व्यंग्यसामान्य

लाइक के लुटेरे और सहयोग के भगोड़े!

📅 October 12, 2026 ⏱ 17 मिनट ◉ 11 views 💬 0 comments

 

 

कहते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। यह परिभाषा उस ज़माने में गढ़ी गई थी, जब मनुष्य के पास समाज था, मोबाइल नहीं। तब लोग एक-दूसरे के घर जाकर हालचाल पूछते थे, दुःख में कंधा देते थे और सुख में मिठाई खाते थे। अब हालचाल पूछने से पहले लिंक भेजते हैं, दुःख में प्रेरणादायक वीडियो भेजते हैं और सुख में अपनी रील देखने का आग्रह करते हैं। पहले संबंधों में दिल मिलते थे, अब लिंक मिलते हैं। पहले लोग कहते थे, “कभी हमारे घर आइए।” अब कहते हैं, “कभी हमारे चैनल पर आइए।” और चैनल पर जाकर बिना लाइक किए लौट आए, तो समझिए आपने उनकी बैठक में चाय पीकर कप ही नहीं तोड़ा, बल्कि पुश्तैनी हवेली की इज़्ज़त भी मिट्टी में मिला दी।

 

मनुष्य ने पहिए से लेकर हवाई जहाज़ तक का आविष्कार किया, लेकिन उसके विकास की सबसे अद्भुत उपलब्धि वह अदृश्य घंटी है जिसे ‘नोटिफिकेशन’ कहते हैं। यह घंटी बजते ही कुछ लोगों में ऐसी आध्यात्मिक चेतना जाग उठती है कि वे अपनी रचना का प्रचार करने के लिए किसी भी समय, किसी भी व्यक्ति और किसी भी परिस्थिति में उपस्थित हो सकते हैं। हाँ, दूसरों की रचना सुनने के समय यही चेतना समाधि में चली जाती है। ऐसे लोग सामाजिक नहीं, ‘स्वप्रचारिक प्राणी’ हैं। प्राणिशास्त्रियों ने भले ही इन्हें अलग वर्ग में न रखा हो, लेकिन इनके सताए हुए मोबाइलधारकों ने इन्हें ‘लिंकचर’ की उपाधि अवश्य दे दी है।

 

इसी विकसित प्रजाति के एक गौरवशाली प्रतिनिधि थे श्री लिंकेश्वर लाल ‘प्रसारप्रिय’। नगर में उनका नाम अत्यंत सम्मान से लिया जाता था, हालाँकि सम्मान का अधिकांश भाग उन्होंने स्वयं ही अपने नाम के साथ जोड़ रखा था। वे कवि भी थे, विचारक भी, समाजसेवी भी, वीडियो निर्माता भी और अपने ही व्यक्तित्व के सबसे बड़े प्रशंसक भी। उनके अनुसार संसार में दो प्रकार के मनुष्य होते हैं—एक वे जो उनकी रचनाएँ देखते हैं और दूसरे वे जो अभी तक देख नहीं पाए हैं। तीसरी किसी श्रेणी का अस्तित्व उनके चिंतन में नहीं था।

 

लिंकेश्वर लाल जी का दिन सूर्योदय से नहीं, लिंक उदय से आरंभ होता था। प्रातः पाँच बजकर उनसठ मिनट पर, जब सूर्य भी क्षितिज पर आने की तैयारी कर रहा होता, उनका संदेश सौ-दो सौ मोबाइलों में प्रवेश कर चुका होता—”सुप्रभात! आज की मेरी अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रस्तुति। पूरा देखिए, लाइक कीजिए, शेयर कीजिए, कमेंट कीजिए, चैनल सब्सक्राइब कीजिए और घंटी अवश्य दबाइए।”

 

कभी-कभी लगता था कि इनके संदेश को पढ़ने के बाद केवल एक वाक्य की कमी रह जाती है—”आदेश का पालन न करने पर आपके सामाजिक चरित्र का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा।”

 

लिंकेश्वर जी का एक सिद्धांत था कि कला की सफलता का मूल्यांकन उसकी गुणवत्ता से नहीं, उसके नीचे दिखाई देने वाले अंकों से किया जाना चाहिए। कविता में भाव हों या न हों, विचार में गहराई हो या न हो, लेकिन लाइक की संख्या कम नहीं होनी चाहिए। वे बड़े गर्व से कहते थे, “आज मेरी कविता पर पाँच सौ लाइक आए हैं!”

