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गीतों की फुलवारी
गीत संग्रह
स्वधा रवीन्द्र उत्कर्षिता
Copyright
© 2026 स्वधा रवीन्द्र उत्कर्षिता. All rights reserved.
Digitally created/published through साहित्य संजीवनी
https://sahityasanjeevani.com/
भूमिका
भूमिका
गीतों की फुलवारी
मनुष्य के भीतर एक संसार ऐसा भी होता है, जहाँ अनकही बातें रहती हैं। वहाँ स्मृतियों की आहट है, किसी अपने की प्रतीक्षा है, कुछ अधूरे स्वप्न हैं और कुछ ऐसे सुख हैं, जिन्हें शब्दों में बाँधते हुए भी लगता है कि बहुत कुछ कहना शेष रह गया। जब इन अनुभूतियों को लय मिलती है, तो गीत जन्म लेता है। वह मन की बात को स्वर देता है और उस स्वर में सुनने वाला अपना जीवन भी पहचान लेता है।
भूमिका — आगे
मेरे लिए गीत लिखना अपने भीतर लौटने जैसा है। दिन भर की व्यस्तताओं के बीच कोई दृश्य, कोई बात अथवा किसी की आँखों में ठहरा भाव मन में रह जाता है। कभी वह तुरंत पंक्ति बनकर उतर आता है, कभी लंबे समय तक भीतर चुपचाप आकार लेता रहता है। लिखते समय अक्सर अनुभव होता है कि जिन भावों को बोलकर व्यक्त करना कठिन था, वे गीत की लय में सहजता से कहे जा सकते हैं।
भूमिका — आगे
“गीतों की फुलवारी” इसी सृजनभाव का नाम है। फुलवारी का सौंदर्य उसके अलग-अलग फूलों में बसता है—हर फूल का अपना रंग, अपनी सुगंध और खिलने का अपना समय होता है। जीवन की अनुभूतियाँ भी ऐसी ही हैं। प्रेम की कोमलता, विरह की कसक, संबंधों की ऊष्मा, अकेलेपन की नीरवता और फिर किसी छोटी-सी आशा से मन का खिल उठना—इन सबके बीच हमारी संवेदनाएँ अपना रूप पाती हैं। इस पुस्तक के शीर्षक में मेरे लिए उस विविधता को सहेजने की इच्छा निहित है।
भूमिका — आगे
गीत का प्रेम से गहरा संबंध है। यह प्रेम किसी प्रिय की स्मृति में भी बसता है, माँ की पुकार में भी, घर लौटने की इच्छा में भी और किसी अपरिचित के दुःख से व्यथित हो उठने में भी। प्रेम हमें अपने से बाहर देखने की दृष्टि देता है। इसी से शब्दों में अपनापन आता है और एक व्यक्ति की अनुभूति अनेक लोगों के मन तक पहुँच पाती है।
भूमिका — आगे
दुःख भी गीतों को एक विशेष गहराई देता है। जीवन में कुछ बिछोह ऐसे होते हैं, जिनकी कोई भरपाई नहीं होती; कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं, जिनके उत्तर देर तक नहीं मिलते। गीत उन क्षणों में मन के पास बैठने वाला साथी बन सकता है। वह पीड़ा को अभिव्यक्ति देता है, उसे सुनने की जगह देता है। कभी किसी पंक्ति में अपना दुःख पहचान लेने भर से मन का बोझ कुछ हल्का हो जाता है।
भूमिका — आगे
मैंने गीतों में भाव की सच्चाई और भाषा की सहजता को महत्त्व दिया है। मेरी कामना रही है कि शब्द पाठक के मन तक पहुँचें, वहाँ किसी स्मृति को छुएँ और अपनी लय में कुछ देर ठहर सकें। गीत पढ़ते हुए यदि कोई पाठक अनायास उसे गुनगुनाने लगे, तो रचना को एक नया स्वर मिल जाता है। तब वह लेखक के पृष्ठ से निकलकर पाठक के जीवन का हिस्सा बनने लगती है।
भूमिका — आगे
आज के व्यस्त जीवन में अपने मन को सुनने के अवसर कम होते जा रहे हैं। फिर भी किसी पुराने गीत की एक पंक्ति हमें बरसों पीछे ले जाती है; कोई नया गीत हमारे वर्तमान को इतनी आत्मीयता से कह देता है कि हम चकित रह जाते हैं। गीतों की यही शक्ति मुझे उनके निकट लाती है। वे समय और दूरी के बीच स्मृति, संवेदना और संवाद के रास्ते बनाए रखते हैं।
भूमिका — आगे
इस फुलवारी को पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मेरे मन में स्नेह के साथ संकोच भी है। रचनाएँ लिखते समय जो भाव मेरे थे, पढ़े जाने पर वे नए अर्थ ग्रहण करेंगे। कोई उनमें अपनी प्रतीक्षा देखेगा, कोई अपना प्रेम, कोई खोया हुआ समय और कोई आने वाले कल की आशा। पाठक का यह अनुभव ही किसी पुस्तक को पूर्णता देता है।
भूमिका — आगे
मेरी कामना है कि “गीतों की फुलवारी” में आपको कोई ऐसा गीत मिले, जिसके पास आप कुछ देर बैठना चाहें; कोई ऐसी पंक्ति मिले, जिसे आप अपने किसी प्रिय तक पहुँचाना चाहें; और कोई ऐसा भाव मिले, जो पढ़ने के बाद भी आपके भीतर धीरे-धीरे गूँजता रहे। इस फुलवारी का एक भी फूल यदि आपके मन में जगह बना सके, तो मेरे सृजन को उसका सबसे सुंदर प्रतिफल मिल जाएगा।
विषय-सूची
- चाँद अब तक दिखा ही नहीं
- जिसको लोगों ने ज़हर दे दिया,कह कर सुकरात
- खींचते हैं माई मुझको क्यों तुम्हारे घाट?
- अब तो कहो कन्हाई
- कृष्ण को अर्पित किया, गुलकंद वाला पान तुमको दे रही हूँ।।
- ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
- तब्दील न कर
- दुनिया की तोहमतें भुला के बैठ गए हैं।
- मेरा बदनाम हो जाने का दिल है
- पहले जहाँ रहा करता था
- हम भी इक किरदार साथी, तुम भी इक किरदार हो
- भागने को हार ही मैं मानती हूँ...
- जाने किसकी ठौर रुकेगा मेरा भोला मन......
- जीवन तो इक मकड़ जाल है......
चाँद अब तक दिखा ही नहीं

