शहर घायल है, भाषा अभी जीवित है

शहर घायल है, भाषा अभी जीवित है
गीतांजलि श्री की रचनाओं और ‘हमारा शहर उस बरस’ के नए अंतरराष्ट्रीय पड़ाव पर एक साहित्यिक दृष्टि
लेखिका : स्वधा रवींद्र उत्कृष्ट
किसी शहर को हम कब तक अपना शहर कह पाते हैं? जब तक उसमें हमारा घर है, हमारी स्मृतियाँ हैं, हमारे परिचित रास्ते हैं? या तब तक, जब तक वहाँ किसी दूसरे मनुष्य को देखकर हमें उसकी पहचान पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ती?
गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘हमारा शहर उस बरस’ के बारे में सोचते हुए मेरे भीतर यही प्रश्न उठता है। शीर्षक का पहला शब्द—‘हमारा’—अपने आप में कितनी बड़ी आश्वस्ति है। इसमें साझा जीवन का भरोसा है। लेकिन उसके साथ जुड़ा ‘उस बरस’ जैसे किसी ऐसी स्मृति की ओर संकेत करता है, जिसके बाद बहुत कुछ पहले जैसा नहीं रहा होगा। शहर भौगोलिक रूप से वहीं रह सकता है; उसे अपना कहने का विश्वास बदल सकता है।
इस उपन्यास का डेज़ी रॉकवेल द्वारा किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद ‘Our City That Year’ वर्ष 2026 के वारविक पुरस्कार की दीर्घसूची में शामिल हुआ है। आधिकारिक सूची में बारह भाषाओं से अनूदित तेरह पुस्तकें हैं। संक्षिप्त सूची 26 अक्टूबर और विजेता की घोषणा 16 नवंबर को होनी है। अभी यह चयन का समाचार है, अंतिम पुरस्कार का नहीं। फिर भी हिंदी के साहित्यिक जीवन में इसके स्वागत के पर्याप्त कारण हैं।
मुझे इस समाचार का सबसे सुंदर पक्ष यह लगता है कि 1998 में हिंदी में प्रकाशित एक उपन्यास नए पाठकों तक पहुँच रहा है। हमारे यहाँ अक्सर किसी पुस्तक की चर्चा उसके प्रकाशन के आसपास सिमट जाती है। फिर दूसरी पुस्तकें, दूसरे आयोजन और दूसरे समाचार उसे पीछे कर देते हैं। अनुवाद किसी रचना के लिए समय का दूसरा द्वार खोल सकता है। ‘हमारा शहर उस बरस’ की यह यात्रा उसी संभावना की याद दिलाती है।
शहर में सबसे पहले क्या टूटता है?
सांप्रदायिक तनाव से घिरे शहर की कथा को पढ़ने की मेरी रुचि केवल घटनाओं में नहीं होगी। मैं उन छोटे परिवर्तनों की ओर देखना चाहूँगी जो किसी बड़ी हिंसा से पहले रोज़मर्रा के जीवन में आने लगते हैं। किसी परिचित के घर जाने में झिझक, किसी नाम को सुनकर बदलता चेहरा, किसी बातचीत में अचानक उतर आया संदेह—ये भी सामाजिक इतिहास का हिस्सा हैं।
‘हमारा शहर उस बरस’ के प्रकाशकीय परिचय में विभाजित समाज और संकटग्रस्त शहर की दुनिया सामने आती है। मुझे लगता है, ऐसी कथा की आवश्यकता इसलिए बनी रहती है कि समाचार हमें घटनाओं की सूचना दे देते हैं, पर उन घटनाओं के बीच जीते मनुष्य की भीतरी अवस्था तक पहुँचने के लिए साहित्य चाहिए।
एक शहर अनेक तरह की स्मृतियों से बनता है। किसी के लिए वह बचपन की गली है, किसी के लिए रोज़गार का ठिकाना, किसी के लिए विस्थापन के बाद मिली शरण। जब उस शहर में भय फैलता है, तो हर व्यक्ति एक ही तरह से घायल नहीं होता। किसी का घर जाता है, किसी का संबंध, किसी का विश्वास। साहित्य इन अलग-अलग चोटों को उनके नाम और चेहरे वापस देता है।