 

किसी ने संकोच से पूछ लिया, “कविता किस विषय पर थी?”

 

वे तनिक चौंके, फिर बोले, “विषय तो बहुत गहरा था, लेकिन आप यह देखिए कि पाँच सौ लोगों ने पसंद किया!”

 

वस्तुतः उनकी दृष्टि में कविता वह सीढ़ी थी जिस पर चढ़कर लाइक की छत तक पहुँचा जा सके। सीढ़ी की मज़बूती से अधिक छत पर जमा भीड़ का महत्त्व था।

 

उनके परम मित्र थे श्री वाहवाहनंद टिप्पणीकर। ये ऐसे विलक्षण साहित्यसेवी थे जिनके शब्दकोश में अधिकांश रचनाओं के लिए केवल चार शब्द सुरक्षित थे—’अद्भुत’, ‘अप्रतिम’, ‘अविस्मरणीय’ और ‘कालजयी’। रचना चाहे बालक की पहली तुकबंदी हो या किसी कवि की पचासवीं असफल ग़ज़ल, वाहवाहनंद जी के यहाँ सब कालजयी थीं। अंतर केवल इतना था कि अपनी रचनाओं पर इन्हीं चार शब्दों के साथ वे कम से कम तीन अनुच्छेदों की समीक्षा भी चाहते थे।

 

लिंकेश्वर जी और वाहवाहनंद जी की मित्रता बड़ी आदर्श थी। लिंकेश्वर जी की पोस्ट पर वाहवाहनंद जी लिखते, “आपकी लेखनी ने साहित्य को नई दिशा दी है।” और वाहवाहनंद जी की पोस्ट पर लिंकेश्वर जी टिप्पणी करते, “आप जैसे साहित्यकार सदियों में जन्म लेते हैं।”

 

इस पारस्परिक प्रशंसा के बीच साहित्य बेचारा किस दिशा में जा रहा था, इसकी चिंता दोनों में से किसी को नहीं थी। संभवतः साहित्य भी चुपचाप किसी कोने में बैठा सोचता होगा कि जिन दो महापुरुषों ने उसे नई दिशा दे दी है, उनसे पूछ तो लिया जाए कि जाना कहाँ है!

 

इस मंडली में एक तीसरे सज्जन भी थे—श्री चुप्पेश्वर प्रसाद ‘कलदर्शी’। उनका उपनाम ही उनके व्यक्तित्व का परिचय था। किसी ने कोई रचना भेजी तो उत्तर मिलता, “कल अवश्य देखूँगा।” किसी ने कार्यक्रम में आमंत्रित किया तो बोले, “कल बताऊँगा।” किसी ने सहयोग माँगा तो आश्वासन मिला, “कल बात करते हैं।” उनके जीवन में ‘कल’ इतना शक्तिशाली था कि ‘आज’ बेचारा वर्षों से नौकरी की तलाश में भटक रहा था।

 

चुप्पेश्वर जी ने अपने मोबाइल में दूसरों के संदेश न देखने की कला को ऐसी ऊँचाई तक पहुँचा दिया था कि नीले निशान भी शर्मिंदा हो जाते थे। संदेश पढ़कर उत्तर न देने में उन्हें वही संतोष प्राप्त होता था जो किसी योगी को मौनव्रत से मिलता है। हाँ, अपनी नई पोस्ट प्रकाशित होते ही उनका मौन टूट जाता और वे पूरी मित्रमंडली को सूचना देते—”प्रियजनों! मेरी नई रचना पर आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है।”

 

यह प्रतीक्षा भी बड़ी एकतरफ़ा थी। दूसरों की प्रतीक्षा उनके लिए धैर्य की परीक्षा थी और अपनी प्रतीक्षा दूसरों के लिए नैतिक दायित्व।

 

