फ़िल्म समीक्षा ‘पार ‘
फ़िल्म समीक्षा ‘पार ‘पवन कुमार
Director:Gautam Ghosh
Script Writer:Partha Banerjee
Starring:Shabana Azmi,Naseeruddin Shah,Om Puri,Utpal Dutt
‘अपुष्ट सी ख़बर है कि आपने अपने फ़िल्म-फेयर अवार्ड को अपने घर के टॉयलेट के हैंडल की जगह लगा रखा है,क्या यह सच है?अगर यह सच है तो इस सच को जन्म देने वाला कारक क्या है?’
नसीर साहब से मिलते ही जिज्ञासा से पगा यह सवाल दागने का मंसूबा था मेरा..मैं उनसे मिला भी पर शूटिंग की विकट व्यस्तता ने मुझे इस क़दर उलझाए रखा कि मैं उनसे यह सवाल पूछना भूल गया।फिर इत्तिफ़ाक़न कुछ दिन पहले मैंने उनकी फ़िल्म ‘पार’ देख ली।फिर देखी इसे मिलने वाली पुरस्कारों की फ़ेहरिस्त।इस बाकमाल फ़िल्म को अवार्ड्स तो मिले थे पर फ़िल्म की ख़ूबसूरती और प्रभावोत्पादकता के हिसाब से कम,बेहद कम जबकि होना यह चाहिए था कि यह फ़िल्म भारतीय न्यूवेव सिनेमा का अग्रदूत बन कर दुनिया के हर प्रतिष्ठित मंच पर कीर्ति-पताका फहराती।ऐसी अन्यायपरक परिस्थितियों ने ही शायद नसीर साहब के मन में अवार्ड्स को लेकर उदासीनता और उचाटपन पैदा किया होगा।‘पार’ एक अद्भुत फ़िल्म है। इसे किसी भी कालजयी फ़िल्म से टकरा दीजिए यह उन्नीस नहीं बैठेगी पर फिर भी यह बैठी है गुमनामी के गोशे में कहीं दुबकी।विश्व की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में इसकी कहीं कोई चर्चा नहीं,आख़िर क्यों?वो इसलिए क्योंकि यहाँ के अन्यमनस्क तंत्र ने इसपर और इस जैसी कई अद्भुत फ़िल्मों पर उपेक्षा का कम्बल डाल रखा है।ये फ़िल्में किसी को नज़र आतीं ही नहीं।आप कहेंगे फ़िल्म ‘पार’ को नेशनल अवार्ड मिला तो,तो नेशनल अवार्ड तो फ़िल्म मणिकर्णिका को भी मिला…….सियासत के पाले,सत्ता की ताल पर थिरकते इस अवार्ड से फ़िल्म के क़द्द-ओ-क़ामत का सच्चा परिमापन नहीं किया जा सकता।
क्या कभी इस फ़िल्म पर फ़िल्म के किसी प्रीमियर इंस्टिट्यूट में केसस्टडी के तौर पर वैचारिक मंथन हुआ?
क्या किसी टेबलॉयड,किसी पत्रिका ने इसका मुनासिब नक़्द-ओ-तब्सिरा किया?कहाँ सो रही थीं द हिन्दू,नवभारत टाइम्स,फ़िल्म फेयर,स्टारडस्ट,स्क्रीन जैसी समाज की आँख और कान बनने का दम्भ भरने वाली पत्र-पत्रिकाएं जब लो बजट में बनी यह फ़िल्म अपने अंदर इतने सारे विस्मयकारी तत्त्व लेकर आयी थी?
क्या इस फ़िल्म को टैक्स रिबेट मिला?
क्यों नहीं सरकार ने ऑस्कर जैसे अभिविश्रुत मंच के लिए इस बेहतरीन फ़िल्म की पैरोकारी की?