यही कारण है कि मैं इस उपन्यास के अंतरराष्ट्रीय चयन को केवल सम्मान की सूची में बढ़ी हुई एक प्रविष्टि की तरह नहीं देखती। यह उन प्रश्नों की ओर लौटने का अवसर है, जिन्हें हमारा समय टालता भी है और बार-बार हमारे सामने रख भी देता है।
‘माई’ और माँ को समझने का हमारा अधूरा दावा
गीतांजलि श्री की रचनाओं पर विचार करते हुए ‘माई’ की ओर जाना स्वाभाविक है। यह उनका पहला उपन्यास है। उत्तर भारतीय संयुक्त परिवार के भीतर माँ, बच्चों और पीढ़ियों के संबंध इसकी दुनिया बनाते हैं। प्रकाशक के परिचय में एक महत्त्वपूर्ण बात आती है—माँ को मुक्त कराने की बच्चों की इच्छा के साथ कथा बंधन और स्वतंत्रता की उनकी समझ को भी चुनौती देती है।
इस बात में मुझे भारतीय परिवारों का एक बहुत परिचित अंतर्विरोध दिखाई देता है। हम माँ के त्याग को पहचान लेते हैं, लेकिन उसकी इच्छाओं को पहचानने में चूक सकते हैं। हम उसके लिए बेहतर जीवन चाहते हैं, पर बेहतर का अर्थ भी कई बार अपनी ओर से तय कर देते हैं।
माँ की चुप्पी को केवल सहनशीलता कह देना जितना आसान है, उसे केवल पराधीनता कह देना भी उतना ही आसान हो सकता है। कठिन काम है उस चुप्पी के भीतर बसे व्यक्ति तक पहुँचना। उसने क्या स्वीकार किया, क्या बचाया, किस बात का प्रतिरोध किया और किस बात को कभी व्यक्त ही नहीं कर सकी—इन प्रश्नों के उत्तर बाहर से नहीं दिए जा सकते।
मेरे लिए ‘माई’ जैसे उपन्यास का महत्त्व इसी संभावना में है। वह माँ को आदर्श की ऊँची चौकी से उतारकर मनुष्य की तरह देखने का अवसर देता है। मनुष्य की तरह देखना उसके सम्मान को कम करना नहीं; उसके जीवन को अधिक गंभीरता से लेना है।
‘तिरोहित’: संबंधों के अनकहे प्रदेश
‘तिरोहित’ के परिचय में चच्चो और ललना, उनके घरेलू अनुभव और घरों को जोड़ती छत का संसार मिलता है। उसका अंग्रेज़ी अनुवाद राहुल सोनी ने ‘The Roof Beneath Their Feet’ शीर्षक से किया है। राजकमल का परिचय विशेष रूप से उन अनुभूतियों की ओर ध्यान दिलाता है जो स्वाद, स्पर्श, गंध और दृश्य के माध्यम से कथा में आती हैं।
मुझे घरों को जोड़ती छत का यह बिंब आकर्षित करता है। नीचे कमरों में संबंधों की निर्धारित जगहें हैं; ऊपर छत पर शायद जीवन कुछ खुलता है। यह मेरी अपनी व्याख्या है, लेकिन साहित्यिक स्थानों का यही सौंदर्य है—वे कथानक की पृष्ठभूमि रहते हुए भी मन की अवस्थाओं का रूप ले सकते हैं।
हमारे सामाजिक जीवन में संबंधों को नाम देना बहुत आवश्यक समझा जाता है। नाम मिल जाए तो जैसे संबंध समझ में आ गया। लेकिन निकटता, ईर्ष्या, स्नेह, निर्भरता और अकेलापन किसी एक नाम में कहाँ समाते हैं? किसी व्यक्ति के साथ हमारा संबंध कभी-कभी उस बात से अधिक बनता है, जो हमने उससे कही ही नहीं।
ऐसी जटिलताओं को जगह देने वाला साहित्य पाठक से धैर्य माँगता है। यहाँ चरित्रों को तुरंत सही या गलत ठहराना पर्याप्त नहीं होता। उनके भीतर थोड़ी देर ठहरना पड़ता है।
‘खाली जगह’: किसी की अनुपस्थिति के साथ जीना
‘खाली जगह’ का कथानक विश्वविद्यालय के कैफ़े में हुए विस्फोट से जुड़ा है। अपने मृत बेटे की पहचान करने आई माँ उस घटना से जीवित बचे छोटे बच्चे को भी घर लाती है। मृत युवक की स्मृति और बचे हुए बच्चे का जीवन कथा में एक-दूसरे के पास आते हैं।