चाँद अब तक दिखा ही नहीं — आगे
गीत लिखना तो चाहूँ मगर, चाँद अब तक दिखा ही नहीं। दिल की बातें कहूँ किस तरह, वो भी मुझसे मिला ही नहीं॥ रात आकर ठहर तो गई, खिड़कियों पर सितारे सजे, मैंने कितने दिये रख दिये, रास्ते भी तुम्हारे सजे। एक आहट की उम्मीद थी, कोई दर पर रुका ही नहीं। गीत लिखना तो चाहूँ मगर, चाँद अब तक दिखा ही नहीं॥ याद की ओस गिरती रही, मन की सूखी हुई डाल पर, नाम तेरा उभरता रहा, मेरी हर अनकही बात पर। मैंने आवाज़ कितनी ही दी, तुमने मुड़कर सुना ही नहीं। गीत लिखना तो चाहूँ मगर, चाँद अब तक दिखा ही नहीं॥ एक बादल तुम्हारे लिए,रात भर आसमाँ में रहा, एक तारा मेरी आँख में,जागकर दास्ताँ कह रहा। मैंने चाहा तुम्हें भूलना, दिल मगर मानता ही नहीं। गीत
चाँद अब तक दिखा ही नहीं — आगे
लिखना तो चाहूँ मगर, चाँद अब तक दिखा ही नहीं॥ कुछ अधूरे से वादे लिए, कुछ पुराने से ख़त खोलकर, बैठी हूँ आज फिर रात में, अपनी तन्हाइयाँ ओढ़कर। वक़्त आगे निकलता गया,ज़ख़्म लेकिन भरा ही नहीं। गीत लिखना तो चाहूँ मगर, चाँद अब तक दिखा ही नहीं॥ तुम अगर एक पल आ भी जाओ,रात फिर चाँदनी हो उठे, जो ख़ामोशियाँ जम गई हैं, एक ही बात से पिघल उठें। मन ने उम्मीद छोड़ी नहीं, दीप अब तक बुझा ही नहीं। गीत लिखना तो चाहूँ मगर, चाँद अब तक दिखा ही नहीं। दिल की बातें कहूँ किस तरह, वो भी मुझसे मिला ही नहीं॥ — स्वधा रवीन्द्र ‘उत्कर्षिता
जिसको लोगों ने ज़हर दे दिया,कह कर सुकरात

