गजानन माधव मुक्तिबोध : जिनके ‘अँधेरे’ में मुझे मनुष्य की सबसे सच्ची रोशनी दिखाई देती है
इस महीने के रचनाकार पर विशेष लेख

गजानन माधव मुक्तिबोध : जिनके ‘अँधेरे’ में मुझे मनुष्य की सबसे सच्ची रोशनी दिखाई देती है

लेखिका/लेखक: स्वधा रवीन्द्र ‘उत्कर्षिता’

विषय: गजानन माधव मुक्तिबोध

कुछ रचनाकारों को हम पढ़ते हैं और आगे बढ़ जाते हैं, कुछ को पढ़कर उनकी कोई पंक्ति स्मृति में रह जाती है, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें पढ़ने के बाद हमारे भीतर कुछ बदल जाता है। गजानन माधव मुक्तिबोध मेरे लिए ऐसे ही रचनाकार हैं। उन्हें पढ़ते हुए कई बार ऐसा लगता है जैसे मैं किसी और की कविता नहीं पढ़ रही, बल्कि अपने ही भीतर के किसी ऐसे कमरे का दरवाज़ा खोल रही हूँ, जहाँ बहुत-से प्रश्न वर्षों से चुपचाप बैठे थे। वे प्रश्न जिन्हें हम जानते तो हैं, लेकिन उनसे आँख मिलाने का साहस हमेशा नहीं कर पाते।

मुक्तिबोध मुझे इसलिए भी बहुत प्रभावित करते हैं क्योंकि उनकी रचनाओं में मुझे केवल एक कवि नहीं मिलता, बल्कि एक बेचैन मनुष्य मिलता है—ऐसा मनुष्य जो संसार से प्रश्न करता है तो स्वयं को भी कटघरे में खड़ा करने से नहीं डरता। दूसरों के दोष गिनाना आसान है, लेकिन अपने भीतर उतरकर यह देखना कि जिस व्यवस्था का हम विरोध कर रहे हैं, कहीं सुविधा के किसी कोने में हम स्वयं भी तो उसके हिस्सेदार नहीं हैं—यह साहस बहुत कम लेखकों में दिखाई देता है। मुक्तिबोध के यहाँ यह आत्मपरीक्षण बार-बार सामने आता है और शायद यही कारण है कि उनका साहित्य मुझे पढ़ने के बाद भी बहुत देर तक अपने भीतर चलता हुआ महसूस होता है।

13 नवंबर 1917 को मध्य प्रदेश के श्योपुर में जन्मे गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन किसी सुविधाजनक साहित्यिक यात्रा की कहानी नहीं था। उनके हिस्से में आर्थिक कठिनाइयाँ आईं, नौकरियों की अस्थिरता आई, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ आईं और लगातार संघर्ष आया। उन्होंने अध्यापन किया, पत्रकारिता और संपादन से जुड़े और अनेक स्थानों पर जीवन-यापन के लिए संघर्ष करते रहे। बाद में राजनांदगाँव के दिग्विजय महाविद्यालय में अध्यापन से जुड़े। उनके जीवन को जानने के बाद उनकी कविताओं की बेचैनी कुछ और गहरी समझ में आती है। मुझे लगता है कि उन्होंने गरीबी, असुरक्षा और मनुष्य की विवशता को केवल बाहर से देखा नहीं था; उसका ताप उन्होंने स्वयं भी सहा था।

1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ में मुक्तिबोध की कविताओं का सम्मिलित होना हिंदी कविता के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। लेकिन उन्हें किसी एक आंदोलन, किसी एक विचारधारा या किसी एक काव्य-परिभाषा में बाँध देना मुझे हमेशा उनके विराट रचनात्मक व्यक्तित्व को छोटा करना लगता है। उनके भीतर प्रयोगशीलता है, सामाजिक चेतना है, वैचारिक प्रतिबद्धता है, लेकिन सबसे बढ़कर मनुष्य के प्रति गहरी चिंता है। वे विचार को नारे में नहीं बदलते; उसे मनुष्य के अंतर्द्वंद्व में उतारते हैं।

मुक्तिबोध को पढ़ते हुए मुझे सबसे अधिक आकर्षित करता है उनका ‘अँधेरा’। यह अँधेरा केवल रात का अँधेरा नहीं है। यह हमारे भीतर का अँधेरा है, व्यवस्था का अँधेरा है, भय का अँधेरा है, समझौतों का अँधेरा है और कभी-कभी वह अँधेरा भी है जिसे हम स्वयं अपने चारों ओर इसलिए बना लेते हैं क्योंकि प्रकाश में स्वयं का चेहरा साफ दिखाई देने लगता है।

उनकी लंबी कविता ‘अँधेरे में’ मुझे बार-बार अपनी ओर खींचती है। यह ऐसी कविता नहीं है जिसे एक बार पढ़कर कह दिया जाए कि हमने समझ लिया। हर बार पढ़ने पर इसका कोई दूसरा द्वार खुलता है। कहीं मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी की दुविधा सामने आती है, कहीं आत्मग्लानि, कहीं व्यवस्था के सामने मनुष्य की विवशता और कहीं उस ‘परम अभिव्यक्ति’ की तलाश, जिसकी खोज शायद प्रत्येक सच्चा रचनाकार अपने भीतर करता रहता है।

