समीक्षासामान्य
कवि शिवांश शुक्ला ‘सरस’ : काव्य-दृष्टि और रचनात्मक व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने का एक छोटा सा प्रयास

शिवांश शुक्ला ‘सरस’ समकालीन हिंदी कविता के उन युवा रचनाकारों में दिखाई देते हैं जिनकी लेखनी एक ही भावभूमि तक सीमित नहीं रहती। उनके काव्य में राष्ट्रभाषा के प्रति अनुराग, सामाजिक चेतना, राजनीतिक प्रश्नाकुलता, लोकतांत्रिक मूल्यों की चिंता, जनसामान्य के जीवन की विडंबनाएँ और सहज मानवीय हास्य—सभी समान अधिकार के साथ उपस्थित हैं। यही बहुआयामिता उन्हें केवल एक भावुक कवि नहीं, बल्कि अपने समय का सजग साक्षी बनाती है।
उनकी भाषा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सरलता और संप्रेषणीयता है। वे कठिन शब्दों और दुरूह प्रतीकों का सहारा लेने के बजाय बोलचाल की हिंदी का प्रयोग करते हैं। यही कारण है कि उनकी कविताएँ पाठक तक बिना किसी बौद्धिक अवरोध के पहुँचती हैं। उनकी रचनाओं में लोकभाषा का सहज स्पर्श भी मिलता है, जो कविता को कृत्रिम होने से बचाता है और उसे आम जन के अनुभवों से जोड़ देता है।
‘सरस’ की कविताओं में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति गहरा आत्मीय भाव दिखाई देता है। हिंदी उनके लिए केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना का जीवंत स्वरूप है। वे हिंदी की समृद्ध साहित्यिक परंपरा, उसके महान कवियों और उसकी सांस्कृतिक विरासत को स्मरण करते हुए भाषा के प्रति सम्मान का भाव जगाते हैं। साथ ही वे यह चिंता भी व्यक्त करते हैं कि आधुनिकता और बाज़ारवाद के प्रभाव में कहीं हिंदी अपने ही घर में उपेक्षित न हो जाए। यह चिंता किसी संकीर्ण भाषायी आग्रह की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता की चिंता है।
उनकी रचनाओं का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक और राजनीतिक चेतना है। वे अपने समय की विसंगतियों पर मौन नहीं रहते। व्यवस्था की उदासीनता, लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी, युवाओं की समस्याएँ और सत्ता की जवाबदेही जैसे प्रश्न उनकी कविता में तीखे किन्तु संयमित स्वर में उपस्थित होते हैं। वे आरोप लगाने की अपेक्षा प्रश्न उठाते हैं, और यही प्रश्न उनकी कविता को विचारोत्तेजक बनाते हैं। उनकी दृष्टि में कविता केवल सौंदर्य का साधन नहीं, बल्कि समाज से संवाद का माध्यम भी है।
‘सरस’ की कविताओं में युवा मन की बेचैनी भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनके यहाँ सपनों के टूटने का दर्द है, भविष्य को लेकर चिंता है और व्यवस्था से उत्तर पाने की आकांक्षा भी। वे उस पीढ़ी की आवाज़ बनते हैं जो अवसर चाहती है, न्याय चाहती है और अपने प्रश्नों को सुने जाने की अपेक्षा रखती है। उनकी संवेदना व्यक्तिगत न होकर सामूहिक है।
इन गंभीर विषयों के समानांतर उनका एक अत्यंत आकर्षक पक्ष हास्य और विनोद का है। वे साधारण-सी दैनिक घटनाओं को भी इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि पाठक सहज ही मुस्कुरा उठता है। उनका हास्य किसी का उपहास नहीं उड़ाता, बल्कि जीवन की छोटी-छोटी खुशियों का उत्सव मनाता है। इस प्रकार वे सिद्ध करते हैं कि कविता केवल गंभीर चिंतन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन की सहजता और आनंद का भी उत्सव हो सकती है।