मेरी आंखों में रहेगा वह उजालों की तरह
देखते हैं जिसे सब लोग सवालों की तरह।
मैंने जिस झील में डाले थे पाँव, थक कर के
वो भी निकली थी ज़िन्दगी के बवालों की तरह
जिसको लोगों ने ज़हर दे दिया,कह कर सुकरात
उसकी हर बात लगी मुझको मिसालों की तरह।
जिसको लोगों ने ज़हर दे दिया,कह कर सुकरात — आगे
मैं उसके बाद किसी और की कभी न हुई
जो मिला ठंड में जलते से पुवालों की तरह।
भाई बन कर जो मिला होता तो हड़का देता
पर मिला मुझको ग़लत शख्स भी सालों की तरह।
जिसको हम प्रेम का धागा समझ के लाए थे
वो लगा मन के सभी कोनों में जालों की तरह।
अब स्वधा उससे कहेगी न कभी दिल की बात
जो उसके होठों पे लग जाता है तालों की तरह।
खींचते हैं माई मुझको क्यों तुम्हारे घाट?

खींचते हैं माई मुझको क्यों तुम्हारे घाट? — आगे
खींचते हैं माई मुझको क्यों तुम्हारे घाट??? बालपन में बैठ संगम पर गढ़े सपने नाव नाविक धार तट मुझको लगे अपने पास से पंडित गुज़र कर कह गए जो मन्त्र धार कर उनको ह्रदय में हो गए अभिमन्त्र बैठ कर सीढ़ी पे जो हम गुनगुनाते थे वो भजन शिव के निरंतर याद आते थे सिर्फ चिंतन और मनन से मन हुआ दार्वाट खींचते हैं माई मुझको क्यों तुम्हारे घाट??? जब कभी की यात्राएं, सब लगा अनजान राह में पर तुम दिखी तो मन हुआ अधिमान एक सिक्का फिर तुम्हारी ओर फेंका था एषणाएं नैन में धर, तुमको देखा था हाथ हम जोड़े रहे जब तक चला वह पुल यूँ लगा सब पाप मेरे अब गए हैं धुल फिर लगा आशीष पा मैं बन गया सम्राट खींचते हैं माई मुझको क्यों तुम्हारे घाट??? ये मेरा
खींचते हैं माई मुझको क्यों तुम्हारे घाट? — आगे
सम्पूर्ण जीवन बस तुम्हारा है मन्त्र यह जपते रहो, यह ही सहारा है जिससे जीवन को मिलेगा मोक्ष का वरदान सिर्फ माँ गंगा करेंगी पाप का संधान इसलिए गंगा के तट पर मित्र जाता हूँ मैं वहाँ जाकर स्वयं को नित्य पाता हूँ माँ कराएगी मेरा प्रभु से, प्रबल संघाट खींचते हैं माई मुझको क्यों तुम्हारे घाट??? स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता
अब तो कहो कन्हाई

कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई।
अब तो कहो कन्हाई — आगे
रोते-रोते नैन थके हैं,
नींद न अब तक आई॥
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई॥
कब से बैठी द्वार तुम्हारे,
आस का दीप जलाए।
एक हवा का झोंका आए,
दीपक फिर बुझ जाए।
हाथ जोड़कर पूछ रही हूँ,
चूकी कहाँ कन्हाई?
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई॥
अब तो कहो कन्हाई — आगे
रात ढले तो सोचूँ मन में,
भोर नई कुछ लाए।
भोर हुई तो वही वेदना,
फिर आँचल भर जाए।
दिन भी रोया, रात भी रोई,
रोई मेरी तन्हाई।
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई॥
अपने दुःख की चिंता कैसी,
सह लेती मैं मोहन।
अपनों को दुख में जब देखूँ,
टूटे मेरा यह मन।
उनकी आँख का आँसू देखूँ,
साँस मेरी भर आई।
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई॥
अब तो कहो कन्हाई — आगे
सुना सुदामा द्वार खड़ा था,
तुम नंगे पग धाए।
मीरा ने जब तुम्हें पुकारा,
विष अमृत कर आए ।
मेरी टेर तुम्हें ओ कान्हा
क्यों सुनने में न आई
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई॥
यदि कोई अपराध हुआ हो,
मुझको आज बताओ।
जितना चाहो दंड मुझे दो,
पर अपनों को बचाओ।
उनके भाग के दुःख भी लिख दो,
मेरे भाग कन्हाई।
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई॥
अब तो कहो कन्हाई — आगे
कभी-कभी मैं रूठ के तुमसे,
मन ही मन यह कहती—
“सबकी सुनते हो गिरधारी,
मैं ही क्यों दुख सहती?”
फिर तस्वीर तुम्हारी देखूँ,
आँख मेरी भर आई।
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई॥
अब तो थककर पाँव हमारे,
चलना भूल रहे हैं।
आशाओं के कोमल धागे,
देखो टूट रहे हैं।
तुम यदि हाथ न थामोगे तो
कौन करे अगुवाई?
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई॥
अब तो कहो कन्हाई — आगे
मझधारे में नाव पड़ी है,
दूर बहुत है किनारा।
हाथों से पतवार गिरी है,
तुम ही एक सहारा।
एक बार बस नाव में आकर,
बैठो मेरे कन्हाई।
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई॥
बहुत परीक्षा ले ली मोहन,
अब तो गले लगाओ।
माथे पर रख हाथ साँवरे,
“मैं हूँ” यह बतलाओ।
बरसों से जो रुकी हुई है,
लाओ वह पुरवाई
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई॥
अब तो कहो कन्हाई — आगे
कष्ट भरे दिन कब बीतेंगे,
यह तो कहो कन्हाई।
रोते-रोते नैन थके हैं,
नींद न अब तक आई॥
— स्वधा रविंद्र ‘उत्कर्षिता’
कृष्ण को अर्पित किया, गुलकंद वाला पान तुमको दे रही हूँ।।

