

मेरी प्रथम ए बुक
test e book
Swadha Ravindra
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© 2026 Swadha Ravindra. All rights reserved.
Digitally created/published through साहित्य संजीवनी
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विषय-सूची
- ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
- तब्दील न कर
- दुनिया की तोहमतें भुला के बैठ गए हैं।
- मेरा बदनाम हो जाने का दिल है
- पहले जहाँ रहा करता था
- हम भी इक किरदार साथी, तुम भी इक किरदार हो
- भागने को हार ही मैं मानती हूँ...
- जाने किसकी ठौर रुकेगा मेरा भोला मन......
- जीवन तो इक मकड़ जाल है......
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
क्यों मति भ्रष्ट किये बैठे हो।
जिनके कारण धरती पर हो
उन्हें कोसते नित दिन रहते
जो पीते हैं खून तुम्हारा
उनको अपना सब कुछ कहते
बाहर वालों की ख़ातिर
घर भर को त्रस्त किये बैठे हो
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
क्यों मति भ्रष्ट किये बैठे हो।
तुम्हें सिर्फ धन की इच्छा है
मात पिता से मोह नहीं है
अपने लिए खोदते गड्ढा
इसकी तुमको टोह नहीं है
उलटे सीधे कामों में ख़ुद को
आकृष्ट किये बैठे हो
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
क्यों मति भ्रष्ट किये बैठे हो।
अभी घूमना चाहो घूमो
कल संघर्ष मिलेगा तय है
परजीवी बन चलने वाले
क्या तुमको इसका कुछ भय है
दिनचर्या को अस्त व्यस्त कर
क्यों निकृष्ट बने बैठे हो
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
क्यों मति भ्रष्ट किये बैठे हो।
याद रहे जब तक इंस्टा और
स्नैपचैट पर मस्त रहोगे
जब तक तुम घर के बाहर
खुशियां पाने में व्यस्त रहोगे
तब तक पूरा जग बोलेगा
क्यों अपकृष्ट बने बैठे हो
ख़ुद को जेन ज़ी कहने वालों
क्यों मति भ्रष्ट किये बैठे हो।
स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता
तब्दील न कर
दुनिया की तोहमतें भुला के बैठ गए हैं।
हम आपके पहलू में आके बैठ गए हैं,
दुनिया की तोहमतें भुला के बैठ गए हैं।
नज़रों से आपकी जो मिली थोड़ी-सी राहत,
हम दर्द ए दिल ए ग़म छुपा के बैठ गए हैं।
कुछ बात थी ऐसी तेरी ख़ामोश नज़र में,
हम अपना फ़साना सुना के बैठ गए हैं।
माना कि तेरे दिल में ठिकाना नहीं अपना,
फिर भी तेरी चौखट,सजा के बैठ गए हैं।
वो चाँद भी हैरान है अब देखकर हमको,
हम याद में जग के जगा के बैठ गए हैं।
अब कौन हमें राह दिखाएगा यहाँ पर,
हम ख़ुद ही नक़्श-ए-पा मिटा के बैठ गये हैं
तुमने तो कहा था कि मुलाक़ात न होगी,
हम फिर भी ख़्वाब क्यों सजाके बैठ गये हैं
दिल हार के भी चेहरा हमारा नहीं उतरा,
मुस्कान दर्द को बनाके बैठ गये हैं
अब लौट के जाना भी मुनासिब नहीं लगता,
हम नाम तेरे दिल लिखाके बैठ गये हैं
है होश 'स्वधा' को कहाँ अब इस जहान का
हम इश्क़ की इक लौ जला के बैठ गए हैं।
स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता
मेरा बदनाम हो जाने का दिल है
पहले जहाँ रहा करता था
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
कच्ची दीवारों पर
खपरैलों की छांव चढ़ी थी
आँगन बीच खड़ी थी
तुलसी मैया खूब गढ़ी थीं
गलियारे में खटिया डाले
चाची और भतार
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
द्वार सामने पीपल बरगद
छैयां लिए खड़े थे
बबलू रामू पप्पू टिल्लू
उनके लिए लड़े थे
ई तोहार है ई हमार है
लग गयी एहि कतार
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
चारपाई पर दद्दा के संग
बैठे कितने दद्दा
गिन ना पाए हमहुँ
और न समझ सका उई गद्दा
बस इतना ही जान सकेन हम
दुलराई और प्यार
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
गूंगा काका बोलत थक गए
कउनो समझ न पाया
अम्मा निकसी घर ते बाहर
कलुआ को दुलराया
अनबोले की बातें समझे
अनबोली सी नार
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
दार हमारी चावल तेरे
मिल कर पका करेंगे
छांछ दिए जाते है लेकिन
कब तक बरे मिलेंगे
पैसों का व्यापार नहीं
अदला बदली हर बार
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
खेला करती ललिया छत पर
बिना दुपट्टा डाले
पूरा गांव सगा था उसका
न मन पर थे ताले
फटी चीथड़ी आयी उस दिन
लाये उसे कहार,
पहले जहाँ रहा करता था
सुरभित अनुपम प्यार,
चौपालों पर आ बैठे हैं
द्वेष और व्यभिचार।
हम भी इक किरदार साथी, तुम भी इक किरदार हो
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