गीतसामान्य

स्वीकार

📅 October 5, 2026 ⏱ 1 मिनट ◉ 29 views 💬 1 comments

प्रीत की उलझी हुई है डोर तुमसे

पूछती भीगे नयन की कोर तुमसे

शून्य भीतर ले. रहा आकर है

सब तुम्हारे नाम पर स्वीकार है

 

तुम नहीं तो इस जहां में कुछ नही, एहसास है

तन निरर्थक चल रहा है मन तुम्हारे पास है

बिन तुम्हारे आयु की रेखा भी एक व्याधा हुई

गीत गाती है विरह के ज़िंदगी राधा हुई

 

प्रेम का तो बस यही आधार है

सब तुम्हारे नाम पर स्वीकार है

 

 

 

प्रेम क्या है ये कभी तुमको नहीं समझा सका

वेदना के गीतकी जो पीर को न गा सका

प्रेम के अंतिम क्षणों में हो रहा है कीर्तन

देह का जो आत्मा से हो रहा अंतिम मिलन

 

वेदना का बस यही तो सार है

सब तुम्हारे नाम पर स्वीकार है

 

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1 टिप्पणियाँ

सभी पाठकों और रचनाकारों की सार्वजनिक प्रतिक्रियाएँ

  1. Swadha Ravindra

    अद्भुत लिखते हो बेटा

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