कृष्ण को अर्पित किया, गुलकंद वाला पान तुमको दे रही हूँ।। — आगे
जो रचा है लेखनी ने, वो स्वयंभू कृष्ण का है मैं चढ़ा कर गीत उन पर, लो तुम्हें अब दे रही हूँ कृष्ण को अर्पित किया, गुलकंद वाला पान तुमको दे रही हूँ।। शब्द मेरे हैं अगर तो, भाव उनकी चेतना है लिख रही जो स्याह उसमें ,वेदना ही वेदना है सत्य का पर्याय बन कर गीत मेरे बोलते हैं कृष्ण का स्पर्श पा पुलकित हुए से डोलते हैं अश्रु से पावन हुए, मौलिक, सनातन और शाश्वत भाव के अनुमान तुमको दे रही हूँ कृष्ण को अर्पित किया, गुलकंद वाला पान तुमको दे रही हूँ।। छंद उनके ही कथन से ,जन्म लेते हैं हमारे बंध गीतों के सभी ,उन पर से हमने हैं उतार, गात मेरे गीत का गुण धर्म से कम है परीक्षित किंतु इनकी आत्मा है कृष्ण से स्वयमेव दीक्षित अब नये
कृष्ण को अर्पित किया, गुलकंद वाला पान तुमको दे रही हूँ।। — आगे
उपहार में अक्षर अलौकिक और अनुपम प्रेम के रस गान तुमको दे रही हूँ कृष्ण को अर्पित किया, गुलकंद वाला पान तुमको दे रही हूँ।। साथ का सुख भी समाहित और विरह की पीर भी है गीत में मेरे चुभे संशय के कितने तीर भी हैं हैं भरे संकल्प से ये, प्रेम ही परिणत करेंगे खुद भले आहत रहें पर ये नहीं आहत करेंगे चेतना के हेतु संयम यम नियम विज्ञान वाले कृष्ण के वरदान तुमको दे रहीं हूँ कृष्ण को अर्पित किया, गुलकंद वाला पान तुमको दे रही हूँ।। See less
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों

ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
क्यों मति भ्रष्ट किये बैठे हो।
जिनके कारण धरती पर हो
उन्हें कोसते नित दिन रहते
जो पीते हैं खून तुम्हारा
उनको अपना सब कुछ कहते
बाहर वालों की ख़ातिर
घर भर को त्रस्त किये बैठे हो
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
क्यों मति भ्रष्ट किये बैठे हो।
तुम्हें सिर्फ धन की इच्छा है
मात पिता से मोह नहीं है
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों — आगे
अपने लिए खोदते गड्ढा
इसकी तुमको टोह नहीं है
उलटे सीधे कामों में ख़ुद को
आकृष्ट किये बैठे हो
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
क्यों मति भ्रष्ट किये बैठे हो।
अभी घूमना चाहो घूमो
कल संघर्ष मिलेगा तय है
परजीवी बन चलने वाले
क्या तुमको इसका कुछ भय है
दिनचर्या को अस्त व्यस्त कर
क्यों निकृष्ट बने बैठे हो
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
क्यों मति भ्रष्ट किये बैठे हो।
याद रहे जब तक इंस्टा और
स्नैपचैट पर मस्त रहोगे
जब तक तुम घर के बाहर
खुशियां पाने में व्यस्त रहोगे
तब तक पूरा जग बोलेगा
क्यों अपकृष्ट बने बैठे हो
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
क्यों मति भ्रष्ट किये बैठे हो।
स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता
तब्दील न कर

तब्दील न कर — आगे
मेरे दिमाग़ को दही में तू तब्दील न कर, बात छोटे में कह यूँ ही इसे तफ़सील न कर। इश्क़ कर तो लिया है, पर इसे मुकाम न दे इश्क़ हो जाएगा पूजा, इसे तकमील न कर। तेरे कमरे में छुपा रखे हैं ख़त तेरे लिए तू इन्हें ख़ुद ही पढ़, यूँ गैर को तहवील न कर। मैं बहुत ख़ुश हूँ कच्चे मकान में अपने तू मेरे गाँव को रख गाँव, तहसील न कर। मेरा क़ातिल है वो, पर दिल में बसा है मेरे तू मेरे वास्ते उसको सज़ा तामील न कर। मैं उसूलों पे चला उसको भायी मन मर्जी बस इतनी बात पे अब उसको यूँ ज़लील न कर। क्यों ये कहते हो अपने कृष्ण को मैं गैर कहूँ झूठ कहला के मेरे प्यार को अश्लील न कर। मेरे हिस्से में लिखी ही थी जुदाई तुझसे ख़ुद को तू दोष न दे, इतना भी अब फील न
तब्दील न कर — आगे
कर। मैं स्वधा हूँ, मुझे आदर्शो पे चलने दे मेरे मुझको गौरैया ही रहने दे, मुझे चील न कर। स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता
दुनिया की तोहमतें भुला के बैठ गए हैं।

