समीक्षासामान्य

शब्दों में समर्पण, संवेदनाओं में जीवन : मेरे प्रिय कवि मुक्तेश्वर पराशर

📅 October 15, 2026 ⏱ 13 मिनट ◉ 34 views 💬 1 comments

कुछ रचनाकार अपनी शब्द-साधना से प्रभावित करते हैं, तो कुछ अपने शब्दों के पीछे छिपे व्यक्तित्व से भी आत्मीय संबंध स्थापित कर लेते हैं। मेरे प्रिय कवि मुक्तेश्वर पराशर ऐसे ही रचनाकार हैं, जिनकी कविताओं में मुझे एक संवेदनशील हृदय के साथ विचारों की दृढ़ता और जीवन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है। उनके व्यक्तित्व में प्रेमी की कोमलता, चिंतक की गंभीरता और सामाजिक विसंगतियों पर प्रश्न उठाने वाले एक सजग मनुष्य की मुखरता का अनूठा संगम है। वे संबंधों में निष्ठा, व्यवहार में स्पष्टता और प्रेम में समर्पण को महत्त्व देते हैं। उनकी रचनाओं से गुजरते हुए अनुभव होता है कि उनके लिए कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अपने विश्वासों, अनुभवों और जीवन-दृष्टि को शब्द देने का एक ईमानदार प्रयास है। स्वयं एक कवयित्री होने के नाते मुझे उनके व्यक्तित्व का यही पक्ष विशेष आकर्षित करता है कि वे अपनी अनुभूतियों को छिपाने के बजाय पूरी निर्भीकता से अभिव्यक्त करते हैं। उनके काव्य से मेरा जुड़ाव केवल पाठकीय आस्वाद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक रचनाकार के रूप में उनकी संवेदना और शिल्प को समझने की जिज्ञासा भी जगाता है।

स्वयं कविता लिखने के कारण मैं जानती हूँ कि शब्दों को तुकांत में बाँध देना ही कविता नहीं होता। कविता तब जन्म लेती है, जब कोई अनुभूति इतनी प्रबल हो उठे कि मौन उसे सँभाल न सके। मुक्तेश्वर पराशर की रचनाओं को पढ़ते हुए मुझे अनेक बार ऐसा लगता है कि उनके लिए कविता कोई पूर्वनिर्धारित साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि भीतर संचित अनुभूतियों का स्वाभाविक प्रस्फुटन है। वे जीवन को पहले अनुभव करते हैं, फिर उन अनुभवों के अर्थ तलाशते हैं और अंततः उन्हें ऐसी काव्यात्मक अभिव्यक्ति देते हैं, जो पाठक के हृदय और मस्तिष्क दोनों को स्पर्श करती है।

उनकी रचनाओं में प्रेम की उपस्थिति अत्यंत व्यापक है, किंतु वह केवल शृंगार की कोमल अनुभूति तक सीमित नहीं रहती। उसमें समर्पण है, प्रतीक्षा है, त्याग है और सबसे बढ़कर प्रिय के अस्तित्व को स्वीकार करने की उदारता है। मुझे उनकी प्रेम-दृष्टि इसलिए आकर्षित करती है, क्योंकि वे प्रेम को अधिकार से अधिक उत्तरदायित्व के रूप में देखते हैं। उनका प्रेमी अपनी इच्छाओं की पूर्ति से पहले प्रिय के सुख की कल्पना करता है। कभी वह छाया बनना चाहता है, कभी किसी की प्यास बुझाने के लिए स्वयं को रिक्त कर देना चाहता है। यहाँ प्रेम एक ऐसी आध्यात्मिक ऊँचाई ग्रहण करने लगता है, जहाँ अपने लिए कुछ बचा लेने की आकांक्षा गौण हो जाती है।

यद्यपि एक कवयित्री के रूप में मैं यह भी मानती हूँ कि प्रेम में समर्पण जितना सुंदर है, आत्मसम्मान और दोनों व्यक्तियों के अस्तित्व का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। इसीलिए उनके काव्य में आत्मविसर्जन की तीव्रता मुझे भावुक तो करती है, किंतु उसके साथ यह प्रश्न भी जगाती है कि क्या प्रेम की पूर्णता स्वयं को मिटा देने में ही है, अथवा दो स्वतंत्र व्यक्तित्वों के परस्पर सम्मान में भी? मेरे लिए उनके काव्य की सुंदरता इसी में है कि वह केवल सहमति नहीं, विचार की संभावना भी उत्पन्न करता है।