मुक्तिबोध के यहाँ फैंटेसी है, विचित्र दृश्य हैं, अँधेरी गलियाँ हैं, अनजान चेहरे हैं, भय है और एक निरंतर पीछा करती हुई बेचैनी भी। पहली दृष्टि में यह संसार असामान्य लग सकता है, लेकिन थोड़ा भीतर उतरें तो महसूस होता है कि यह तो हमारे अपने ही जीवन का संसार है। हमारे भय भले ही किसी अँधेरी गली में चलती परछाईं के रूप में दिखाई न दें, पर वे हमारे निर्णयों में, हमारी चुप्पियों में और हमारे समझौतों में मौजूद रहते हैं।

‘ब्रह्मराक्षस’ पढ़ते हुए मैं हमेशा ठिठक जाती हूँ। कितना विचित्र और कितना सटीक प्रतीक है—ज्ञान से भरपूर एक ऐसा व्यक्तित्व जिसका ज्ञान जीवन में उतर नहीं पाता। मेरे लिए ब्रह्मराक्षस केवल मुक्तिबोध की कविता का पात्र नहीं है। वह हर उस बुद्धिजीवी का प्रश्न है जो बहुत कुछ जानता है, बहुत कुछ समझता है, लेकिन उस ज्ञान को मनुष्य और समाज के पक्ष में खड़ा करने का साहस नहीं जुटा पाता।

तब अनायास ही मन पूछता है—ज्ञान का मूल्य क्या है यदि वह जीवन से कट जाए? विचार किस काम का यदि वह केवल पुस्तकों और चर्चाओं तक सीमित रह जाए? संवेदना कैसी यदि अन्याय देखकर भी हमारी सुविधा हमें चुप रखे?

मुक्तिबोध मुझे इसी तरह असुविधाजनक प्रश्न देते हैं और शायद मैं उनसे इसलिए इतनी प्रभावित हूँ क्योंकि वे पाठक को निष्क्रिय रहने नहीं देते।

उनकी कविता ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ भी मुझे बेहद आकर्षित करती है। हिंदी कविता में चाँद सदियों से सौंदर्य, प्रेम और कोमलता का प्रतीक रहा है, लेकिन मुक्तिबोध उसी चाँद को उठाकर एक बिल्कुल अलग यथार्थ के बीच रख देते हैं। उनके यहाँ चाँद हमेशा शीतल और सुंदर नहीं है। दुनिया यदि विकृत है, व्यवस्था यदि विकृत है, संबंध यदि विकृत हो रहे हैं, तो सौंदर्य की हमारी पुरानी परिभाषाएँ भी आखिर कब तक अक्षुण्ण रह सकती हैं?

यही मुक्तिबोध की विशेषता है। वे हमें परिचित प्रतीकों को नई दृष्टि से देखने के लिए बाध्य करते हैं।

मुझे लगता है कि किसी बड़े रचनाकार की पहचान यही होती है कि वह हमारे देखने का ढंग बदल देता है। मुक्तिबोध को पढ़ने के बाद अँधेरा केवल अँधेरा नहीं रहता, चाँद केवल चाँद नहीं रहता और एक ब्रह्मराक्षस केवल कल्पना का जीव नहीं रह जाता। हर प्रतीक हमारे समाज और हमारे भीतर के किसी सत्य की ओर संकेत करने लगता है।

मुक्तिबोध केवल कवि नहीं थे। उनकी कहानियाँ, आलोचना, निबंध और साहित्यिक चिंतन भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। ‘काठ का सपना’, ‘सतह से उठता आदमी’, ‘विपात्र’, ‘कामायनी : एक पुनर्विचार’, ‘नयी कविता का आत्मसंघर्ष’, ‘नये साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ और ‘एक साहित्यिक की डायरी’ उनके विस्तृत रचनात्मक संसार की अलग-अलग दिशाएँ हैं।

विशेष रूप से ‘एक साहित्यिक की डायरी’ मुझे उस मुक्तिबोध के अधिक निकट ले जाती है जो केवल कविता नहीं लिख रहा था, बल्कि निरंतर यह सोच रहा था कि साहित्य क्यों लिखा जाना चाहिए, रचनाकार की जिम्मेदारी क्या है और कला का जीवन तथा समाज से कैसा संबंध होना चाहिए।

एक रचनाकार होने के नाते ये प्रश्न मुझे भी बहुत बेचैन करते हैं। क्या केवल सुंदर शब्द लिख देना साहित्य है? क्या हमारे समय का दुःख हमारी रचनाओं से बाहर रह सकता है? क्या साहित्यकार अपने आसपास घटते अन्याय से स्वयं को बिल्कुल अलग रख सकता है? और यदि हम सच पहचानते हैं, तो उसे अभिव्यक्त करने का साहस कितना रखते हैं?