इस कथासार के सामने कुछ देर चुप रहने का मन होता है।
जो चला गया, उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता। फिर भी जीवन में किसी दूसरे के लिए दरवाज़ा खुल सकता है। शोक और ममता साथ रह सकते हैं। मनुष्य टूटने के बाद भी किसी को सँभाल सकता है—कई बार सँभालते हुए स्वयं भी थोड़ा सँभल जाता है।
‘खाली जगह’ का शीर्षक मुझे इसी कठिन अनुभव की ओर ले जाता है। अनुपस्थिति अदृश्य होकर भी हमारे व्यवहार, स्मृति और संबंधों में बनी रहती है। किसी की छोड़ी हुई चीज़, उसके बैठने का स्थान या उसके नाम पर अचानक रुक गई बातचीत—खाली जगह के अपने आकार होते हैं। साहित्य उन्हें देखने की दृष्टि दे सकता है।
‘रेत समाधि’: वृद्ध स्त्री की ओर फिर से देखना
‘रेत समाधि’ के अंग्रेज़ी अनुवाद ‘Tomb of Sand’ को 2022 में अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला था। डेज़ी रॉकवेल द्वारा अनूदित इस उपन्यास के केंद्र में अस्सी वर्षीय स्त्री का जीवन और उसका अतीत है। बुकर की सामग्री इसे विभाजन, मातृत्व, स्त्री की पहचान और विभिन्न प्रकार की सीमाओं पर विचार करने वाली कृति के रूप में प्रस्तुत करती है।
मेरे लिए यहाँ वृद्ध स्त्री का कथा के केंद्र में होना विशेष अर्थ रखता है। हमारे परिवारों में बुज़ुर्ग स्त्रियाँ उपस्थित बहुत होती हैं, पर उनके अपने जीवन के बारे में पूछने का अवसर कम आता है। उनका परिचय रिश्तों से दिया जाता है—किसी की माँ, किसी की दादी, किसी की पत्नी। इन रिश्तों से पहले और इनके बीच वह स्वयं क्या थीं, यह प्रश्न पीछे रह जाता है।
अस्सी वर्ष की स्त्री के भीतर भी अधूरे अनुभव, निजी स्मृतियाँ और अपनी इच्छाएँ हो सकती हैं। उसकी कहानी सुनने के लिए हमें उम्र के बारे में अपनी धारणाएँ बदलनी पड़ेंगी। ‘रेत समाधि’ की ओर देखने का यह एक महत्त्वपूर्ण रास्ता मुझे लगता है।
कहानियों में समय की बदलती आवाज़
गीतांजलि श्री का कहानी-संग्रह ‘यहाँ हाथी रहते थे’ बदलते समय की अनेक बेचैनियों को समेटता है। इसके प्रकाशकीय परिचय में सांप्रदायिक हिंसा, प्रकृति से बिछोह, प्रेम का क्षरण और स्त्री की निस्सहायता जैसे अनुभवों का उल्लेख है। भाषा का कथा की मनःस्थिति के अनुसार बदलना भी उसकी विशेषता के रूप में रेखांकित किया गया है।
एक रचनाकार के रूप में भाषा और अनुभव का यह संबंध मुझे विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण लगता है। दुःख पर लिख देना और वाक्य के भीतर दुःख की गति पैदा कर देना अलग साधनाएँ हैं। बेचैन मन हमेशा सुव्यवस्थित ढंग से नहीं सोचता। स्मृति सीधी पंक्ति में नहीं लौटती। आनंद की भाषा और भय की भाषा का साँस लेना भी अलग होता है।
कथा का शिल्प जब इन अवस्थाओं को जगह देता है, तब पाठक केवल जानता नहीं, कुछ अनुभव भी करता है। साहित्य की कठिनाई और उसकी शक्ति दोनों यहीं हैं।
अनुवादक का श्रम भी इस यात्रा में उपस्थित है
गीतांजलि श्री की अंतरराष्ट्रीय चर्चा में डेज़ी रॉकवेल का नाम बराबर उपस्थित रहना चाहिए। ‘Tomb of Sand’ के अनुवाद के बारे में बुकर की सामग्री शब्द-खेल, श्लेष और अनुप्रास से जुड़ी कठिनाइयों की ओर ध्यान दिलाती है।