हम आपके पहलू में आके बैठ गए हैं,
दुनिया की तोहमतें भुला के बैठ गए हैं।
नज़रों से आपकी जो मिली थोड़ी-सी राहत,
हम दर्द ए दिल ए ग़म छुपा के बैठ गए हैं।
कुछ बात थी ऐसी तेरी ख़ामोश नज़र में,
हम अपना फ़साना सुना के बैठ गए हैं।
दुनिया की तोहमतें भुला के बैठ गए हैं। — आगे
माना कि तेरे दिल में ठिकाना नहीं अपना,
फिर भी तेरी चौखट,सजा के बैठ गए हैं।
वो चाँद भी हैरान है अब देखकर हमको,
हम याद में जग के जगा के बैठ गए हैं।
अब कौन हमें राह दिखाएगा यहाँ पर,
हम ख़ुद ही नक़्श-ए-पा मिटा के बैठ गये हैं
तुमने तो कहा था कि मुलाक़ात न होगी,
हम फिर भी ख़्वाब क्यों सजाके बैठ गये हैं
दिल हार के भी चेहरा हमारा नहीं उतरा,
मुस्कान दर्द को बनाके बैठ गये हैं
अब लौट के जाना भी मुनासिब नहीं लगता,
हम नाम तेरे दिल लिखाके बैठ गये हैं
दुनिया की तोहमतें भुला के बैठ गए हैं। — आगे
है होश 'स्वधा' को कहाँ अब इस जहान का
हम इश्क़ की इक लौ जला के बैठ गए हैं।
स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता
मेरा बदनाम हो जाने का दिल है

मेरा बदनाम हो जाने का दिल है — आगे
पहले जहाँ रहा करता था

पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
कच्ची दीवारों पर
खपरैलों की छांव चढ़ी थी
आँगन बीच खड़ी थी
तुलसी मैया खूब गढ़ी थीं
गलियारे में खटिया डाले
चाची और भतार
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
द्वार सामने पीपल बरगद
छैयां लिए खड़े थे
पहले जहाँ रहा करता था — आगे
बबलू रामू पप्पू टिल्लू
उनके लिए लड़े थे
ई तोहार है ई हमार है
लग गयी एहि कतार
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
चारपाई पर दद्दा के संग
बैठे कितने दद्दा
गिन ना पाए हमहुँ
और न समझ सका उई गद्दा
बस इतना ही जान सकेन हम
दुलराई और प्यार
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
गूंगा काका बोलत थक गए
कउनो समझ न पाया
अम्मा निकसी घर ते बाहर
कलुआ को दुलराया
अनबोले की बातें समझे
अनबोली सी नार
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
दार हमारी चावल तेरे
मिल कर पका करेंगे
छांछ दिए जाते है लेकिन
कब तक बरे मिलेंगे
पहले जहाँ रहा करता था — आगे
पैसों का व्यापार नहीं
अदला बदली हर बार
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
खेला करती ललिया छत पर
बिना दुपट्टा डाले
पूरा गांव सगा था उसका
न मन पर थे ताले
फटी चीथड़ी आयी उस दिन
लाये उसे कहार,
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
हम भी इक किरदार साथी, तुम भी इक किरदार हो

हम भी इक किरदार साथी, तुम भी इक किरदार हो — आगे

भागने को हार ही मैं मानती हूँ...

भागने को हार ही मैं मानती हूँ... — आगे

जाने किसकी ठौर रुकेगा मेरा भोला मन......