मुक्तेश्वर पराशर के लेखन का एक अत्यंत प्रभावशाली पक्ष उनकी पीड़ा को सौंदर्य में रूपांतरित करने की क्षमता है। वे दुःख का वर्णन भर नहीं करते, उसे एक ऐसी अनुभूति में बदल देते हैं जिसमें पाठक अपनी ही जीवनयात्रा की प्रतिध्वनि सुन सकता है।

“रात के चरन पकड़ के भोर माँगते रहे”

यह पंक्ति मुझे विशेष रूप से प्रभावित करती है। कितनी सहज है इसकी भाषा और कितना गहरा है इसका भाव! रात के चरण पकड़कर भोर माँगना केवल अँधेरे से प्रकाश की याचना नहीं, बल्कि उन समस्त मनुष्यों की सामूहिक प्रार्थना है जिन्होंने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर परिस्थितियों के सामने स्वयं को असहाय पाया है। यहाँ मुझे कवि की कल्पनाशीलता से अधिक उसकी अनुभूति की प्रामाणिकता आकर्षित करती है। एक कवि के लिए इससे बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है कि उसकी व्यक्तिगत अनुभूति पाठक का अपना अनुभव बन जाए!

उनकी रचनाओं में प्रकृति केवल दृश्य-सौंदर्य नहीं रचती, बल्कि मानवीय भावनाओं की भाषा बन जाती है। चाँद और चकोर, नदी और धार, बरगद की छाया, गंगातट, फूल और काँटे, रात और भोर—ये सभी प्रतीक अपने पारंपरिक अर्थों से आगे बढ़कर जीवन की विभिन्न मनःस्थितियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुझे उनके बिंबों में सबसे सुंदर यह लगता है कि वे जटिल भावनाओं को परिचित दृश्यों के माध्यम से व्यक्त कर देते हैं। पाठक को अर्थ तक पहुँचने के लिए अत्यधिक बौद्धिक श्रम नहीं करना पड़ता, फिर भी अर्थ की गहराई समाप्त नहीं होती।

उनकी कल्पना में भारतीय सांस्कृतिक चेतना की गहरी उपस्थिति भी दिखाई देती है। राम, अहिल्या, वनवास, गंगा, वंशीवट और बोधिवृक्ष जैसे संदर्भ उनके काव्य को हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों से जोड़ते हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से वे त्याग, करुणा, मर्यादा, प्रतीक्षा और आत्मिक उत्कर्ष जैसे जीवन-मूल्यों की व्याख्या करते हैं। मुझे यह विशेष रूप से प्रिय है कि उनकी कविता अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है। वह आधुनिक अनुभवों को व्यक्त करते हुए भी अपने सांस्कृतिक परिवेश से विमुख नहीं होती।

उनकी भाषा पर विचार करती हूँ तो मुझे उसमें दो अलग-अलग धाराओं का सुंदर संगम दिखाई देता है। एक ओर संस्कृतनिष्ठ हिंदी की गरिमा है, दूसरी ओर उर्दू शब्दावली की नज़ाकत और भावात्मक लचक। वे आवश्यकता पड़ने पर गंभीर दार्शनिक शब्दों का प्रयोग करते हैं और अगले ही क्षण इतनी सहज हिंदुस्तानी में अपनी बात कह जाते हैं कि वह सीधे हृदय में उतरती है।