नगर में शरद स्नेही नामक एक अपेक्षाकृत शांत लेखक भी रहते थे। वे अधिक प्रचार नहीं करते थे। रचनाएँ लिखते, दूसरों को पढ़ते और जहाँ कुछ अच्छा लगता, खुले मन से सराहते। लिंकेश्वर जी की अनेक कविताओं पर उन्होंने गंभीर टिप्पणियाँ लिखी थीं। वाहवाहनंद जी के पुस्तक-विमोचन में भी उपस्थित हुए थे और चुप्पेश्वर जी के कार्यक्रम में श्रोताओं की कमी देखकर देर तक बैठे रहे थे। एक दिन उन्होंने अपनी एक कहानी इन तीनों को भेजी। साथ में केवल इतना लिखा, “समय मिले तो पढ़कर अपनी राय अवश्य दीजिएगा।”

 

यह संदेश उनके सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी भूल सिद्ध हुआ।

 

लिंकेश्वर जी ने संदेश देखा और उसी क्षण ऐसी व्यस्तता के शिकार हो गए जिसका कारण चिकित्सा विज्ञान आज तक नहीं खोज पाया है। वाहवाहनंद जी ने कहानी खोले बिना लिख दिया, “आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं!” चुप्पेश्वर जी ने अपनी परंपरा का निर्वाह करते हुए कहा, “कल अवश्य पढ़ूँगा।”

 

तीन दिन बीते। शरद जी की कहानी वहीं पड़ी रही, लेकिन इस बीच लिंकेश्वर जी के चार वीडियो, वाहवाहनंद जी की तीन कविताएँ और चुप्पेश्वर जी के सात प्रेरक संदेश सभी के मोबाइलों पर पहुँच चुके थे।

 

एक सप्ताह बाद शरद जी ने सहज भाव से पूछा, “कहानी पढ़ने का अवसर मिला?”

 

लिंकेश्वर जी बोले, “अरे भाई! समय कहाँ है? साहित्य साधना में इतना व्यस्त हूँ कि साँस लेने की फुरसत नहीं।”

 

उस समय उनके मोबाइल की स्क्रीन पर उनकी नई पोस्ट चमक रही थी—”दोस्तों! आज का मेरा पाँचवाँ वीडियो। अवश्य देखें!”

 

शरद जी मुस्कुरा दिए। उन्हें समझ में आ गया कि व्यस्तता का यह रोग बड़ा चयनात्मक है। अपनी रचनाओं के प्रचार से इसका कोई संबंध नहीं, केवल दूसरों की रचनाओं के संपर्क में आने से यह अचानक सक्रिय हो उठता है।

 

इस प्रजाति की एक और अद्भुत विशेषता थी। अपनी पोस्ट पर प्रतिक्रिया न मिलने पर ये सीधे भावनात्मक न्यायालय पहुँच जाते थे। “आप आजकल नाराज़ हैं क्या?” “हमसे कोई भूल हो गई?” “इतनी उपेक्षा की आशा नहीं थी!” मानो किसी का वीडियो न देखना मित्रता के संविधान की धारा 420 के अंतर्गत दंडनीय अपराध हो।

 

लेकिन जब कोई इनसे सहयोग की अपेक्षा करता, तो ये तत्काल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महान समर्थक बन जाते। तब घोषणा होती, “हर व्यक्ति की अपनी व्यस्तताएँ होती हैं। किसी पर लाइक या कमेंट का दबाव नहीं डालना चाहिए।”

 

कितना अद्भुत सिद्धांत था! अपने लिए अपेक्षा अधिकार और दूसरे के लिए अपेक्षा अत्याचार। अपने प्रचार में आग्रह और दूसरों के आग्रह में मानसिक उत्पीड़न। सचमुच, कुछ लोगों ने नैतिकता को ऐसा लचीला वस्त्र बना लिया है जिसे सुविधा के अनुसार फैलाया या सिकोड़ लिया जाता है।

 

धीरे-धीरे इन तीनों की ख्याति नगर की साहित्यिक मंडलियों में फैलने लगी। कवि सम्मेलनों में जब कोई दूसरा कवि अपनी रचना पढ़ता, तो लिंकेश्वर जी मोबाइल में व्यस्त रहते, वाहवाहनंद जी अपनी अगली कविता के शब्द ठीक करते और चुप्पेश्वर जी किसी अज्ञात व्यक्ति से फोन पर अत्यंत आवश्यक बातचीत में लगे रहते। लेकिन अपनी बारी आते ही तीनों श्रोताओं से एकाग्रता की अपेक्षा करते।

