समीक्षासामान्य
**माटी की महक और मन की उजास : राघव भैया का गीत-संसार**

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मन की बात
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कुछ लोग अपने परिचय शब्दों से नहीं, अपनी आत्मीयता से देते हैं।
राघव भैया के गीतों को पढ़ते हुए मन में बार-बार यही भाव आता है कि यह केवल एक कवि या गीतकार की लेखनी नहीं, बल्कि एक अत्यंत सरल, संयमी, शालीन और भीतर से बहुत सुंदर मन वाले व्यक्ति की अभिव्यक्ति है। उनके चेहरे की सहज मुस्कान और शांत व्यक्तित्व को देखकर भी यही आभास होता है कि वे उन लोगों में से हैं जो जीवन में बहुत कम बोलते हैं, लेकिन जब बोलते हैं तो सीधे मन तक उतर जाते हैं।
न जाने क्यों, उनसे कभी मुलाक़ात या बातचीत न होने पर भी एक अपनापन सा महसूस होता है, मानो परिवार का ही कोई आत्मीय सदस्य अपने मन की बातें गीतों में कह रहा हो।
राघव भैया के गीतों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उनमें जीवन पूरी सच्चाई के साथ दिखाई देता है। उनके शब्दों में बनावट नहीं है, दिखावा नहीं है, बल्कि जीवन की तपती धूप, संघर्ष की थकान, मिट्टी की सोंधी गंध, गाँव की आत्मा, श्रम का स्वाभिमान और मनुष्य के भीतर बची हुई करुणा सब एक साथ दिखाई देते हैं।
वे जब मेहनतकश लोगों की बात करते हैं तो उनके शब्दों में केवल सहानुभूति नहीं होती, बल्कि गहरा सम्मान दिखाई देता है। ऐसा लगता है मानो वे उन लोगों के दर्द को बहुत भीतर तक महसूस करते हैं जो दिन-रात तपकर भी जीवन में उपेक्षित रह जाते हैं। उनके गीतों में संघर्ष रोता नहीं, सिर उठाकर चलता है। यही बात उनके लेखन को अलग बनाती है।
उनकी रचनाओं में एक बहुत सुंदर आत्ममंथन भी दिखाई देता है। आधुनिक जीवन की भागदौड़, भीतर का खालीपन, भक्ति से दूर होता मन, बदलते संस्कार और खोती हुई संवेदनाएँ — इन सबको उन्होंने जिस सहजता से शब्द दिए हैं, वह मन को छू जाती है। ऐसा लगता है जैसे कोई अपने ही मन से बैठकर बातें कर रहा हो। उनके गीतों में शिकायत से अधिक चिंता दिखाई देती है और यही चिंता उन्हें संवेदनशील बनाती है।
प्रकृति के प्रति उनका प्रेम तो विशेष रूप से मन मोह लेता है। महुआ, नीम, बरगद, पीपल, सांझ, धूप — ये सब उनके गीतों में केवल पेड़-पौधे या दृश्य नहीं रह जाते, बल्कि अपने जैसे लगने लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे राघव भैया प्रकृति से बातें करते हों और वही संवाद गीत बनकर बह निकलते हों। उनके गीतों को पढ़ते हुए मन अनायास ही गाँव की पगडंडियों, बचपन की स्मृतियों और उस पुराने सरल जीवन की ओर लौटने लगता है जहाँ मन थोड़ा अधिक शांत हुआ करता था।
उनकी आध्यात्मिक चेतना भी बहुत सहज और सुंदर है। वे आस्था को कभी बोझिल नहीं बनाते। उनके शब्दों में भक्ति है, पर कट्टरता नहीं; ज्ञान है, पर अहंकार नहीं। यही कारण है कि उनके गीत पढ़ते हुए मन में एक शांति उतरती है। ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत अपनत्व से समझा रहा हो कि जीवन केवल तर्क से नहीं, भाव और विश्वास से भी चलता है।
राघव भैया की भाषा अत्यंत सरल है, लेकिन उसी सरलता में उनकी सबसे बड़ी शक्ति छिपी हुई है। वे कठिन शब्दों का सहारा लिए बिना बहुत गहरी बात कह जाते हैं। उनके गीत पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि कविता पढ़ रहे हैं; लगता है जैसे जीवन स्वयं बोल रहा हो। यही किसी सच्चे रचनाकार की पहचान होती है।
सच कहूँ तो उनके गीतों में एक आत्मीय ऊष्मा है। उनमें कहीं न कहीं अपनेपन की वह छाया दिखाई देती है जो आज के समय में बहुत दुर्लभ होती जा रही है। उनके शब्दों में संवेदना है, संस्कृति है, संघर्ष है, आस्था है और सबसे बढ़कर मनुष्य और जीवन के प्रति प्रेम है। शायद इसी कारण उनके गीत पढ़ने के बाद वे लंबे समय तक मन में बने रहते हैं।
राघव भैया को हृदय से ढेर सारी शुभकामनाएँ।
ईश्वर करे उनकी लेखनी यूँ ही संवेदनाओं के दीप जलाती रहे, लोगों के मनों को छूती रहे और जीवन की सच्चाइयों को इतनी ही सहजता और आत्मीयता से शब्द देती रहे।
उनके गीतों की यह सादगी, यह अपनापन और यह भाव-संपन्नता उन्हें बहुत दूर तक ले जाएगी — ऐसा विश्वास मन में सहज ही जागता है।
स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता
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तो आइये आज पढ़ते हैं राघव भैया के कुछ गीत
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1.
