अभिलाषा
अभिलाषावाणी मनीष जैनमुझे क्या चाहना,
क्या पाना शेष—
जब मेरे पास तू ही विशेष।
प्रातः में तू, संध्या में तू,
हर कृत्य में तू, हर नृत्य में तू।
पलकें खोलूँ—तो दृश्य में तू,
पलकें मूँदूँ—तो हृदय में तू।
श्वास चले तो नाम तेरा,
जब मौन रहे तो ध्यान तेरा,
मेरी धड़कन की हर थाप में
जैसे हो कोई गान तेरा।
धूप छुए तो स्पर्श तेरा,
छाँव बने तो छाँव भी तू,
जिस राह चलूँ, जिस ओर मुड़ूँ,
हर दिशा और हर गाँव भी तू।
दुख आया—तो धैर्य तू ही,
सुख आया—तो विनय भी तू,
नैनों में जो सावन घिर आया
उस नीर की हर एक बूंद भी तू।
मैंने तुझको खोजा बाहर,
मंदिर में, दीप, प्रार्थना में,
तू मुस्काया—“मैं तो बैठा
तेरे अपने ही अंतर्मन में।”
फिर जाना—तू दूर नहीं था,
दूर तो मेरी दृष्टि रही,
मैं ही अपने बीच खड़ी थी,
इसीलिए यह दूरी रही।
अब न तुझसे कुछ माँगूँ मैं,
न अपनी कोई चाह रहे,
बस इतना हो—जब ‘मैं’ सिमटूँ,
हर ओर तेरा आभास रहे।
न मैं रहूँ, न मेरा कोई,
न तेरा-मेरा भेद रहे,
बूँद मिले सागर में जैसे,
बूंद,बूँद फिर कहाँ रहे?
मुझे मुक्ति भी क्यों लेनी
मुझे स्वर्ग से क्या लेना—
तेरे होने की अनुभूति ही है
सब कुछ पा लेना।
यही एक अभिलाषा मेरी
स्वीकार उसे तुम कर लेना
मेरे उर के आसन में ,तुम
अपना सिंहासन कर लेना।
अंतिम श्वास जब छूटे तन से,
“वाणी” मौन जो हो जाए,
‘मैं’ का दीपक बुझते-बुझते
तेरे प्रकाश में खो जाए।
तेरे प्रकाश में खो जाए।
मुझे क्या चाहना,
क्या पाना शेष—
जब मेरे भीतर तू ही विशेष।।
— वाणी मनीष जैन
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मैं का दीपक बुझते बुझते
वाह वाह वाह वाह