 

एक दिन लिंकेश्वर जी मंच पर पहुँचे और बोले, “कविता सुनना साधना है। आजकल लोगों में सुनने का संस्कार समाप्त हो रहा है।”

 

इतना कहकर उन्होंने सामने बैठे एक युवक को घूरा, जो मोबाइल देख रहा था।

 

युवक ने संकोच से मोबाइल बंद कर दिया। पीछे बैठे एक वृद्ध कवि ने धीरे से बगल वाले से कहा, “अभी आधा घंटा पहले जब दूसरे कवि कविता पढ़ रहे थे, तब यही महापुरुष तीन लोगों को अपनी रील भेज रहे थे।”

 

बगल वाले ने उत्तर दिया, “भाई साहब! साधना की भी अलग-अलग श्रेणियाँ होती हैं। दूसरों को सुनना तपस्या है और स्वयं को सुनवाना सिद्धि!”

 

दोनों मुस्कुराए और सामने चल रही कविता की महानता स्वीकार करते हुए तालियाँ बजाने लगे।

 

नगर की साहित्यिक गतिविधियों में एक और रोचक परिवर्तन दिखाई देने लगा था। अब कुछ लोग कवि सम्मेलन में कविता सुनाने से अधिक अपनी तस्वीर खिंचवाने जाते थे। मंच पर पहुँचते ही सबसे पहले कैमरे की दिशा देखते, फिर माइक की ऊँचाई ठीक करते और उसके बाद कविता की पहली पंक्ति याद करने का प्रयास करते। आयोजक चाहे जितना कहे कि समय सीमित है, वे भूमिका में ही अपने जीवन का आधा इतिहास सुना देते। किंतु दूसरे कवि की प्रस्तुति लंबी हो जाए तो घड़ी देखने लगते। मंच पर अपनी कविता के लिए अनंतकाल और दूसरे की कविता के लिए पाँच मिनट भी अतिरिक्त नहीं!

 

इन्हीं दिनों वाहवाहनंद जी को एक सम्मान प्राप्त हुआ। उन्होंने सम्मान की तस्वीरें इतने ग्रुपों में भेजीं कि कुछ लोगों को भ्रम हो गया कि देश में कोई बड़ा राष्ट्रीय उत्सव मनाया जा रहा है। उन्होंने अपने सभी परिचितों से आग्रह किया कि इस गौरवपूर्ण उपलब्धि पर बधाई अवश्य दें। शरद जी ने भी हार्दिक शुभकामना भेजी।

 

कुछ सप्ताह बाद शरद जी की एक पुस्तक प्रकाशित हुई। उन्होंने पुस्तक के मुखपृष्ठ की तस्वीर साझा की। लिंकेश्वर जी मौन रहे। वाहवाहनंद जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। चुप्पेश्वर जी ने संदेश पढ़कर अपने प्रसिद्ध ‘कल’ के हवाले कर दिया।

 

हाँ, दो दिन बाद वाहवाहनंद जी ने एक लंबी पोस्ट अवश्य लिखी—”आज साहित्य जगत में ईर्ष्या और असहयोग का वातावरण अत्यंत चिंताजनक हो गया है। हमें एक-दूसरे को आगे बढ़ाना चाहिए।”

 

उस पोस्ट पर लिंकेश्वर जी ने टिप्पणी की, “आपने बिल्कुल सत्य कहा। ऐसे उदात्त विचार आज दुर्लभ हैं।”

 

चुप्पेश्वर जी ने भी लिखा, “अद्भुत चिंतन!”