नहीं चाहिए हमें तुम्हारे हाथों का चुल्लू भर पानी
हमको कुआं खोदकर अपनी प्यास बुझाना भी आता है।
हम तो नंगे पैरों कांटों पर चलने के अभ्यासी हैं
सूरज में तपने के भट्टी में जलने के अभ्यासी हैं
हमने जीवन में जाने कितने तूफानों से टक्कर ली
धूल गुबारों को अपने माथे मलने के अभ्यासी हैं
घावों पर खुद नमक लगाकर बढ़ते जाते हम सैलानी
हमको चमकीले सूरज से आंख मिलाना भी आता है।
खून पसीना रोज बहाकर सदा हाट में हम बिकते हैं
रोज आग में तपकर सोने की प्रतिमा जैसे दिखते हैं
लिखे गए काली स्याही से हम तो हैं एक किस्से जैसे
चट्टानों के अनगढ़ माथे पर अपनी किस्मत लिखते हैं
हम ऐसे किरदार हमारी कौन रहेगा यहां कहानी
हमको पत्थर पर छेनी की कलम चलाना भी आता है।
हमसे ही शहरों में रौनक और गांव में हरियाली है
हम ही हैं वह सत्तर प्रतिशत जिनकी रात सदा काली है
हमने ही हड्डियां गलाकर रीढ़ देश की सीधी रक्खी
फिर भी हम ही सदा तिरस्कृत जेब हमारी ही खाली है
कोई नहीं हमारा अपने तो हैं केवल अवढरदानी
हमको मेहनत करके खाना और कमाना भी आता है।
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2.
मृगतृष्णाओं ने भटकाया
इस मन को हर बार
खोजा सुख बस हाथ लगा है
दुख का पारावार।
चलते चलते कहाँ आ गए
रहा न हमको ध्यान
भीतर अब भी कोलाहल है
बाहर है वीरान
जीवन शैली भी बदली है
बदल गया व्यवहार।
छूट गया है भजन, लगी है
एक अजब सी होड़
दान न होता इन हाथों से
खूब रखा है जोड़
जीवन तो बस एक जुआँ है
सब जाना है हार।
जिह्वया ने भी छोड़ दिया है
रामनाम अभ्यास
भोजन हुआ तामसी, मन में
है रावण का वास
इस कारण ही जीवन में बस
छाया हाहाकार।
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3.
आओ तुमको मीत सुनाएँ
एक सांझ का गीत।
मिला आज सूने रस्ते पर
इक महुएका पेड़
डाली पर गलबहियां डाली
दिया तनिक जो छेड़
फिर मीठी मीठी सुगंध से
लगा बढ़ाने प्रीत।
आगे बढ़ा मिला फिर हमको
फल का राजा आम
राजा को भी शीश झुकाकर
हमने किया प्रणाम
याद आ गया क्षण भर में ही
अपना सुखद अतीत।
ठीक सामने शांत खड़े थे
गूलर पाकर नीम
मानो साथ खड़े हों तीनो
पार्थ युधिष्ठिर भीम
इस जीवन के कुरुक्षेत्र में
गए आज हम जीत।
बरगद पीपल साथ साथ में
करें वार्तालाप
हम भी फिर साष्टांग हो गए
देवतुल्य हैं आप
मिला हमें आशीष आपसे
अतिशय आशातीत।
सूरज डूब रहा था तो फिर
लिया स्वयं को रोक
थोड़ा सा थक गया, लगाई
फिर शीशम की धोक
घर चलने का समय हो गया
सांझ गई है बीत।
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4.
कण कण में भी दिख जाएँगे
तुमको हे श्रीमान
पहले मंदिर जाकर देखो
बैठे हैं भगवान।
व्यर्थ कुतर्क करो मत भाई
सुनो सरल सी बात
पहले सदा ज्ञात को जानो
फिर खोजो अज्ञात
ध्यान लगाना बहुत कठिन है
भजन बड़ा आसान।
मंदिर की सुंदर मूरत का
मत तुम करो विरोध
पहले थोड़ा अध्ययन कर लो
करो बाद में शोध
कविता भी लिख लेना पहले
कर लो अक्षरज्ञान।
माना आप सभी से ऊपर
हैं मूर्धन्य प्रकांड
लेकिन नहीं समझ पाएँगे
अंश मात्र ब्रह्मांड
उस परमेश्वर की सत्ता से
बहुत दूर विज्ञान।
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