एक कवयित्री होने के नाते मैं शब्दों के चयन को अत्यंत महत्त्व देती हूँ। मेरे लिए कविता में प्रत्येक शब्द का अपना भार, अपना रंग और अपनी ध्वनि होती है। मुक्तेश्वर पराशर की रचनाओं में कई स्थानों पर शब्दों का ऐसा चयन देखने को मिलता है जो अभिव्यक्ति को स्मरणीय बना देता है। ‘आँसुओं की पालकी’, ‘साँस की पाई-पाई’ और ‘प्राण-सिंधु’ जैसे प्रयोग उनकी रचनात्मक कल्पना का परिचय देते हैं। यद्यपि कुछ स्थानों पर तुकांत के प्रति विशेष आग्रह अर्थ की स्वाभाविक गति को थोड़ा प्रभावित करता है, फिर भी उनकी भाषिक अभिव्यक्ति में एक ऐसी सहज आत्मीयता है जो पाठक को रचना से जोड़े रखती है।

उनकी काव्यात्मकता का एक अन्य महत्त्वपूर्ण गुण उसकी लय और संप्रेषणीयता है। उनके गीतों में टेक का प्रयोग, भावों की आवृत्ति और शब्दों का प्रवाह पाठक के भीतर एक विशिष्ट संगीत उत्पन्न करता है। उनके यहाँ गीत केवल पढ़े जाने की वस्तु नहीं रह जाते, उन्हें गुनगुनाने की इच्छा भी होती है। ग़ज़लनुमा रचनाओं में रदीफ़ और क़ाफ़िये का आकर्षण दिखाई देता है, जबकि गीतों में भावों की क्रमिक विस्तारशीलता और मुखड़े की पुनरावृत्ति उन्हें प्रभावशाली बनाती है। मुझे लगता है कि किसी गीतकार की यह बहुत बड़ी सफलता है कि उसकी पंक्तियाँ पाठक की स्मृति में ठहर जाएँ और अनायास किसी भावुक क्षण में पुनः होंठों पर लौट आएँ।

उनकी काव्य-दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष जीवन-दर्शन भी है। वे प्रेम और पीड़ा के साथ-साथ हार-जीत, पूर्णता-अपूर्णता, संबंधों की सार्थकता और मनुष्य की नैतिक जिम्मेदारियों पर भी विचार करते हैं। उनके अनेक कथन सूक्तिपरक हैं। वे किसी साधारण से अनुभव को उठाकर उससे जीवन का व्यापक अर्थ निकालने का प्रयास करते हैं।

“करते अधूरा इश्क़ हैं सौ बार कई लोग

कुछ लोग एक शख़्स से सौ बार मुकम्मल”

इन पंक्तियों में मुझे कवि की प्रेम-दृष्टि का अत्यंत सुंदर और सारगर्भित रूप दिखाई देता है। यहाँ प्रेम की पूर्णता संबंधों की संख्या में नहीं, उनकी गहराई में खोजी गई है। मुझे लगता है कि सच्चा कवि वही है जो उन अनुभूतियों को भी शब्द दे सके जिन्हें हम वर्षों महसूस करते रहते हैं, लेकिन अभिव्यक्त नहीं कर पाते।

मुक्तेश्वर पराशर की रचनाओं में मुझे एक ऐसा कवि भी दिखाई देता है जो समाज के प्रति उदासीन नहीं है। वह मानवीय आचरण पर प्रश्न उठाता है, व्यवस्था में उत्तरदायित्व चाहता है और संबंधों में ईमानदारी की अपेक्षा करता है। उसका स्वर कभी-कभी इतना स्पष्ट और निर्देशात्मक हो जाता है कि कविता उपदेश के निकट पहुँचती हुई प्रतीत होती है। कुछ सामाजिक मान्यताओं, विशेषकर स्त्री के आचरण से जुड़े विचारों पर मेरी दृष्टि उनसे भिन्न हो सकती है। किंतु किसी कवि का प्रिय होना उसकी प्रत्येक धारणा से सहमत होना नहीं है। मेरे लिए प्रिय कवि वह भी है जिसकी पंक्तियाँ मुझे ठहरकर सोचने, प्रश्न करने और अपने दृष्टिकोण को अधिक स्पष्ट करने के लिए प्रेरित करें।