 

जिस समाज में तीन व्यक्ति मिलकर एक-दूसरे के स्वार्थ को सिद्धांत घोषित कर दें, वहाँ चौथे व्यक्ति की संवेदनशीलता प्रायः अकेली पड़ जाती है।

 

कुछ समय बाद नगर में एक भव्य आयोजन की घोषणा हुई—’राष्ट्रीय पारस्परिक सहयोग एवं साहित्यिक सद्भाव महासम्मेलन’। इस आयोजन की संकल्पना लिंकेश्वर जी ने की थी। वाहवाहनंद जी को स्वागताध्यक्ष और चुप्पेश्वर जी को आयोजन सचिव बनाया गया। उद्देश्य था समाज में बढ़ती आत्मकेंद्रित प्रवृत्ति पर चिंतन करना तथा रचनाकारों के बीच परस्पर सहयोग की भावना विकसित करना।

 

निमंत्रण-पत्र अत्यंत आकर्षक था। उसमें लिखा था, “आइए, दूसरों को सुनने और सराहने की विलुप्त होती संस्कृति को पुनर्जीवित करें।”

 

आयोजन की तैयारी प्रारंभ हुई। पोस्टर बने, बैनर छपे, वीडियो संदेश रिकॉर्ड किए गए और सोशल मीडिया पर प्रचार अभियान चल पड़ा। लिंकेश्वर जी ने स्वयं निमंत्रण का लिंक कम से कम पचास ग्रुपों में साझा किया। वाहवाहनंद जी ने आयोजन को ‘साहित्यिक पुनर्जागरण का ऐतिहासिक क्षण’ बताया और चुप्पेश्वर जी ने आश्वासन दिया कि वे सभी व्यवस्थाएँ कल तक पूरी कर देंगे।

 

कार्यक्रम के एक दिन पहले आयोजकों ने एक विशेष नियम घोषित कर दिया—सम्मेलन में प्रत्येक वक्ता को अपनी रचना सुनाने से पहले किसी दूसरे रचनाकार की रचना सुनकर उस पर दो मिनट की सार्थक टिप्पणी करनी होगी।

 

बस, यहीं से साहित्यिक जगत में हलचल मच गई।

 

एक कवि ने पूछा, “दूसरे की कविता पूरी सुनना आवश्यक है क्या?”

 

उत्तर मिला, “जी हाँ।”

 

दूसरे ने पूछा, “टिप्पणी केवल ‘वाह! अद्भुत!’ कहकर पूरी की जा सकती है?”

 

बताया गया, “नहीं, रचना के विषय पर कुछ कहना होगा।”

 

तीसरे ने आशंका व्यक्त की, “यदि दूसरे की रचना समझ में ही न आए तो?”

 

आयोजक बोले, “तब ध्यान से सुनना होगा।”

 

यह सुनते ही अनेक रचनाकारों की तबीयत बिगड़ने लगी। किसी को पुराना ज्वर याद आ गया, किसी की अचानक रेलयात्रा निश्चित हो गई और कुछ लोगों के घर ऐसे अनिवार्य कार्य निकल आए जिनकी सूचना शायद उनके घरवालों को भी नहीं थी।

 

लिंकेश्वर जी भी चिंतित हो उठे। उन्होंने कहा, “यह नियम उचित नहीं है। इतने बड़े साहित्यकारों से दूसरों की रचना सुनने की अपेक्षा करना उनकी रचनात्मक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप है।”

 

वाहवाहनंद जी ने समर्थन किया, “सही कहा! हम अपनी कविता सुनाने आएँगे या दूसरों की परीक्षा लेने?”

 

चुप्पेश्वर जी ने समाधान प्रस्तुत किया, “इस नियम पर कल विचार कर लेंगे।”

 

आख़िरकार आयोजन समिति ने सर्वसम्मति से नियम हटा दिया। निर्णय हुआ कि हर व्यक्ति अपनी प्रस्तुति देगा, शेष उपस्थित लोग सुनेंगे।

 

लेकिन समस्या यह थी कि उपस्थित लोग भी अपनी ही प्रस्तुति देने आए थे।

 

नियत दिन सभागार सज गया। मंच पर पुष्पगुच्छ रखे गए, पीछे विशाल बैनर लगाया गया और अतिथियों के लिए मखमली कुर्सियों की व्यवस्था की गई। कार्यक्रम शुरू होने से पहले सभी ने मंच पर खड़े होकर तस्वीरें खिंचवाईं। किसी ने फेसबुक पर लिखा, “एक ऐतिहासिक साहित्यिक आयोजन में सहभागिता।” किसी ने इंस्टाग्राम पर रील डाल दी। किसी ने व्हाट्सऐप स्टेटस लगाया, “साहित्य सेवा ही जीवन का ध्येय है।”

