रचनासामान्य
ड्रिल मशीन

प्रेम
एक ड्रिल मशीन !!
जो बड़ी सफ़ाई से करती है सुराख़
तुम्हारे अहंकार की
ठोस कंक्रीट की परत में
इसी सुराख से
साफ़ नज़र आने लगती है
तुम्हारे जज़्बात की गीली मिट्टी
और तुम्हारी संवेदनाओं के उड़ते बादल !!!
इसी सुराख से सुनायी पड़ने लगती हैं
तुम्हारे लहजे में घुलीं
हल्की बारिश की आवाज़ें !!!
प्रेम का
ये ज़रा सा सुराख़
धीरे-धीरे बाहर ले आता है
तुम्हारे भीतर का
पूरा चौमासा !!!
बढने लगती है
तुम्हारे चेहरे की आर्द्रता
झरने लगती हैं तुम्हारे बदन से
बालू गिट्टी और मौरंग की सूखी परतें !!
तुम्हें पता भी नहीं चलता
और तुम
एक मुलायम मिट्टी के
देह पिंड में तब्दील हो जाते हो !!
सीमेंट की सलेटी ज़मीन पर
एक बसंत उगाने की
पूरी तकनीक जानती है
ये प्रेम की छोटी सी
ड्रिल मशीन !!!!
संध्या सिंह