शिल्प की दृष्टि से उनकी कविताएँ लयात्मक, गेय और स्मरणीय हैं। दोहराव (Refrain) का प्रभावी प्रयोग, तुकांतता, सहज प्रवाह और स्पष्ट कथ्य उनकी रचनाओं को मंचीय प्रस्तुति के लिए भी उपयुक्त बनाते हैं। उनकी कविताएँ पढ़ने के साथ-साथ सुनने में भी समान रूप से प्रभावशाली प्रतीत होती हैं। कहीं-कहीं वे लोकगीत जैसी आत्मीयता का अनुभव कराती हैं।
यद्यपि उनकी रचनाएँ प्रभावशाली हैं, फिर भी एक समीक्षक के रूप में यह कहा जा सकता है कि भविष्य में यदि वे प्रतीकों, बिंबों और रूपकों की विविधता को और अधिक विस्तार दें तथा भावों की सूक्ष्म परतों पर भी उतना ही ध्यान दें, तो उनका काव्य और अधिक गहन तथा दीर्घजीवी बन सकता है। उनकी सहज भाषा उनकी सबसे बड़ी शक्ति है; यदि उसके साथ और अधिक कलात्मक गहराई जुड़ जाए तो उनकी रचनाएँ व्यापक साहित्यिक विमर्श का भी हिस्सा बन सकती हैं।
समग्रतः शिवांश शुक्ला ‘सरस’ ऐसे कवि हैं जो अपनी कविता को जीवन से अलग नहीं करते। वे भाषा से प्रेम करते हैं, समाज से प्रश्न करते हैं, लोकतंत्र के प्रति सजग हैं, युवाओं की पीड़ा को स्वर देते हैं और जीवन के हल्के-फुल्के क्षणों में भी कविता खोज लेते हैं। उनकी रचनाएँ यह विश्वास जगाती हैं कि कविता आज भी समाज को सोचने, मुस्कुराने और स्वयं से संवाद करने की प्रेरणा दे सकती है। यही उनकी रचनात्मकता की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
तो आज पढ़ते हैं उनकी कुछ रचनाएं
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1.
सबकी अपनी भाषाएँ हैं
सबकी निश्चित सीमाएँ हैं
जिनकी न सीमा है कोई
वे हिन्दी की रचनाएँ हैं
ईश्वर से आशीष रुप में देखो हमने पाई हिन्दी
हम कवियों ने मुक्त कंठ से रात रात भर गाई हिन्दी
तुलसी की चौपाई इसमें
कबिरा की कविताई इसमें
प्रेमचंद्र के “हीरा मोती”
दोहा, छन्द, रूबाई इसमें
खुसरो के आगंन में पलकर परसाई तक आई हिन्दी
हम कवियों ने मुक्त कंठ से रात रात भर गाई हिन्दी
है नीरज के गीत इसी में
है प्रसाद की प्रीत इसी में
कालिदास का अजि बन रोना,
रामायण सी जीत इसी में
सारी भिन्न भिन्न भाषाओं की करती तुरपाई हिन्दी
हम कवियों ने मुक्त कंठ से रात रात भर गाई हिन्दी
स्वामी का संबोधन इसमें
है कवियों का रोदन इसमें
पंच प्रयागों का मिश्रण ये
गौ माता का गोधन इसमें
लेकिन अपने आगंन से क्यों होने लगी पराई हिन्दी
हम कवियों ने मुक्त कंठ से रात रात भर गाई हिन्दी
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2.
शायद! मद में भूल रहे हो
राजन तुम दायित्व तुम्हारे
तुमसे कुछ उम्मीद जगी थी
इसीलिए अधिकार दिए है
पर लापरवाही से तुम ने
सपने सारे मार दिए है
जिन को कक्षा में होना था
वो फिरते है मारे मारे
सही गलत की बात नहीं थी
केवल तुमको प्रश्न थे सुनने
तुमने तब तब मौन चुना था
जब तुम को थे उत्तर चुनने
संविधान लाचार खडा था
रक्षक बना दिए हत्यारे
जाति, धर्म और लिंग की बातें
सब ने सुनी सभी ने देखी
और सत्य है राजनीति ने
गरम तवे पर रोटी सेकी
इन सब में ही उलझा करके
हर दम मारे प्रश्न हमारे
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3.
जब जब थककर चूर हुए हम
गुस्से में भरपूर हुए हम
तब तब इक आवाज लगाई
कहाँ गए राजेन्दर भाई
मोहन थोडी चाय चढाओ
जाओ फिर मोमोज़ ले आओ
हार गए जब युद्ध कभी हम
या आंखे जब हुए कभी नम
गर्ल – फ्रेंड से हुई लडाई
या कालेज में हाथापाई
मन से बोले मौज मनाओ
जाओ फिर मोमोज़ ले आओ
जब आंखों पर नींद चढी हो
चूहों की घुडदौड मची हो
मैदा थोडा ज्यादा खाना
दो अफगानी दो फ्राई लाना
थोडा पैसा तुम भी मिलाओ
जाओ फिर मोमोज़ ले आओ
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