इसी संदर्भ में मुक्तिबोध की वह प्रसिद्ध पुकार मेरे भीतर बार-बार गूँजती है—“अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे।”

मेरे लिए यह केवल कविता की पंक्ति नहीं है। यह एक रचनाकार की प्रतिज्ञा जैसी है।

साहित्य अगर केवल प्रशंसा पाने का साधन बन जाए, तो वह अपनी आत्मा खो देता है। लेखक के लिए सबसे कठिन काम शायद यही है कि वह लोकप्रियता, सुविधा और स्वीकृति से ऊपर उठकर वह लिख सके जिसे उसका अंतःकरण सत्य मानता है। मुक्तिबोध का जीवन और साहित्य मुझे इस ईमानदारी की याद दिलाते हैं।

उनकी भाषा को कठिन कहा जाता है और सच है कि मुक्तिबोध को बहुत आराम से, चलते-चलते नहीं पढ़ा जा सकता। उन्हें पढ़ने के लिए रुकना पड़ता है, कभी एक पंक्ति पर लौटना पड़ता है, कभी एक प्रतीक को देर तक अपने भीतर रखना पड़ता है। लेकिन क्या जीवन स्वयं इतना सरल है कि उसकी जटिलता को हमेशा सरल वाक्यों में समेटा जा सके?

मुझे उनकी कठिनता में भी एक तरह की ईमानदारी दिखाई देती है। वे पाठक के लिए जीवन को सरल बनाकर प्रस्तुत नहीं करते। जिस दुनिया को वे देखते हैं, वह उलझी हुई है; मनुष्य का अंतर्मन भी उलझा हुआ है। इसलिए उनकी अभिव्यक्ति में भी कई स्तर हैं। लेकिन जब वे स्तर धीरे-धीरे खुलते हैं तो लगता है जैसे किसी घने अँधेरे में अचानक किसी ने छोटी-सी लौ जला दी हो।

मुक्तिबोध का जीवन बहुत लंबा नहीं रहा। 11 सितंबर 1964 को मात्र 46 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। यह सोचकर मन में एक टीस उठती है कि जिस रचनाकार को आज आधुनिक हिंदी कविता के सबसे महत्त्वपूर्ण स्वरों में गिना जाता है, वह अपने जीवनकाल में उस प्रतिष्ठा और सहजता को पूरी तरह नहीं देख सका जिसका वह अधिकारी था। उनकी अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाएँ उनके निधन के बाद व्यापक रूप से पाठकों तक पहुँचीं।

लेकिन शायद बड़े लेखक अपनी देह की आयु से नहीं मापे जाते। वे अपने प्रश्नों की आयु से मापे जाते हैं।

और मुक्तिबोध के प्रश्न आज भी जीवित हैं।

आज भी जब कोई मनुष्य अन्याय देखकर मौन रहता है, मुक्तिबोध प्रासंगिक हो उठते हैं। जब कोई बुद्धिजीवी सत्य जानकर भी सुविधा चुनता है, ‘ब्रह्मराक्षस’ हमारे सामने खड़ा हो जाता है। जब समाज की वास्तविकता हमारे सुंदर भ्रमों को तोड़ती है, हमें ‘चाँद का मुँह टेढ़ा’ दिखाई देने लगता है। और जब कोई रचनाकार अपने भीतर यह साहस जुटाता है कि उसे वह कहना है जिसे कहना आसान नहीं, तब कहीं न कहीं मुक्तिबोध की वही आवाज़ सुनाई देती है—अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे।

शायद यही कारण है कि मैं मुक्तिबोध को केवल पढ़ती नहीं हूँ, उनसे संवाद करती हूँ।

कभी उनसे सहमत होती हूँ, कभी उलझती हूँ, कभी उनकी कविता के किसी अँधेरे रास्ते में बहुत देर तक भटकती हूँ; लेकिन वहाँ से लौटकर हमेशा अपने भीतर कुछ नया पाती हूँ। उन्होंने मुझे यह समझाया कि साहित्य केवल फूलों, चाँदनी और प्रेम की बात नहीं है। साहित्य वह आईना भी है जिसमें हमें अपना वह चेहरा देखना पड़ता है जिसे हम कभी-कभी स्वयं से छिपाना चाहते हैं।

मेरे लिए मुक्तिबोध की सबसे बड़ी देन शायद यही है—उन्होंने अँधेरे से डरना नहीं, उसमें उतरकर प्रकाश तलाशना सिखाया।

उनकी रचनाओं का अँधेरा मुझे निराश नहीं करता। उसके भीतर मुझे एक बेचैन मनुष्य दिखाई देता है जो सत्य की तलाश छोड़ने को तैयार नहीं है। और जब तक मनुष्य के भीतर यह तलाश जीवित है, तब तक आशा भी जीवित है।

इसीलिए मुक्तिबोध मेरे प्रिय रचनाकारों में केवल इसलिए नहीं हैं कि उन्होंने महान कविताएँ लिखीं। वे इसलिए प्रिय हैं क्योंकि उनकी रचनाएँ मुझे अपने समय, अपने समाज और सबसे बढ़कर स्वयं से प्रश्न करना सिखाती हैं।

और किसी साहित्यकार से हमें इससे बड़ा उपहार भला और क्या मिल सकता है?

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