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📘 विधा समझाने वाला लेख

आइए, दोहा लिखना सीखें

दो पंक्तियाँ। चार चरण। कुल अड़तालीस मात्राएँ। सुनने में दोहे की रचना इतनी-सी लगती है। पर इन दो पंक्तियों में ऐसी बात कहना, जो सुनने वाले के मन में ठहर जाए, कवि से धैर्य और शब्दों की गहरी समझ माँगता है।

कबीर ने दोहे में मनुष्य से प्रश्न किए, रहीम ने संबंधों की कोमलता दिखाई और बिहारी ने छोटे-से दृश्य में कई अर्थ भर दिए। दोहे की यही शक्ति है: वह विस्तार से नहीं, सार से बात करता है।

दोहा छंद क्या है?

दोहा एक अर्धसम मात्रिक छंद है। उसकी दो पंक्तियों में चार चरण होते हैं। पहले और तीसरे चरण में तेरह-तेरह मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। इस प्रकार एक दोहे में कुल अड़तालीस मात्राएँ होती हैं।

मात्राएँ गिनते समय शब्द को बोलकर सुनना आवश्यक है। लिखा हुआ रूप और बोला हुआ रूप कभी-कभी अलग प्रभाव देते हैं। दोहे में गणना के साथ स्वाभाविक लय भी बनी रहनी चाहिए।

दोहों के विषय और उनके छंदगत प्रकार

नीति, भक्ति, प्रेम और विरह दोहे के विषय हैं। इनसे पता चलता है कि कवि किस अनुभव पर लिख रहा है। भ्रमर, सुभ्रमर, शरभ और मण्डूक जैसे नाम दोहे के छंदगत भेद हैं। ये पूरे दोहे में गुरु और लघु वर्णों की संख्या के आधार पर निर्धारित होते हैं।

गुरु वर्ण का भार दो मात्राएँ और लघु वर्ण का भार एक मात्रा होता है। उदाहरण के लिए, भ्रमर दोहे में बाईस गुरु और चार लघु वर्ण होते हैं। इनका कुल मात्रा-भार अड़तालीस होता है। सुभ्रमर में इक्कीस गुरु और छह लघु वर्ण होते हैं। गुरु और लघु का अनुपात बदलता है, लेकिन दोहे की कुल मात्राएँ और प्रत्येक चरण का निर्धारित भार बना रहता है।

दोहा छंद के तेईस परंपरागत भेद

परंपरागत सूची में दोहे के भेद इस प्रकार बताए जाते हैं:

भ्रमर दोहे में बाईस गुरु और चार लघु वर्ण होते हैं।

सुभ्रमर या भ्रामर दोहे में इक्कीस गुरु और छह लघु वर्ण होते हैं।

शरभ दोहे में बीस गुरु और आठ लघु वर्ण होते हैं।

श्येन दोहे में उन्नीस गुरु और दस लघु वर्ण होते हैं।

मण्डूक दोहे में अठारह गुरु और बारह लघु वर्ण होते हैं।

मर्कट दोहे में सत्रह गुरु और चौदह लघु वर्ण होते हैं।

करभ दोहे में सोलह गुरु और सोलह लघु वर्ण होते हैं।

नर दोहे में पंद्रह गुरु और अठारह लघु वर्ण होते हैं।

हंस दोहे में चौदह गुरु और बीस लघु वर्ण होते हैं।

गयंद दोहे में तेरह गुरु और बाईस लघु वर्ण होते हैं।

पयोधर दोहे में बारह गुरु और चौबीस लघु वर्ण होते हैं।

बल दोहे में ग्यारह गुरु और छब्बीस लघु वर्ण होते हैं।

पान दोहे में दस गुरु और अट्ठाईस लघु वर्ण होते हैं।

त्रिकल दोहे में नौ गुरु और तीस लघु वर्ण होते हैं।

कच्छप दोहे में आठ गुरु और बत्तीस लघु वर्ण होते हैं।

मच्छ दोहे में सात गुरु और चौंतीस लघु वर्ण होते हैं।

शार्दूल दोहे में छह गुरु और छत्तीस लघु वर्ण होते हैं।

अहिवर दोहे में पाँच गुरु और अड़तीस लघु वर्ण होते हैं।

व्याल दोहे में चार गुरु और चालीस लघु वर्ण होते हैं।

विडाल दोहे में तीन गुरु और बयालीस लघु वर्ण होते हैं।

श्वान दोहे में दो गुरु और चवालीस लघु वर्ण होते हैं।

उदर दोहे में एक गुरु और छियालीस लघु वर्ण बताए जाते हैं।

सर्प दोहे में सभी अड़तालीस वर्ण लघु बताए जाते हैं।

यह सूची गुरु और लघु के अनुपात को समझने में सहायक है। फिर भी किसी रचना को केवल पूरे दोहे की अड़तालीस मात्राएँ गिनकर किसी भेद का नाम नहीं देना चाहिए। उसके चारों चरणों को अलग-अलग जाँचना भी आवश्यक है।