 

लेकिन कार्यक्रम प्रारंभ होते ही विचित्र दृश्य उपस्थित हुआ। प्रथम वक्ता मंच पर पहुँचा तो दूसरे वक्ता बाहर चाय पीने चले गए। दूसरा वक्ता आया तो तीसरे ने आवश्यक फोन कॉल का बहाना बना लिया। तीसरे की बारी आई तो चौथा किसी परिचित से मिलने बाहर निकल गया। सभी अपनी प्रस्तुति के समय सभागार में उपस्थित होते और दूसरे की प्रस्तुति शुरू होते ही किसी अदृश्य राष्ट्रीय कर्तव्य के निर्वाह में जुट जाते।

 

कार्यक्रम के बीच आयोजक ने देखा कि मंच पर कवि अधिक हैं और सामने श्रोता कम। कुछ देर बाद स्थिति और गंभीर हो गई। मंच पर बैठे सात साहित्यकारों के सामने केवल चार श्रोता रह गए, जिनमें एक ध्वनि-व्यवस्था सँभालने वाला कर्मचारी था, दूसरा फोटोग्राफर, तीसरा सभागार का चौकीदार और चौथा एक ऐसा व्यक्ति जो किसी दूसरे कार्यक्रम की तलाश में भूल से वहाँ आ गया था।

 

लिंकेश्वर जी ने माइक सँभाला और गंभीर स्वर में कहा, “आज समाज में सुनने की संस्कृति समाप्त होती जा रही है। लोग दूसरों के लिए समय नहीं निकालना चाहते।”

 

फोटोग्राफर ने कैमरा नीचे रखकर पूछा, “साहब, आप लोगों ने एक-दूसरे की कविता सुनी?”

 

प्रश्न छोटा था, लेकिन सभागार में ऐसी चुप्पी छा गई जैसे किसी कठिन परीक्षा में सबसे सरल प्रश्न ही पाठ्यक्रम से बाहर निकल आया हो।

 

वाहवाहनंद जी ने विषय बदलते हुए कहा, “यह हमारे समाज का व्यापक संकट है।”

 

चौकीदार ने धीरे से जोड़ा, “संकट समाज का होगा साहब, पर शुरुआत तो यहीं से हुई लगती है।”

 

मंच पर बैठे विद्वान एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। पहली बार किसी साधारण चौकीदार ने उनकी विद्वत्ता को ऐसी कसौटी पर रख दिया था जिसका उत्तर किसी साहित्यिक शब्दकोश में उपलब्ध नहीं था।

 

उसी समय सभागार के द्वार पर शरद स्नेही दिखाई दिए। वे कार्यक्रम समाप्त होने से कुछ पहले पहुँचे थे। आयोजकों ने उन्हें देखकर राहत की साँस ली। लिंकेश्वर जी तुरंत बोले, “आइए शरद जी! देखिए, आजकल लोग साहित्य के लिए समय ही नहीं निकालते। हमें कितनी मेहनत करनी पड़ती है!”

 

शरद जी ने मंच की ओर देखा, फिर सामने की खाली कुर्सियों को। कुछ क्षण मौन रहने के बाद बोले, “मेहनत तो निश्चित ही बहुत हुई है। बस, एक काम रह गया।”

 

“कौन-सा?” तीनों ने लगभग एक साथ पूछा।

 

शरद जी मुस्कुराए, “जिन लोगों को आप यहाँ बुलाकर अपनी बात सुनाना चाहते थे, कभी उनकी बात भी सुन लेते। संभव है, आज ये कुर्सियाँ इतनी खाली न होतीं।”

 

शब्द साधारण थे, किंतु उनमें वह धार थी जो व्यंग्य को प्रभावशाली बनाती है। जिस सत्य को समझाने के लिए पूरा महासम्मेलन आयोजित किया गया था, वह बिना माइक, बिना मंच और बिना किसी प्रस्ताव के सामने आ खड़ा हुआ था।

 

लिंकेश्वर जी को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने उत्तर दिया, “आप समस्या को बहुत व्यक्तिगत बना रहे हैं। हमारा उद्देश्य व्यापक सामाजिक सुधार है।”

 

शरद जी ने सहजता से कहा, “सामाजिक सुधार का रास्ता व्यक्ति के व्यवहार से होकर ही जाता है। जो अपने सामने बैठे मनुष्य को नहीं सुन सकता, वह पूरे समाज को सुनने की शिक्षा कैसे देगा?”

