धार्मिक / आध्यात्मिक रचनासामान्य

शारदा-स्तुति

📅 October 23, 2026 ⏱ 2 मिनट ◉ 15 views 💬 2 comments

शुभ-मङ्गल फल-दायिनी, सकल-सुमङ्गल-कार।

करुणा-मयी प्रकाश से, मन का पटल निखार।।

 

जय, जय जय शुभ ज्ञान-प्रदाता!

जयतु क्षेमकरी मृदु माता!

ब्रह्मचारिणी, दु:ख-भञ्जन-कर,

जगदम्बे, जग-जननी, अघ-हर।।

 

तम-विदार, हे मातु, दयानिधि!

करिए कृपा कृपालु-कृपानिधि।

भव-बाधा अरु भय-हारी हो,

सदा-सर्वदा सुख-कारी हो।।

 

नित्य-सुवसना, वरदा-सुखदा,

महाभगा-वाणी, तुम भद्रा।

सिद्धिप्रदा, अविकारी देवी,

देवत्रयी हैं तुम्हरे सेवी।।

 

वाग्प्रदा, श्रीप्रदा, वरप्रदा,

शीलध्वजा, पद्मजा, पंकजा।

कलाधार, ब्राह्मी, चिरज्ञाता,

तुम विद्या जगती विख्याता।।

 

सर्वस्तुता, अजित-घनमाया,

सर्व-आत्मिका, उज्जवल काया।

ब्रह्माणी, बहुभुजा, बुद्धिदा,

गिरा, भारती, दिव्या, करदा।।

 

आद्या, इला, निधात्री, भगवती,

महाशक्ति, रससार, सरस्वती।

वन्द्या, कामप्रदा, कमलासन,

शुक्लधाम माँ, पद्मविलोचन!

 

चित्राङ्गदा, चित्त-चिदम्बर,

हे करबाहु, महाकर अक्षर!

विज्ञानी, विमला, गायत्री,

महातेज, तीव्रा, सावित्री।।

 

शास्त्ररूपिणी, पूरित, त्रिगुणा,

अमियमूर्ति, मिटवहु जगतृष्णा।

सुरवन्दित, पूजित, स्वरराशी,

ब्रह्म-प्रेरणा तुम अविनाशी।।

 

शिव-अनुजा, सतलोक-विहारिणी,

कृपा करो माँ, शील-प्रसारिणी!

वृहद्हस्त, हंसासन बैठी,

सन्तन की जिह्वा पर पैठी।।

 

अमला, अतुला, शुद्धिदायिनी,

दिव्यकला माँ, वीणावादिनी!

शीतलवदन, छटा द्युतिकारी,

पुण्यवान छवि अति मनोहारी।।

 

श्वेत कमल दल आसन सोहे,

शीश किरीट दिव्य जन मोहे।

कर शोभित स्फटिक की माला,

ज्योति-स्वरूपा, नयन विशाला।।

 

निर्मल धवल वसन धरती हो,

जीवों में जीवन भरती हो।

भाग्य जगाओ अभयप्रदानी!

युक्ति-मुक्ति प्रतिफल की दानी!

 

स्नेह-सुधा का पान करा दो,

मातेश्वरी, ममत्व बरसा दो।

एकाकार जगत को कर दो,

प्रेम-भाव हर उर में भर दो।।

 

ब्रह्मरूपिणी, ब्रह्म-समाना,

वेदमयी आनन्द-निधाना!

जड़ता हरती विनय सिखाती,

अहंकार को दूर भगाती।।

 

कल्याणी, कल्याण करो अब,

मन-मन्दिर में आन बसो अब।

तव महिमा का पार न पाया,

मातु हमें दो अपनी छाया।।

 

शङ्खनाद हो नवाचार का,

तथा सूर्य हो सदाचार का।

भटकावे में भटक रहे हम,

मोह-जाल में अटक रहे हम।।

 

स्वर्णाभा ढल गयी रजत में,

भाव-शून्यता बढ़ी जगत में।

छल-प्रपञ्च का बढ़ा अन्धेरा,

सद्-विचार दो, करो सवेरा।।

 

सर्प-दृष्टि में फँसा हुआ मन,

गरुड़-दृष्टि दो, काटो बन्धन।

मानवता का तेज प्रखर हो,

मानव को मानव हितकर हो।।

 

सत्-प्रकाश से मानस भर दो,

सद्-विकास का हमको वर दो।

तव चरणों में पड़े अकिञ्चन,

किस विधि करें तुम्हारा सुमिरन?

 

महाशक्ति, देवी जगदम्बा,

शरण राखि कीजै अनुकम्पा।

श्रद्धा-सुमन समर्पित तुमको,

अब तो आ दर्शन दो हमको।।

 

वर दो माता वरप्रदे, कर दो अब उद्धार।

कर जोड़े हम नत सदा, विनय करो स्वीकार।।

✍️ सुमन मिश्रा

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2 टिप्पणियाँ

सभी पाठकों और रचनाकारों की सार्वजनिक प्रतिक्रियाएँ

  1. माँ जगदम्बा से सद्विचार, सदाचार और मानवता के कल्याण की सुन्दर प्रार्थना। विशेषकर “सर्प-दृष्टि में फँसा हुआ मन, गरुड़-दृष्टि दो, काटो बन्धन” में प्रभावशाली प्रतीकात्मकता है।
    हार्दिक शुभकामनाएँ
    हरि ॐ 🌹

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