मुझे उनके लेखन की एक और विशेषता आकर्षित करती है—भावुकता के साथ उनकी वैचारिक स्पष्टता। वे अपने विचारों को घुमाकर कहने के बजाय सीधे पाठक के सामने रखते हैं। उनकी इस स्पष्टवादिता में कहीं आत्मविश्वास है, कहीं अनुभव की दृढ़ता और कहीं अपने विचारों के प्रति गहरी निष्ठा। उनकी कविता की यह संवादधर्मिता उसे मंच पर भी प्रभावी बनाती है। हालाँकि कविता का सौंदर्य कभी-कभी अनकहे में भी निहित होता है। जब कवि पाठक के लिए कुछ अर्थ अनिर्णीत छोड़ देता है, तो पाठक की कल्पना भी रचना की सहयात्री बन जाती है। मुझे लगता है कि पराशर की जिन पंक्तियों में संकेत अधिक और व्याख्या कम है, वे अपेक्षाकृत अधिक दूर तक अपना प्रभाव छोड़ती हैं।

उनकी रचनाओं में शृंगार और करुण रस की प्रधानता दिखाई देती है, किंतु इनके साथ शांत रस की दार्शनिक प्रवृत्ति तथा कहीं-कहीं सामाजिक चेतना से उत्पन्न ओजस्विता भी उपस्थित है। रूपक, मानवीकरण, अनुप्रास और विरोधाभास जैसे अलंकार उनकी अभिव्यक्ति को कलात्मकता प्रदान करते हैं। विशेष रूप से विरोधी स्थितियों के माध्यम से जीवन का सत्य प्रस्तुत करना उनके लेखन की उल्लेखनीय प्रवृत्ति है। हार और जीत, अँधकार और प्रकाश, सुख और दुःख, पूर्णता और अपूर्णता के बीच वे जीवन के गहरे संबंध खोजते हैं। कहीं-कहीं वैज्ञानिक शब्दावली का प्रतीकात्मक प्रयोग भी उनकी अभिव्यक्ति में नवीनता लाता है। यद्यपि ऐसे प्रयोग हर स्थान पर समान रूप से सहज नहीं बन पाए हैं, फिर भी वे कवि की प्रयोगशील दृष्टि का परिचय अवश्य देते हैं।

किसी रचनाकार के साहित्यिक मूल्यांकन में केवल प्रशंसा करना मुझे पर्याप्त नहीं लगता। कविता के प्रति सच्चा सम्मान यही है कि हम उसके सौंदर्य के साथ उसकी सीमाओं को भी पहचानें। मुक्तेश्वर पराशर की काव्य-यात्रा में जहाँ भावों की प्रगाढ़ता और स्मरणीय अभिव्यक्तियाँ उनकी शक्ति हैं, वहीं कुछ स्थानों पर अधिक कथनात्मकता, पारंपरिक बिंबों की पुनरावृत्ति और तुकांत का आग्रह उनकी कलात्मक संभावनाओं को सीमित करता दिखाई देता है। मुझे विश्वास है कि भाव और शिल्प के बीच अधिक सूक्ष्म संतुलन उनकी अभिव्यक्ति को और अधिक प्रभावशाली बना सकता है।

लेकिन इन सभी साहित्यिक विवेचनों से अलग, उनके काव्य में एक बात मुझे बार-बार आकर्षित करती है—उनका विश्वास कि मनुष्य के भीतर अभी भी प्रेम, करुणा, निष्ठा और संवेदना के लिए स्थान बचा हुआ है।

यह विश्वास आज के समय में साधारण नहीं है। ऐसे दौर में, जब संबंधों की स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं और भावनाओं की अभिव्यक्ति भी कई बार प्रदर्शन का रूप ले लेती है, किसी कवि का प्रेम में समर्पण, निष्ठा और मर्यादा की बात करना मुझे महत्त्वपूर्ण लगता है। उनकी कविताएँ याद दिलाती हैं कि प्रेम केवल भावनात्मक आवेग नहीं, बल्कि किसी दूसरे के जीवन के प्रति संवेदनशील होने की क्षमता भी है।