 

कुछ क्षण के लिए तीनों के चेहरे गंभीर हो गए। ऐसा लगा मानो आत्ममंथन का कोई दुर्लभ अवसर उपस्थित हुआ है। परंतु आत्ममंथन भी एक कठिन प्रक्रिया है। उसमें अपने भीतर उतरना पड़ता है, जबकि दूसरों को उपदेश देने के लिए केवल मंच पर चढ़ना पर्याप्त होता है।

 

कार्यक्रम समाप्त हुआ। सभी आयोजक घर लौटे। अगले दिन नगर के साहित्यिक ग्रुपों में एक नया वीडियो दिखाई दिया। शीर्षक था—’समाज में बढ़ती संवेदनहीनता और साहित्यकारों की उपेक्षा’। वीडियो में लिंकेश्वर जी अत्यंत मार्मिक स्वर में बता रहे थे कि किस प्रकार आज के लोग दूसरों के परिश्रम का सम्मान नहीं करते। वाहवाहनंद जी ने नीचे टिप्पणी की, “आपने समाज की दुखती रग पर हाथ रख दिया।” चुप्पेश्वर जी ने लिखा, “अद्भुत! कालजयी चिंतन!”

 

शरद जी ने वीडियो देखा और मुस्कुरा दिए। उन्हें मालूम था कि इस बार भी तीनों ने एक-दूसरे की बात नहीं समझी है, केवल अपनी-अपनी प्रशंसा का हिसाब बराबर किया है।

 

वास्तव में सोशल मीडिया ने मनुष्य को नया स्वभाव नहीं दिया, केवल उसके पुराने स्वभाव को नया मंच दे दिया है। जो व्यक्ति पहले बैठक में दूसरों की बात काटता था, अब ऑनलाइन दूसरों के संदेश अनदेखे करता है। जो पहले स्वयं को सबसे महत्त्वपूर्ण समझता था, अब अपने लाइक और फॉलोअर गिनकर उस भ्रम को प्रमाणित करता है। तकनीक ने उसके हाथ में कैमरा, माइक और मंच तीनों दे दिए, लेकिन कानों के सही उपयोग का प्रशिक्षण आज भी अधूरा है।

 

यहाँ प्रश्न किसी की रचना का प्रचार करने का नहीं है। लेखक चाहता है कि उसे पढ़ा जाए, कवि चाहता है कि उसे सुना जाए, कलाकार चाहता है कि उसकी कला लोगों तक पहुँचे। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं। अनुचित तब है जब व्यक्ति अपने लिए प्रोत्साहन को अधिकार मान ले और दूसरे को प्रोत्साहित करने को एहसान। जब अपनी हर छोटी उपलब्धि पर सार्वजनिक उत्सव चाहिए, लेकिन दूसरे की बड़ी सफलता पर भी एक सच्ची बधाई देना भारी लगने लगे। जब अपनी रचना पर सौ टिप्पणियाँ कम पड़ें, लेकिन दूसरे की रचना पढ़ने के लिए दो मिनट भी न निकलें।

 

यह भी आवश्यक नहीं कि हर मित्र हर पोस्ट पढ़े या हर वीडियो देखे। मनुष्य के पास समय, रुचि और ऊर्जा की सीमाएँ होती हैं। सच्चे संबंध लाइक की गिनती से नहीं मापे जाते। लेकिन जब अपेक्षाओं और व्यवहार के दो अलग-अलग मापदंड बना दिए जाएँ, तो संबंध धीरे-धीरे आत्मीयता खोकर उपयोगिता का सौदा बन जाते हैं।

 