सच तो यह है कि इस सड़े-गले तंत्र में कला को परखने वाली दीदावर आँखें हैं ही कहाँ।यहाँ ऑस्कर के लिये सरकार द्वारा’जीन्स’,’एकलव्य’ जैसी अतिसाधारण फ़िल्मों को बैकअप किया जाता है।यहाँ सियासी हित साधने वाली फ़िल्मों को कोने कोने तक पहुँचाने के लिये सरकार द्वारा पूरी ताक़त झोंक दी जाती है पर ‘पार’ जैसी मानवीय-मूल्यों की दरबानी करने वाली फ़िल्म की कोई आबयारी नहीं करता।कोई नहीं डालता इसकी जड़ों में परवाह की खाद?अगर डालता तो यह इकहरा बिरवा हरेभरे छतनार दरख़्त में तब्दील हो गया होता।आज दुनिया जान रही होती कि भारत भी वर्ल्डक्लास फ़िल्में बनाने का माद्दा रखता है।हमारे यहाँ न अच्छी फ़िल्मों को प्रोत्साहित करने का चलन है,न ही अच्छी फ़िल्में बनाने के उपक्रम को मौद्रिक या मनोवैज्ञानिक सम्बल देने का चलन है।जबकि विदेशों में फिल्ममेकर्स सरकारी अनुदान के बूते बॉक्सऑफिस के दुष्चक्रीय बाड़े से बाहर निकलकर साहसिक व अन्वेषणात्मक फ़िल्में बनाते हैं जो अपनी मारक तासीर के ज़रिये समाज की कुंद हो रही सोच पर पुरज़ोर चोट करती रहती हैं,लोगों की जड़ होती विचारशीलता को सही दिशा में हाँकती रहती हैं।आपमें से जिसने यह फ़िल्म नहीं देखी होगी मन ही मन सोच रहे होंगे कि इस फ़िल्म में आख़िर ऐसी क्या जाज़िब बातें हैं जो मैं इसकी क़सीदानिगारी कर रहा हूँ।जवाब है इस फ़िल्म का हैरानी की हद तक ईमानदार होना।कसावयुक्त स्क्रीनप्ले से लैस इस फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर और फिल्माकंन भी उस दौर के हिसाब से जदीदियत भरा है।इस फ़िल्म के हर एक एक्टर ने अपने किरदार के साथ भरपूर न्याय किया है।इस फ़िल्म में काव्यात्मकता है,लाह-लास्य है और है इंसानी हस्सास को जगाने की भरपूर क़ुव्वत। कथा पक्ष की बात करें तो बिहार के मुंगेर के एक भुच देहाती गांव की पृष्ठभूमि वाली इस फ़िल्म की कथा बस इतनी है कि जातिगत द्वेष की प्रचंड आग से जलते उस महशर-बदोश दहर में अग्रजन्मों द्वारा दलितों का नरमेध हुआ है।काल सुवर्णों का दास बनकर दलितों के रूप में एक एक कर अपना ग्रास चुन रहा है।गाँव में जीना,जीते रहना दुष्कर है अतएव एक दलित नौरंगिया अपनी गर्भवती बीबी रमा के साथ अपनी जान बचाने के लिए कलकत्ता पलायन कर जाता है।वह पलायन करता है गांव की उस पढ़ी लिखी औरत की मदद से जिसके पति की कलम तमस-तंत्र के ख़िलाफ़ एहतिजाज की आवाज़ बुलंद करती रही।तमस तंत्र ऐसे लोगों को बख़्शता नहीं…मर गया वह कलम का सरहंग ,मर गया उसका विरोध।अपने हक़ की दिहाड़ी माँगने वाला मज़दूर नौरंगिया भी मर जाता अगर जो वह कलकत्ता न भाग जाता।पर बेचारे का कलकत्ता जाना भी एक नरक से भागकर दूसरे नरक जाने सरीखा साबित हुआ।पूंजीवाद,गाँव में भी इनके सूखे ठठ्ठर वजूद को अपने लालच की अंगीठी में झोंक अपनी रोटियां सेंकना चाह रहा था और यहाँ कलकत्ते में भी वह यही कर रहा है।