उदर और सर्प भेदों को लेकर छंद-अध्येताओं में मतभेद है। कुछ विद्वान इन्हें परंपरागत गणना में तो रखते हैं, लेकिन प्रचलित चरणांत के नियमों के अनुसार इनके शुद्ध उदाहरण स्वीकार नहीं करते। इसलिए इन दोनों को पढ़ते समय विशेष सावधानी उचित है।

भ्रमर दोहे में कविता कैसे जन्म लेती है?

भ्रमर दोहे में बाईस गुरु और चार लघु वर्णों का विधान है। कवि श्रीधर प्रसाद द्विवेदी ने इसके उदाहरण में शिव और पार्वती के विवाह से जुड़ा लोकदृश्य लिया है। उनकी पंक्ति “गौरी भोले नाथ की, उल्टी जोड़ी देख” पढ़ते ही एक चित्र आँखों के सामने आता है।

कवि की सफलता केवल निर्धारित वर्ण गिन लेने में नहीं है। वह छंद के भीतर ऐसा दृश्य रचता है जिसे पाठक महसूस कर सके। यही कारण है कि दोहा पहले कविता बनकर मन तक पहुँचता है; उसकी गणना बाद में दिखाई देती है।

दोहों के विभिन्न भेदों के उदाहरण कवि जगदीश ‘हीरा’ साहू और श्रीधर प्रसाद द्विवेदी की प्रकाशित रचनाओं में भी मिलते हैं। उन उदाहरणों को पढ़ते समय रचना की भाषा और उसके स्थानीय उच्चारण का ध्यान रखना चाहिए।

अपना पहला दोहा कैसे लिखें?

पहले कोई ऐसा अनुभव चुनिए जो सचमुच आपके भीतर ठहरा हो। वह माँ की कही हुई बात हो सकती है, टूटती मित्रता का दुख, गाँव की स्मृति या अपने ही व्यवहार पर उठता कोई प्रश्न।

फिर उस अनुभव के लिए एक दृश्य खोजिए। संबंध के लिए धागा, प्रतीक्षा के लिए बुझता दीपक या अधूरी बात के लिए आधी पढ़ी चिट्ठी काम आ सकती है। दृश्य पाठक को बात के करीब लाता है।

अब दो पंक्तियाँ लिखिए। पहली पंक्ति में स्थिति या चित्र रखिए। दूसरी में उस चित्र से निकलने वाला विचार खोलिए। लिखने के बाद चारों चरणों की मात्राएँ जाँचिए: तेरह, ग्यारह, तेरह, ग्यारह। फिर दोहे को ऊँचे स्वर में पढ़िए। जहाँ बोलते हुए रुकावट आए, वहाँ शब्द और लय दोबारा परखिए।

यदि आप किसी विशेष भेद में दोहा लिखना चाहती हैं, तो अंत में पूरे दोहे के गुरु और लघु वर्णों की संख्या भी जाँचें। छंद की शुद्धता अभ्यास से आती है; दोहे का प्रभाव अनुभव की सच्चाई से।

दोहा छोटा अवश्य है, पर उसका संसार छोटा नहीं। कभी वह प्रश्न बनकर सामने खड़ा होता है, कभी किसी पुरानी स्मृति की तरह साथ चलता है। अच्छा दोहा समाप्त होने के बाद भी पाठक के भीतर अपनी बात कहता रहता है।

लेखक का निवेदन

यह लेख दोहा-विधा के मेरे अब तक के अध्ययन और समझ पर आधारित है। मैं यह दावा नहीं करती कि मुझे इस विधा का पूर्ण ज्ञान है। छंद-विधान, उदाहरणों या उनकी व्याख्या में कोई त्रुटि रह गई हो तो विद्वज्जन और गुणी पाठक कृपया टिप्पणी के माध्यम से अपने विचार और सुधार साझा करें। आपका मार्गदर्शन इस लेख को अधिक शुद्ध और उपयोगी बनाने में सहायता करेगा।

स्वधा रविंद्र ‘उत्कर्षिता’

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