किसी भाषा का वाक्य दूसरी भाषा में पहुँचता है तो उसके साथ उसका परिवेश भी जाना चाहिए। संबोधन में छिपी आत्मीयता, मुहावरे का व्यंग्य, किसी शब्द की ध्वनि और किसी विराम की झिझक—अनुवादक इन सबके लिए रास्ता खोजता है। यह श्रम पुस्तक के पन्नों में सहज दिखाई दे सकता है, लेकिन सहजता तक पहुँचने में कितनी मेहनत लगी होगी, उसका अनुमान पाठक को रखना चाहिए।
वारविक पुरस्कार जैसी पहल का मूल्य मुझे इसलिए भी लगता है कि वह महिला लेखकों की आवाज़ के साथ अनुवाद की कला को सामने लाती है। हिंदी की रचना नए पाठकों तक पहुँचे और उसे पहुँचाने वाले हाथ भी पहचाने जाएँ—दोनों आवश्यक हैं।
इस समाचार के बाद हमारी अपनी ज़िम्मेदारी
अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिलने पर हम अपनी भाषा के लिए प्रसन्न होते हैं। होना भी चाहिए। लेकिन उसके बाद हमें अपनी पढ़ने की आदतों की ओर लौटना होगा। जिन लेखकों की उपलब्धियों पर हम गर्व करते हैं, उनकी किताबों के लिए हमारे घरों और पुस्तकालयों में कितनी जगह है?
‘Our City That Year’ का दीर्घसूची में चयन मेरे लिए इसी प्रश्न के साथ जुड़ा हुआ है। यह समाचार ‘हमारा शहर उस बरस’ को फिर से सामने रखता है और उसके बहाने ‘माई’, ‘तिरोहित’, ‘खाली जगह’, ‘रेत समाधि’ तथा उनकी कहानियों की ओर जाने का रास्ता खोलता है।
गीतांजलि श्री की इन कृतियों के परिचयों को साथ देखने पर चुप्पी और भय, स्मृति और अनुपस्थिति, घर और सरहद के प्रश्न उभरते हैं। इन्हें पढ़ते समय मेरी रुचि उस मनुष्य में होगी जो इन परिस्थितियों के भीतर अपने जीवन का अर्थ खोज रहा है।
शहर घायल हो सकता है। उसे अपना कहने का हमारा विश्वास भी घायल हो सकता है। फिर कोई रचना हमें उस चोट के सामने बैठने को कहती है—बिना जल्दी मुँह मोड़े, बिना किसी आसान निष्कर्ष के।
शायद वहीं से पढ़ना शुरू होता है।
संदर्भ एवं स्रोत-सूची
तथ्य-जाँच की तिथि: 10 अक्टूबर 2026। पुरस्कार की स्थिति और पुस्तकों के परिचय नीचे दिए आधिकारिक तथा प्रकाशकीय स्रोतों पर आधारित हैं। लेख में व्यक्त साहित्यिक दृष्टि इन जानकारियों पर किया गया विवेचन है।
- वारविक विश्वविद्यालय: Warwick Prize for Women in Translation—Longlist 2026
दीर्घसूची, पुस्तक एवं अनुवादक का नाम, भाषाओं की संख्या और आगामी घोषणाओं की तिथियाँ। - Tilted Axis Press: Our City That Year
मूल हिंदी प्रकाशन वर्ष, ब्रिटिश संस्करण और उपन्यास का परिचय। - Penguin Random House India: Mai
‘माई’ का कथासार, पारिवारिक संदर्भ और नीता कुमार के अनुवाद की जानकारी। - राजकमल प्रकाशन: Tirohit
पात्रों, घरेलू अनुभवों और कथा के परिवेश का परिचय। - Penguin Random House India: The Roof Beneath Their Feet तथा The Empty Space
‘तिरोहित’ के अंग्रेज़ी अनुवाद की जानकारी और ‘खाली जगह’ का कथासार। - The Booker Prizes: Tomb of Sand तथा Geetanjali Shree
अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2022, उपन्यास के विषय और अनुवाद संबंधी सामग्री। - राजकमल प्रकाशन: Yahan Hathi Rahate The
कहानी-संग्रह की विषयवस्तु और भाषा-शिल्प का प्रकाशकीय परिचय।