मुक्तेश्वर पराशर के काव्य का समग्र मूल्यांकन करते हुए मुझे उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि सामान्य जीवनानुभवों को स्मरणीय काव्य-पंक्तियों में रूपांतरित करने की क्षमता प्रतीत होती है। उनकी भाषा की संप्रेषणीयता, बिंबों की भावात्मक शक्ति, सांस्कृतिक संदर्भों की सहज उपस्थिति और गीतात्मक प्रवाह उन्हें एक विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं। उनकी रचनाओं में एक सजग और निरंतर संभावनाशील रचनाकार की उपस्थिति स्पष्ट अनुभव होती है।

मेरे लिए किसी कवि के प्रति अनुराग का अर्थ उसकी प्रत्येक पंक्ति से सहमत होना अथवा उसकी रचनाओं को आलोचना से परे मान लेना नहीं है। बल्कि उसकी सृजनात्मक उपलब्धियों को पहचानते हुए उसकी सीमाओं पर भी आत्मीयता से विचार कर सकना ही सच्चा साहित्यिक सम्मान है। मुक्तेश्वर पराशर की रचनाएँ मुझे यह अवसर देती हैं। उनके शब्द कभी सहमति जगाते हैं, कभी प्रश्न खड़े करते हैं और कभी किसी परिचित अनुभूति को बिल्कुल नए अर्थ में देखने के लिए प्रेरित करते हैं।

एक कवयित्री के रूप में मैं मानती हूँ कि किसी रचनाकार की वास्तविक सफलता केवल सुंदर लिखने में नहीं, बल्कि अपने पाठक की विचार-प्रक्रिया में रचनात्मक हस्तक्षेप कर पाने में है। इस दृष्टि से मुक्तेश्वर पराशर का लेखन मेरे लिए महत्त्वपूर्ण है। उनकी कविताओं से मेरा संबंध प्रशंसा के औपचारिक शब्दों का नहीं, बल्कि उस आत्मीय साहित्यिक संवाद का है जिसमें एक कवि दूसरे कवि के सृजन को पढ़ते हुए अपनी समझ का भी विस्तार करता है।

और मेरे लिए किसी प्रिय कवि को दिया जाने वाला सबसे सच्चा सम्मान यही है कि मैं उसकी रचनाओं को केवल सराहूँ नहीं, बल्कि उन्हें गंभीरता से पढ़ूँ, समझूँ और उन पर अपने स्वतंत्र विचार भी रख सकूँ।

आइये पढ़ते हैं उनकी कुछ रचनाएँ

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रचना — 1

समर्पन कर रहे हैं तो समर्पन ठीक से करिए

किसी भी देवता का आप पूजन ठीक से करिए।

किसी को छोड़िए तो मान लीजै मर गया है वो

शुरू जैसे भी करिए पर समापन ठीक से करिए।

न आने दीजिए घुसपैठियों को दिल में प्रियतम के

अगर रानी हैं तो फिर आप शासन ठीक से करिए।

कोई खाकर मरे, मर जाए कोई भूख के मारे

अगर मालिक बने हैं तो प्रबंधन ठीक से करिए।

मैं शायर हूँ, मैं कोई बात ऐंवीं बक नहीं देता

मैं जो कहता हूँ उस पर आप चिंतन ठीक से करिए।

बदन को क्या ज़रूरी है सुई की नोंक भर ढकना

प्रदर्शन कर रही हैं तो प्रदर्शन ठीक से करिए।

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रचना — 2

गीत भी उदास थे, छन्द बदहवास थे

रागिनी अधीर थी, राग बने दास थे

और हम ठगे-ठगे

रात दिन जगे-जगे

चाँद के लिए सदा, चकोर माँगते रहे

रात के चरन पकड़ के भोर माँगते रहे।

 

चाह थी कि हर कली को, तितलियों का प्यार दें

आँसुओं की पालकी को, आँख के कहार दें

हर झुकी-झुकी नज़र की, आरती उतार दें

पतझड़ों से हार चुके, बाग़ को बहार दें

किन्तु भाग्य में लिखा

है कौन जो मिटा सका

सिन्धु की लहर में स्वयं बूँद सा समा सका

किन्तु हम बुझे-बुझे

अश्रुबाण से बिंधे

सूख चुके नयन हेतु, लोर माँगते रहे

रात के चरन पकड़ के, भोर माँगते रहे।

 