फ़र्क़ सिर्फ़ सलीके का है।वहाँ मुंगेर में शोषण का शऊर गंवई है और यहाँ कलकत्ता में शोषण का तरीका शहरी।मुंगेर में अभिजातों द्वारा किया गया शोषण दलितों को,ग़रीबों को खेत-खलिहानों में दफ़नाता था….कलकत्ता में अभिजातों द्वारा किया गया शोषण मन्कूबों को पथरीली सड़क के निर्मोही सीने पर पटक पटक कर मारता है…न सड़क तो इन ग़रीबों को लीलने के लिए उफनती हुगली नदी है न।‘पार’ पूंजीवाद की इसी विशाल वैतरणी को पार कर जीवन की नैया किनारे लगाने की दो दलितों की क़वायदों की कथा है।इस कथा की पृष्ठभूमि रहे मुंगेर से मेरा मौरूसी सरोकार रहा है।यह मेरा ननिहाल है।इसी सांस्कृतिक पट्टी जिसमें बेगूसराय, खगरिया,पूर्णिया जैसी जगहें भी शामिल हैं,में अपने किशोरवय में मैं यहाँ और यहाँ के समीपवर्ती इलाके के गनक्लचर का शाहिद हुआ करता था।यहीं बचपन में गन से पहला साक्षात्कार हुआ था मेरा,जब ननिहाल में चावल की ढेरी में पकाए जा रहे शरीफे(sugar-apple) को खंगालने के प्रयास में मेरा हाथ गन निकाल लाया था।आज भी चार-पांच सौ रुपये में बिकने वाला मुंगेरी कट्टा इस इलाके का परिचयपत्र हुआ करता है।यहाँ ऐसे माहिर लोग हैं जो स्मिथ एंड वेसेन,वेबले स्कॉट से लेकर ऐ.के.फोर्टी सेवन का भी ज़ेरॉक्स मार देते हैं।यहाँ के लोगों में यह हुनर उनके पुरखों से आया है जो अंग्रेज़ों के ज़माने में क्रियाशील रही यहाँ की आयुध फैक्ट्री में अंग्रेज़ों के लिए असलहा बनाया करते थे।आज़ादी के बाद इस फैक्ट्री के कई यूनिट्स में ताले लग गये,पर वही ताले रोज़गार गंवाए लोगों के पेट पर न लग सके।भूख पूरी तुर्शी के साथ जब चिंघाड़ने लगी तो इस आयुध फैक्ट्री के बेरोज़गार हुए कारिन्दे और उनसे हथियार बनाने का हुनर सीख चुके उनके बच्चे पैसे के लिये अवैध हथियार बनाने लगे जो वहाँ के जातिगत खूनी संग्रामों और चुनावों में धड़ाधड़ खपने लगे।धीरे धीरे बंदूक के बूते अपनी जड़ें जमाने वाला ज़ोर-ज़बर तंत्र अपने पांव पसारता गया और लीलता गया इलाके की शांति,लोगों के हक़,हुकूक।इस इलाके के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो एक तरह से ग़रीबों, मन्कूबों को लूटने वाला यह ज़ोर-जबर तंत्र ग़रीबों के ही कोख से ही जन्मा है।यह फ़िल्म मुंगेर का नाम ओढ़ इस कारक की ओर भी हल्के से इशारा कर जाती है।कहानी की तहों में छिपे मेटाफर्स(रूपक) कला फ़िल्मों की ख़ासियत होते हैं।अगर आपको उन छिपे मेटाफर्स को पहचानना नहीं आता तो आप कहानी को पूरी समग्रता में कभी समझ नहीं पाएंगे।आप समझ नहीं पाएंगे कि इस फ़िल्म में एक तरफ़ केरोसिन तेल की तंगी से जूझता दलित नौरंगिया का परिवार है जो रात में अपनी लालटेन को जल्दी बुझा कर आने वाली रात के लिए रोशनी बचाकर रखना चाहता है तो दूसरी तरफ़ ज़मींदार हरिसिंह है जो पेट्रोल पीने वाली अपनी बुलेट को स्टार्ट छोड़कर,बुलेट से उतरकर पेशाब की हाजत-रवाई कर रहा है,बग़ैर कोई व्यग्रता दिखाए,धीरे धीरे।