवल मंचीय शिष्टाचार के प्रतीक हैं। इनका वास्तविक सम्मान कार्यक्रम समाप्त होने के बाद संबंधित व्यक्तियों के विवेक पर निर्भर करेगा!”
कम-से-कम संबंधों की इस मौखिक व्यवस्था में थोड़ी पारदर्शिता तो आएगी!
वैसे यह भी सच है कि साहित्य में असंख्य लोग ऐसे हैं, जो सामने जितना सम्मान देते हैं, अनुपस्थिति में भी उतनी ही गरिमा बनाए रखते हैं। उनके लिए रिश्ते दिखावे की वस्तु नहीं, आचरण की जिम्मेदारी हैं। इस व्यंग्य का संबंध उनसे नहीं, उस दोहरी प्रवृत्ति से है जिसमें संबोधन और व्यवहार एक-दूसरे के विपरीत खड़े दिखाई देते हैं।
क्योंकि किसी को ‘दादा’ कह देने से संस्कार सिद्ध नहीं होते और किसी को ‘माँ समान’ कहकर चरण छू लेने से सम्मान की अंतिम परीक्षा पूरी नहीं हो जाती।
सम्मान की असली परीक्षा उस समय होती है, जब सम्मान पाने वाला व्यक्ति वहाँ उपस्थित नहीं होता।
साहित्यकार की कलम भले कितनी ही तीखी हो, उसकी संवेदना इतनी भोथरी नहीं होनी चाहिए कि वह दूसरों की निजता और गरिमा के प्रति असावधान हो जाए।
इसलिए मंचीय रिश्तों के उन उत्साही निर्माताओं से एक विनम्र निवेदन है—
यदि किसी से वैचारिक मतभेद हैं तो खुलकर रखिए। किसी के साहित्य से असहमति है तो उसकी रचनाओं की आलोचना कीजिए। किसी के व्यवहार से शिकायत है तो उचित और तथ्यपूर्ण तरीके से उसे उठाइए।
लेकिन रिश्तों की पवित्र शब्दावली को व्यक्तिगत चर्चाओं के लिए सुविधाजनक आवरण मत बनाइए।
क्योंकि रिश्ते सम्मान पाने की सीढ़ियाँ नहीं, सम्मान निभाने की जिम्मेदारियाँ होते हैं।
और अंत में एक प्रश्न—
यदि किसी व्यक्ति के विषय में आपके मन में इतनी शंकाएँ हैं, तो उसे मंच पर पूजनीय बताने की आवश्यकता क्या है?
सच्ची असहमति में भी शालीनता हो सकती है, लेकिन झूठी श्रद्धा में केवल अभिनय होता है।
कवि-कुंभ की विडंबना देखिए—मंच पर रिश्तों का महाकाव्य रचा जा रहा है और मंच के पीछे उन्हीं रिश्तों पर अपुष्ट कथाओं का उपन्यास लिखा जा रहा है!
साहित्य को ऐसे उपन्यासों की नहीं, ऐसी संवेदना की आवश्यकता है जो माइक बंद होने के बाद भी जीवित रहे।
क्योंकि कविता की सबसे बड़ी विफलता तब होती है, जब कवि शब्दों में मनुष्यता रचता है, लेकिन व्यवहार में उसी मनुष्यता को निभाना भूल जाता है।
— स्वधा रवीन्द्र उत्कर्षिता
लेखकीय टिप्पणी: यह व्यंग्य साहित्यिक परिवेश में दिखाई दे सकने वाली एक सामान्य मानवीय प्रवृत्ति पर आधारित कल्पनात्मक रचना है। इसमें प्रयुक्त पात्र, संवाद और परिस्थितियाँ किसी वास्तविक व्यक्ति, संस्था या विशिष्ट आयोजन का वर्णन अथवा उनके संबंध में तथ्यात्मक आरोप नहीं हैं। इसका उद्देश्य किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक संबोधनों और निजी व्यवहार के बीच विरोधाभास पर विचार करना है।

