इस धरा पे कौन है जो दर्द में पला नहीं

या किसी सुबह को साँझ-साँझ में ढला नहीं

कौन सूर्य है जो स्वयं अग्नि में जला नहीं

कौन है पथिक जो राह-राह में चला नहीं

देह, प्राण, चेतना

है विशुद्ध कल्पना

शूल के नगर-नगर में फूल की विवेचना

सत्य की तलाश में

सृजन में, विनाश में

शान्त प्राण-सिन्धु में हिलोर माँगते रहे

रात के चरन पकड़ के, भोर माँगते रहे।

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रचना — 3

 

पाणिग्रहण पीड़ा का करके

तुमको सुख के संग ब्याह दूँ

फिर जाकर मरघट पर तन का

मैं विधिवत अवसान करूँगा।

 

जीवन भर की तुम्हीं कमाई

तुम तन मेरा, मैं परछाई

जीवन तुमको अर्पित कर दूँ

जोड़ साँस की पाई-पाई

 

बरगद इस जीवन को करके

तुमको शीतल, सघन छाँह दूँ

तब जाकर मैं किसी गुफ़ा में

तन-मन को पाषाण करूँगा।

 

प्यासा मैं, गंगातट तुम हो

पंथी मैं, वंशीवट तुम हो

मैं विष से इक भरी सुराही

अमृत भरा स्वर्ण घट तुम हो

 

दुःख की बंजर धरती लेकर

सुख-सागर तुमको अथाह दूँ

फिर जाकर मैं बोधिवृक्ष की

पुण्य छाँव में ध्यान करूँगा।

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रचना — 4

 

जैसे किसी नदी को करे धार मुकम्मल

वैसे किया है प्यार ने संसार मुकम्मल।

गर हारते हैं आप तो भी जश्न मनाएँ

करती हरेक जीत को है हार मुकम्मल।

अक्सर हसीन लोग निकलते हैं फ़रेबी

करते हैं हर गुलाब ही को ख़ार मुकम्मल।

होता है हुस्न चाहने वालों से ही पूरा

चारागरों को करते हैं बीमार मुकम्मल।

इस पार वालों के लिए उस पार ख़ुशी है

उस पार वालों की ख़ुशी इस पार मुकम्मल।

करते अधूरा इश्क़ हैं सौ बार कई लोग

कुछ लोग एक शख़्स से सौ बार मुकम्मल।

केवल हवस से इश्क़ की गाड़ी न चलेगी

दौलत से होते हैं नहीं त्यौहार मुकम्मल।

प्यासों की वज़्ह ही से है दरिया की रवानी

गाहक से ही तो होते हैं बाज़ार मुकम्मल।

रिश्ते तमाम ज़िंदगी में होंगे ज़रूरी

करते हैं ज़िंदगी को मगर यार मुकम्मल।

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रचना — 5

 

परिंदे से कभी उसका गगन मत माँग लेना तुम

किसी नवजात सपने से नयन मत माँग लेना तुम।

हज़ारों तोड़कर रिश्ते तुम्हारे पास आए जो

उसीसे लौट जाने का वचन मत माँग लेना तुम।

लिखा हो आत्मा के पृष्ठ पर जिसने तुम्हारा नाम

उसी बेनाम लड़की से बदन मत माँग लेना तुम।

बरस चौदह जो लौटे काटकर वनवास जीवन का

पुनः उस आदमी से वन गमन मत माँग लेना तुम।

जलाती हो किसी की याद में दीया कोई जोगन

तो उस उम्मीद की लौ से किरन मत माँग लेना तुम।

भले कुछ माँग लेना पर किसी शापित अहिल्या से

कमलवत राम जी के द्वय चरन मत माँग लेना तुम।

हों बैठे भाप बनकर आँख के आकाश में बेबस

कभी उन आँसुओं से संघनन मत माँग लेना तुम।

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— मुक्तेश्वर पराशर

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1 टिप्पणियाँ

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  1. हमने मुक्तेश्वर पाराशर जी को अभी यहीं पहली बार पढ़ा पर रचनाओं तक पहुंचने से पहले ही तुम्हारे लिखे ने उन्हें पढ़ने की साध जगा दी थी।

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