उधर एक ग़रीब के घर में लालटेन जल्दी बुझाई गयी क्योंकि लालटेन में केरोसिन नहीं गरीब का लहू जल रहा था…इधर बुलेट चालू रही क्योंकि उसमें ठाकुर का पेट्रोल नहीं ग़रीब का लहू जल रहा था।‘पार’ सीने में ऐसी ही नश्तर-फ़रोश बातों को धीरे से पहुँचाकर दिल को दरकाने वाली अपनी ख़ासियत के लिये विशिष्ट है।यही फ़िल्म सामान्य भी है अगर आपको ‘रिडिंग बिटवीन द लाइन्स’ करना नहीं आता।इस फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह और शबाना आज़मी को शोषित,दमित दलित नौरंगिया और रमा के रूप में देखकर ऐसा लगता है मानो इस भूमिका का न्यायपूर्ण निर्वहन करने के लिये दोनों ने ख़ुद को सालों से दुख में मैरीनेट करके रखा हो….मानो दोनों ने भूख से अपने जिस्म का मांस नोचवाया हो।मानो पर्दे पर नसीर ,शबाना नहीं हड्डी ठठरी की दो निशक्त काया घिसटती हुई अपने जीने की मियाद पूरी कर रही है,जिन्हें अपने ज़िंदा होने का पता बस तभी चलता है जब उनके पेट की आग खदबदाती है।यह फ़िल्म देखने के बाद मेरे मन में जो त्वरित ख़्याल सबसे पहले आया वह यह कि मैं वक़्त की पगडंडी पर उल्टे पाँव जाता रहूँ अपने अतीत में,और अपनी इस भूतगामी यात्रा में मिलने वाले हर उस दलित,दमित लोगों से लिपट कर रोऊँ जो मेरे मन के अंदर नहीं,बल्कि मन के कगार पर बैठे थे,चुक-मुक,हाथ जोड़े,सर झुकाए,डरे सहमें से।मैं चाहता हूँ उनसे माफ़ी माँगना,अपने उस जातिगत रुआब के लिये जिसके सामने पड़ते ही वे लोग केंचुए सा सिकुड़ जाया करते थे।मैं उनसे उनके निस्तेज,मरुनाक चेहरे के लिए माफ़ी माँगना चाहता हूँ…सदियों से महकूमी कर कर के,दूसरों की अपवर्जित विष्ठा के कनस्तरों को उठा उठा कर झुक गयी उनकी पीठ के लिये माफ़ी माँगना चाहता हूँ।मैं उनसे माफ़ी माँगना चाहता हूँ,इस बात के लिए कि फेयर एंड लवली को जीवन की अपरिहार्यता के रूप में पृष्ठांकित करने वाले इस उपभोक्तावादी युग में क्यों नहीं अभी तक फेयरनेस की एक ऐसी क्रीम बन सकी है जो ग़रीबी की तल्ख़ धूप से स्याह हो चुके दलितों के चहरे को भी थोड़ी शफ़्फ़ाफ़ी,थोड़ा नूर दे सके।
क्यों अब भी दलित अपने पीड़ा-आरूढ़, मलिन मुख के कारण लोगों की भीड़ में दूर से पहचाने जाते हैं?
क्यों मेरी पॉश बिल्डिंग का ज़मादर मेरे साथ लिफ़्ट में नहीं आता जाता।वह ऊपर अपने इच्छित तल्ले तक जाने के लिए इंतज़ार करता है लिफ़्ट के पूरी तरह से खाली होने का।उसके इंतज़ार के दौरान कोई और कुलीन अगर आ जाता है तो वह उसके साथ भी नहीं जाता,वह इंतज़ार करता रहता है।
क्यों दलितों के शारिरिक विन्यास में अब भी पुराने वर्णवादी दिनों वाली भीरूता है??