कुछ लोगों ने तो मित्रता को ऐसा व्यापार बना लिया है जिसमें पूँजी दूसरे की, प्रचार अपना और लाभ का पूरा अधिकार सुरक्षित रहता है। इन्हें मित्र नहीं, प्रशंसकों की स्थायी समिति चाहिए। ऐसी समिति जिसके सदस्यों का कर्तव्य है कि वे हर उपलब्धि पर बधाई दें, हर कार्यक्रम में पहुँचें और हर नई पोस्ट पर प्रतिक्रिया दें, लेकिन अपने किसी निजी अनुरोध से समिति के अध्यक्ष को परेशान न करें।

 

दुनिया में ऐसे लोगों के लिए शायद सबसे उपयुक्त आविष्कार एक स्वचालित ताली बजाने वाली मशीन ही होगी। उसमें न संवेदनाएँ होंगी, न अपनी कोई रचना, न कोई अपेक्षा। बटन दबाते ही तालियाँ बजने लगेंगी। अपनी कविता सुनाइए, अपना भाषण दीजिए, अपनी उपलब्धियाँ गिनाइए और मनचाही वाहवाही प्राप्त कर लीजिए। न किसी को सुनने की बाध्यता, न किसी को प्रोत्साहित करने का संकट।

 

लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में एक छोटी-सी आशंका भी है। कहीं भविष्य में वह मशीन भी विकसित होकर यह न कह बैठे, “महोदय! वर्षों से आपकी हर प्रस्तुति पर तालियाँ बजा रही हूँ। आज मेरी नई रिकॉर्डिंग पर आप भी दो शब्द कह दीजिए।”

 

तब संभवतः उत्तर मिलेगा, “अभी बहुत व्यस्त हूँ। कल अवश्य सुनूँगा!”

 

और इसके कुछ ही क्षण बाद फेसबुक पर एक गंभीर पोस्ट प्रकाशित होगी—”आजकल मशीनों में भी निःस्वार्थ सेवा और समर्पण की भावना समाप्त होती जा रही है। मानवता का भविष्य संकट में है।”

 

नीचे लिखा होगा—”इस महत्त्वपूर्ण विचार से सहमत हों तो लाइक, शेयर, कमेंट और सब्सक्राइब अवश्य करें!”

 

संभव है उस पोस्ट पर लिंकेश्वर लाल जी सबसे पहले टिप्पणी करें—”आपके विचारों ने आत्मा को झकझोर दिया!”

 

वाहवाहनंद जी लिखें—”अप्रतिम! कालजयी चिंतन!”

 

और चुप्पेश्वर जी घोषणा करें—”बाक़ी टिप्पणियाँ कल पढ़ूँगा!”

 

इस दृश्य की कल्पना करके व्यंग्य भी बेचारा अपना माथा पीट लेगा। उसे लगेगा कि वह वर्षों से मनुष्य की कमज़ोरियों पर कटाक्ष करता रहा, लेकिन अब मनुष्य ने उसकी नौकरी ही छीन ली है। जहाँ व्यवहार स्वयं इतना हास्यास्पद हो जाए, वहाँ व्यंग्यकार को कल्पना करने की आवश्यकता ही क्या रह जाती है?

आख़िरकार, आत्ममुग्धता की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसे संसार में हर ओर स्वार्थ दिखाई देता है, केवल अपने भीतर नहीं। वह चाहती है कि उसके लिए हर दरवाज़ा खुले, लेकिन अपने दरवाज़े पर दूसरों की दस्तक सुनते ही कुंडी चढ़ा देती है।

ऐसे लोगों को शायद यह समझना चाहिए कि तालियाँ बजवाने के लिए भीड़ जुटाई जा सकती है, लेकिन संबंध निभाने के लिए मनुष्य बनना पड़ता है।**

और जिन्हें केवल अपनी ही आवाज़ सुनने का शौक़ हो, वे मित्रों की सूची लंबी करने के बजाय एक अच्छा-सा आईना खरीद लें।

कम से कम वहाँ सामने खड़ा व्यक्ति उनकी बात बीच में नहीं काटेगा, कोई अपेक्षा नहीं रखेगा और हर बार उन्हीं की ओर देखता रहेगा।

हाँ, एक दिन आईना सच दिखाने लगा, तो संभव है वे उसे भी ब्लॉक कर दें!

 

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स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता 

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