एक कप चाय का त्याग

“कभी-कभी किसी की ज़िंदगी बदलने के लिए बड़ी कुर्बानी नहीं, बस अपनी एक छोटी-सी खुशी छोड़ देनी पड़ती है।”
स्कूल की सफ़ाई करने वाली कमला रोज़ दोपहर में एक कप चाय पिया करती थी। दिन भर की थकान के बीच वही दस मिनट उसके अपने होते थे।
एक दिन उसने देखा कि आठवीं कक्षा की एक बच्ची, मीरा, विद्यालय के बरामदे में बैठी रो रही थी।
पूछने पर पता चला कि छात्रवृत्ति परीक्षा का फ़ॉर्म भरने के लिए उसके पास तीन सौ रुपये नहीं थे।
अगले दिन से कमला ने चाय पीना छोड़ दिया।
न किसी से कुछ कहा, न किसी को कारण बताया।
तीस दिन बाद विद्यालय के कार्यालय में मीरा के नाम से तीन सौ रुपये जमा हो गए।
मीरा ने परीक्षा दी, छात्रवृत्ति पाई और आगे की पढ़ाई पूरी की।
वर्षों बाद वही मीरा एक चिकित्सक बन गई। वह अक्सर कहा करती थी कि किसी अनजान व्यक्ति की सहायता ने उसके सपनों को मरने से बचा लिया था।
उधर कमला आज भी उसी स्कूल में सफ़ाई करती थी।
किसी को मालूम नहीं था कि एक बच्ची के भविष्य की नींव में उसकी तीस प्याली चाय दफ़्न थीं।
त्याग हमेशा भूखे रहने, आँसू बहाने या अपना सर्वस्व लुटा देने का नाम नहीं होता। कभी-कभी अपनी छोटी-सी खुशी किसी दूसरे के बड़े सपने के नाम कर देना भी त्याग होता है।
और दुनिया का सबसे सुंदर त्याग शायद वही है, जिसका कोई साक्षी नहीं होता।
“इतिहास बड़े-बड़े दान लिखता है, मगर कितने ही भविष्य उन छोटी इच्छाओं की समाधि पर खड़े होते हैं, जिन्हें त्यागने वालों का नाम तक दुनिया नहीं जानती।”
लेखिका — स्वधा रवीन्द्र उत्कर्षिता

