जाने किसकी ठौर रुकेगा मेरा भोला मन...... — आगे
कौन हमारा अपना है यह कैसे पहचाने हमको तो दुनिया में लगते सब ही अनजाने अनजानों में खोज रहे हैं हम कुछ अपनापन जाने किसकी ठौर रुकेगा मेरा भोला मन...... सूरज को देखा तो सूरज आग उगलता पाया किंतु इसी के कारण छंटती अंधकार की माया चंदा की शीतलता पर मन अक्सर मिट जाता है किंतु बड़ा बैरी है याद पिया की दिलवाता है धरती से अम्बर तक सब में है बेगानापन जाने किसकी ठौर रुकेगा मेरा भोला मन...... सबके लिए पवन शीतल है, मेरी अगन बढ़ाती जल की एक बिंदु भी मुझको ख़ुद में आज डुबाती धरा भार सह लेती मेरा किंतु न मुझको भाए बिरहन का तो मन करता है, छोड़ धाम यह जाए ख़ुद को ढूंढ रही है , ख़ुद से ही अंजानपन जाने किसकी ठौर रुकेगा मेरा भोला
जाने किसकी ठौर रुकेगा मेरा भोला मन...... — आगे
मन...... आस पास के लोग सभी मेरी खातिर मरते हैं मेरी खुशियों की खातिर मंदिर मंदिर फिरते हैं किंतु नहीं वे समझ रहे हैं मन की आस हमारे पी के दर्शन की खातिर हम ख़ुद को ख़ुद ही हारे बिना प्रेम के जीवन में अब केवल तीखापन जाने किसकी ठौर रुकेगा मेरा भोला मन...... घर से भागी, मग में आई, मग से भाग कहा जाऊं किसको कितना छोडूं कितना पकड़ूं समझ नहीं पाऊं सबका अपना अपना दर्शन, मेरा दर्शन बस शिव हैं स्वांसें शिव हैं,धड़कन शिव हैं,अंतस का कण कण शिव हैं शिव को पाकर ही जाएगा मन का नीलापन ॐ नम शिवाय नमः शिवाय ॐ नम शिवाय नमः शिवाय ॐ नम शिवाय नमः शिवाय
जाने किसकी ठौर रुकेगा मेरा भोला मन...... — आगे

जीवन तो इक मकड़ जाल है......

जीवन तो इक मकड़ जाल है...... — आगे
जीवन क्या है इसका उत्तर खोज रही थी तब ये पाया जीवन तो इक मकड़ जाल है...... स्वाँसों की माला में जा कर, आकाक्षाएं उलझ जाती हैं, एक बार फंस गयी अगर तो,फिर वो कहाँ सुलझ पाती हैं जितनी मांगे बढ़ती जाती,उतना कठिन मार्ग हो जाता जो मेले में निकला सजकर,वो इस मेले में खो जाता तड़पन भटकन सिसकन मिलती, इस रस्ते का यही हाल है जीवन तो इक मकड़ जाल है...... जितनी भूख, अगर उससे ज़्यादा का सेवन हो जाएगा तय है अगले दिवस तुम्हारा पेट अधिक उससे चाहेगा एक एक करके तृष्णाएं पर्वत जैसी हो जाएंगी, फिर तेरे पथ पर वो कुंठाओं के कांटे बो जाएंगी जो भी चला प्राप्ति के पथ पर, जीवन उसका फिर मुहाल है जीवन तो इक मकड़ जाल है...... लिप्सा के जंगल में यदि
जीवन तो इक मकड़ जाल है...... — आगे
तू ख़ुद को अर्पित कर आएगा अपेक्षाओं की वल्लरियों पर उपेक्षाओं का जल पायेगा जितनी हो जठराग्नि तीव्र,उस पर उतना ही कम घृत डालो जितनी बढ़े पिपासा तेरी,उससे कम में स्वाँस भिगा लो नियम और संयम से चल कर जीवन, बनता नौनिहाल है जीवन तो इक मकड़ जाल है...... स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता
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