क्यों वे अब भी मुसहर कहलाते हैं जिनकी भूख को अब भी दूध,अनाज नहीं बल्कि सूखी,परती ज़मीन पर गुह बनाकर रहने वाले मूषक/मूसा(चूहा) मयस्सर हैं।फ़िल्म पार का मुख्य पात्र नौरंगिया(नसीरुद्दीन शाह)भी मुसहर है।इस फ़िल्म में एक दृश्य है जिसमें भूख से विवह्ल नौरंगिया और रमा को अपने पेट के अंदर भूख के खदबदाते जरासीम को मारने के लिए छत्तीस सुअरों को उफनती नदी पार कराने के जानलेवा काम के लिए हामी भरनी पड़ती है।यह काम वाक़ई बेहद जानलेवा है तभी तो काम देने वाला यह क़यास लगाता है कि छत्तीस सुअरों में से एक गाभिन(pregnant) सुअर उफनती नदी पार नहीं कर पायेगी।अनभिज्ञता में उसने अपने क़यास में आधी सच्चाई ही बयान की है।दरअसल दो गाभिन सुअरें वह नदी पार कर रही हैं, एक कीचड़ से लिथड़ी,दूसरी भूख से लिथड़ी(रमा)।समाज की नज़र में सुअर और दलित में ज़्यादा भेद कहाँ है।येन-केन-प्रकारेण नौरंगिया और रमा उस दिन अकूत जलराशि वाली नदी तो पार कर जाते हैं पर अकूत विसंगतियों से भरे भावी जीवन के अनगिन दिन वे कैसे पार करेंगे।
कहानी के इस मरहले तक फ़िल्म का टाइटल ‘पार’ सिर्फ़ टाइटल नहीं बल्कि हमें शर्मसार करने वाला,हमसे ही पूछा गया एक अनुत्तरित सा सवाल बन जाता है।इस हाड़तोड़ मेहनत के बाद जब नौरंगिया और रमा अपने चिथड़न के बिस्तर पर गिरते हैं तो रमा को महसूस होता है कि उसके गर्भस्थ बच्चे में उसकी जान को आश्वस्त करता कोई स्पंदन नहीं।वह घबराई हुई अपने पति नौरंगिया को पेट से कान लगाकर गर्भस्थ जीवन की सुगबुगाहट सुनने को कहती है।चिंतातुर नौरंगिया रमा के गर्भ से कान लगाता है,उसे सुनाई देती है,महानगर की चिल्ल-पौं जहाँ उसकी और उसकी गाभिन बीबी की क्षुधातुर चीखें हर दिन डूबती रही हैं।नौरंगिया को सुनाई देता है कलकत्ता के उन मिलों का सायरन जहाँ नौरंगिया और उसकी रोटी की उम्मीद हर रोज़ खारिज़ होती रही है।नौरंगिया को सुनाई देती है,अपने बच्चे की धड़कन की आवाज़ नहीं,बल्कि उन सुअरों की चीख जिनपर आज नौरंगिया,नौरंगिया की बीबी और नौरंगिया के होने वाले बच्चे का अस्तित्व टिका था,या शायद आगे भी टिका रहेगा।गर्भ में जीवन का कोई साक्ष्य नहीं।नौरंगिया निराश हो रहा है,रमा उससे भी ज़्यादा निराश।अचानक नौरंगिया उम्मीद से चहक उठता है,जब उसे अपने गर्भस्थ बच्चे का स्पंदन सुनाई पड़ता है।
‘ज़िंदा है ,ज़िंदा है’
कहानी के इस पड़ाव पर नौरंगिया जब ऐसा कहता है तो मेरा मन करता है उससे यह पूछने को कि
‘कब तक नौरंगिया कब तक,इस दलित विरोधी दुनिया में, तेरा बच्चा कब तक ज़िंदा रहेगा?’
वाक़ई आख़िर कब तक ग़रीब नौरंगिया का ग़रीब बच्चा जातिगत और व्यस्थागत विसंगतियों के विशाल पहाड़ के सामने ज़िंदा रहेगा।अगर वह किसी तरह ज़िंदा रहा तो निश्चय ही वह अपने बाप जैसा बड़े सब्र वाला होगा जो कह रहा होगा ईश्वर से~
ईश्वर हमें बचाने तुम आराम से आना,
अब हम नरक के अभ्यस्त हो गये हैं;
हमारे नंगे बदन अब पूस का पाला सह लेते हैं,
निर्मम जेठ अब हमारे बेसाये तन से पसीना नहीं निचोड़ पाता,
क़िल्लत की ज़मींदारी को अब हम अपने आँसूओं का लगान नहीं देते,
भूख को हमारी अंतड़ियों में दुबकना आ गया है,
अपमान अब हमारी आत्मा में ज़रर नहीं पैदा करता,
पीठ अब हमारे बच्चों की लाशें ढ़ो लेती हैं;
ईश्वर हमें बचाने तुम आराम से आना,
अब हम नरक के अभ्यस्त हो गये हैं।
-पवन कुमार
शब्दार्थ:
अभिविश्रुत:मशहूर
महशर-बदोश:प्रलयकारी
नश्तर-फ़रोश:चुभने वाला




